यमुना जयंती 🪔🙏

sn vyas
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3 दिन पहले
#🌊यमुना जयंती 🪔 यमराज का यमुना को वरदान 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ भगवान विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा देवी का विवाह भगवान सूर्य से हुआ था। उन दोनों की तीन संताने थी। वैवस्वत, यम, औऱ यमुना। संज्ञा देवी अपने पति सूर्य के ताप सहन नही कर पाती थी इसलिए उन्होंने अपनी छाया को सूर्य देव के पास छोड़ा और पिता के घर चली गई। पिता को जब यह बात पता चला तो उन्होंने पुत्री को वापस जाने को कहा किंतु जब वह लौटकर गई तो उन्होंने देखा कि छाया सूर्य देव का अच्छे से खयाल रख रही हैं। इसलिए वह ध्रुव प्रदेश में जाकर तपस्या करने लगी छाया से सूर्यदेव को तपती नदी तथा शनिचर ग्रह दो संतानो का जन्म हुआ। इधर छाया का यम तथा यमुना से सौतेली माता स व्यवहार होने लगा। एक बार यम को छाया का वास्तविकता का पता चल गया। विमाता के बर्ताव से खिन्न यम ने छाया को धमकाया की वह पिता के सामने सारा राज खोल देंगे। क्रोधित छाया ने यम को श्राप दे दिया कि तुम क्रूर स्वाभव के हो जाओ और कोई भी तुमसे मिलना भी पसंद न करें न ही कोई तुम्हे अथिति बनाये। यमुना को श्राप दिया कि तुम नदी बन जाओ। यम ने भी छाया को श्राप दे दिया कि आपका सूर्य की किरणें से मेल न हो सकेगा। सूर्यदेव को पता चला तो वह भागे-भागे आए और स्थिति संभाली। उन्होंने यम को वरदान दिया कि पापात्माओं को तुमसे भय होगा और संत तुमसे पीड़ित न होंगे खिन्न होकर यम ने अपनी एक नई नगरी यमपुरी बसाई। यमुना को सूर्यदेव ने आशीष दिया कि तुम गंगा के सामान पवित्र होगी और स्वयं नारायण तुमसे विवाह करेंगे। यम अब यमलोक में बसने लगे। यमपुरी में पापियों को दंड देने का कार्य संपादित करते भाई को देखकर यमुना जी गोलोक चली आई जो कि कृष्ण अवतार के समय भी थी।यमुना अपने भाई यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। वह उनसे बराबर निवेदन करती थी कभी वह उनके घर आकर भोजन स्वीकार करें लेकिन यमराज अपने काम मे व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को सदैव टाल जाते थे।बहुत समय व्यतीत हो जाने पर एक दिन सहसा यम को अपनी बहन की याद आई। उन्होंने दूत को भेजकर यमुना की खोज करवाई मगर वह मिल न सकी। फिर यमराज स्वयं ही गोलोक गये जहाँ विश्राम घाट पर यमुना जी से भेंट हुई। भाई को देखते ही यमुना जी ने हर्ष से भरकर उनका स्वागत सत्कार किया तथा उन्हें भोजन करवाया। यमराज अपने बहन द्वारा किये इस आदर सत्कार से बड़े प्रसन्न हुए और यमुना से वरदान मांगने को कहा --हे भैया मैं आपसे यह वरदान मांगना चाहती हूं कि मेरे जल में स्नान करने वाले नर -नार यमपुरी न जाये। वहा के त्रास न भोगे प्रश्न बड़ा कठिन था। यम यदि ऐसा वर दे देते तो यमपुरी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता। भाई को असमंजस में देखकर यमुना बोली--आप चिंता न करें मुझे यह वरदान दे कि जो लोग कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन बहन के यहाँ भोजन करके इस मथुरा नगरी स्थिति विश्राम घाट पर स्नान करें वे यमलोक को न जाये। यमराज ने बहन यमुना की बात को स्वीकार कर लिया। उन्होंने यमुना को आश्वासन दिया--इस तिथि को जो अपनी बहन के घर भोजन करेंगे वे यमपाश में बंधकर यमपुरी जाने के त्रास से मुक्त रहेंगे। तुम्हारे जल में स्नान करने वालो को स्वर्ग प्राप्त होगा। यमराज ने बहन यमुना को इतना बड़ा वरदान दिया। इसी कारण कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितिया के नाम से जाना जाता है। बहन और भाई के बीच प्रेम का यह त्यौहार भाई-दूज के नाम से मनाया जाता हैं। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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3 दिन पहले
#🌊यमुना जयंती 🪔 भगवती यमुना जी का आविर्भाव दिवस (चैत्र षष्ठी 'श्री यमुना जयंती') 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ चैत्र मास की शुक्लपक्ष की षष्ठी को यमुना जयंती के नाम से जाना जाता है। इसे यमुना छठ भी कहा जाता है। इसदिन यमुना जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यमुना जी (प्राकट्य रूप में) भगवान सूर्य की पुत्री है। मृत्यु के देवता यमराज इनके बडे भाई और शनिदेव यमुना जी के छोटे भाई है। यमुना भगवान श्री कृष्ण की पटरानी थी। ब्रज क्षेत्र में यमुना को माता के समान माना जाता है। इसलिये इन्हे यमुना मैया कह के पुकारा जाता है। यमुना अपने भक्तों के पापों का नाश करके उन्हे निर्मल बना देती है। सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को सर्वेश्वर माना गया है। हिंदू धर्मग्रंथों में उनकी जिन आठ पटरानियों का उल्लेख है, भगवती यमुना भी उनमें से एक हैं। पुराणों के अनुसार यमुना जी भगवान सूर्य की पुत्री होने के साथ यमराज एवं शनिदेव की बहन भी हैं। द्वापर युग में भगवती यमुना का आविर्भाव चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन हुआ था, अत: यह पावन तिथि यमुना जयंती के नाम से प्रसिद्ध हो गई। ब्रज मंडल में प्रतिवर्ष यह महोत्सव बडे धूमधाम से मनाया जाता है। मार्कण्डेय पुराण के मतानुसार गंगा-यमुना सगी बहनें हैं, जिस तरह गंगा का उद्गम गंगोत्री के समीप स्थित गोमुख से हुआ है, उसी तरह यमुना जी जब भूलोक में पधारीं, तब उनका उद्गम यमुनोत्री के समीप कालिंदगिरि से हुआ। माँ यमुना का पौराणिक महत्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यमुना नदी को यमुना देवी के रूप में पूजा जाता है। नदी के रूप में इसका उद्गम हिमालय का कालिंद पर्वत है। इसलिये यमुना को कालिंदी भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब यमुना भगवान सूर्य की पुत्री है और यमराज एवं शनिदेव की बहन है। हिंदु धर्म में यमुना पूजन, यमुना स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। ब्रजक्षेत्र में स्थानीय भाषा में कहा जाता है – यमुना यमदूतन टारत है, भव टारत है श्री राधिका रानी। इसका अर्थ है यमुना की उपासना से मृत्यु के उपरांत यमदूतों का भय नही होता और श्रीराधा जी की भक्ति करने से जातक भव सागर को पार करके मोक्ष को प्राप्त करता है। धर्मग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार यम द्वितिया अर्थात भाई दूज (कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितिया) के दिन यमुना स्नान करने से मनुष्य को मृत्यु के समय यमदूतों का भय नही रहता। इससे यमुना जी का महात्म्य पता चलता है। यमुना जी के प्राकट्य के विषय में यह कथा है कि जब श्री कृष्ण ने गोलोक में श्रीराधा जी से भूलोक पर अवतार लेने के लिये कहा तो उन्होने धरती पर यमुना के ना होने से सुख की अनुभूति ना होने की बात कही। तब श्रीकृष्ण ने यमुना जी को धरती पर अवतरित होने के लिये कहा। ऐसा माना जाता है कि यमुना जयंती के दिन प्रातःकाल यमुना स्नान करने से महान पुण्य मिलता है। जो लोग यमुना स्नान नही कर सकते वो पानी में काले तिल मिलाएं और “श्री कृष्ण शरणम ममः” मंत्र का जाप करते करते स्नान करें। ऐसा करने से जातक को भगवान श्री कृष्ण की शरण प्राप्त होती है। यमुना जी की अर्चना करने से साधक को भगवान श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। यमुना जी भगवान श्री कृष्ण की पटरानी है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जब प्रजापति दक्ष के द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने भगवान शिव की उपेक्षा और अपमान होते हुये देखा तो वो बहुत दुखी हुई और उन्होने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपनी देह त्याग दी। इस दुख से दुखित होकर भगवान शिव यमुना जल में कूद गये थे। इस कारण से यमुना जी का जल कृष्णवर्णा हो गया। एक अन्य कथा के अनुसार श्री कृष्ण यमुना जी में कालिया नाग का मर्दन किया था इस कारण यमुना जी का जल काला हो गया था। द्वापर युग में श्रीकृष्ण लीला के समय सर्वेश्वर श्रीकृष्ण एवं यमुना जी के पुनर्मिलन का वृत्तांत कुछ इस प्रकार है:- 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ एक बार श्रीकृष्ण अर्जुन को साथ लेकर घूमने गए, यमुनातट पर एक वृक्ष के नीचे दोनों विश्राम कर रहे थे। श्रीकृष्ण को ध्यान मग्न देखकर अर्जुन टहलते हुए यमुना के किनारे कुछ दूर निकल गए। वहां उन्होंने देखा कि यमुना नदी के भीतर स्वर्ण एवं रत्नों से सुसज्जित भवन में एक अतीव सुंदर स्त्री तप कर रही है। अर्जुन ने जब उससे परिचय पूछा तो उसने कहा:- "मैं सूर्यदेव की पुत्री कालिंदी हूं, भगवान श्रीकृष्ण के लिए मेरे मन में अपार श्रद्धा है और मैं उन्हीं को पाने के लिए तप कर रही हूं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।" अर्जुन ने वापस लौटकर यह वृत्तांत श्रीकृष्ण को सुनाया तो श्यामसुंदर ने कालिंदी के पास जाकर उन्हें दर्शन दिया और उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इसके बाद श्रीकृष्ण ने सूर्यदेव के समक्ष उनकी पुत्री कालिंदी (यमुना) से विवाह का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ कालिंदी का विवाह कर दिया, इस प्रकार वह द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की पटरानी बन गई। जहां श्री कृष्ण ब्रज संस्कृति के जनक कहे जाते है, वहां यमुना ब्रज संस्कृति की जननी मानी जाती है। उल्लेखनीय हैं। प्रयाग में यमुना एक विशाल नदी के रूप में प्रस्तुत होती है और वहाँ के प्रसिद्ध ऐतिहासिक किले के नीचे गंगा में मिल जाती है। ब्रज की संस्कृति में यमुना का महत्वपूर्ण स्थान है। पौराणिक स्रोत के अनुसार भूवनभास्कर सूर्य इसके पिता मृत्यु के देवता यम इसके भाई और भगवान श्री कृष्ण इसके परि स्वीकार्य किये गये हैं। जहाँ भगवान श्री कृष्ण ब्रज संस्कृति के जनक कहे जाते हैं, वहाँ यमुना इसकी जननी मानी जाती है। इस प्रकार यह सच्चे अर्थों में ब्रजवासियों की माता है। अतः ब्रज में इसे यमुना मैया कहते है। ब्रह्म पुराण में यमुना के आध्यात्मिक स्वरुप का स्पष्टीकरण करते हुए विवरण प्रस्तुत किया है जो सृष्टि का आधार है और जिसे लक्षणों से सच्चिदनंद स्वरूप कहा जाता है, उपनिषदों ने जिसका ब्रह्म रूप से गायन किया है, वही परमतत्व साक्षात् यमुना है। यमुना भारत की एक नदी है। यह गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है जो यह यमुनोत्री (उत्तरकाशी से ३० किमी उत्तर, गढ़वाल में) नामक जगह ब्रजभाषा के भक्त कवियों और विशेषतः वल्लभ सम्प्रदायी कवियों ने गिरिराज गोवर्धन की भाँति यमुना के प्रति भी अतिशय श्रद्धा व्यक्त की है। इस सम्प्रदाय का शायद ही कोई कवि हो, जिसने अपनी यमुना के प्रति अपनी काव्य श्रद्धांजलि अर्पित न की हो। उनका यमुना स्तुति संबंधी साहित्य ब्रजभाषा भक्ति काव्य का एक उल्लेखनीय अंग है। है। पुराणों में यमुना की महिमा कही गयी है। संवत 1549 में जब महाप्रभु वल्लभाचार्य ने यमुना अष्टक' की रचना की, तब यमुना का स्वरूप मनोहारी था। यमुना जी के दोनों किनारे सुन्दर वनों से पुष्प यमुना जी में झरते हैं और देव-दानव अर्थात दीन भाव वाले भक्त भली-भाँति पूजा करते हैं। उनके जल में उठती तरंगे मानों उनके हाथ के कंगन हैं किनारों पर चमकती रेत कंगनों में फंसे मोती हैं। दोनों तट उनके नितंब हैं। आप अगणित गुणों से शोभित है। शिव, ब्रह्मा और देव आपकी स्तुति करते हैं। जल प्रपूरित मेघश्याम बादलों जैसा आपका वर्ण है। श्री यमुना के साथ गंगा का संगम होने से गंगा जी भगवान की प्रिय बन, फिर गंगा जी ने उनके भक्तों को भगवान की सभी सिध्दियां प्रदान की। आपको नमन है, आपका चरित्र अद्भुत है। आपके पय के पान करने से कभी यमराज की पीड़ाएं नहीं भोगनी पड़तीं। स्वयं की संतानें दुष्ट हो तो भी यमराज उन्हें किस तरह मारे। यमुना जयंती पर क्या करें 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यमुना जयंती के दिन यमुना स्नान व यमुना आरती करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है। ब्रज क्षेत्र में यमुना मैया की बहुत मान्यता है, यमुना जयंती पर यमुना पूजन करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। यमुना जयंती के दिन प्रात:काल जल में काले तिल डालकर स्नान करें। स्नान करते समय “श्री कृष्ण शरणम ममः” मंत्र का जाप करें। इस दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा करनी चाहिये। उन्हे भोग लगाना चाहिये और उस प्रसाद को सभी में बाँटना चाहिये। कृष्ण जी के मंदिर जाकर दर्शन करने चाहिये। यमुना छठ पर यमुना नदी में दीपदान करने से जातक की सभी मनोकामनायें पूर्ण होती है। यमुना छठ पर भक्त निर्जल व्रत का पालन करते है और अगले दिन (सप्तमी के दिन) सुबह स्नान के बाद व्रत का पारण करते है। इस व्रत को करने से जातक शुद्ध हो जाता है और उसके सभी पापों का नाश हो जाता है। यमुनाष्टकम 〰️〰️〰️〰️ मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी। मनोऽनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जधूतदुर्मदा धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥१॥ आपकी नदी का जल मुरारी (श्रीकृष्ण) के शरीर के सुंदर (नीले) रंग को छूता है। और इसलिए कृष्ण के स्पर्श के कारण ये स्वर्ग को तुच्छ बनाकर, तीनों संसार के दुखों को दूर करने के लिए आगे बढ़ता है। श्री कृष्ण के द्वारा स्पर्श की गयी ये यमुना जी की धारा हमारे अहंकार को मिटा देती है और हमें भक्तिमय बना देती है। हे कालिंदी नंदिनी , कृपया करके मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो। मलापहारिवारिपूरभूरिमण्डितामृता भृशं प्रपातकप्रवञ्चनातिपण्डितानिशम्। सुनन्दनन्दनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥२॥ आपकी नदी का पानी, जो अशुद्धियों को दूर करता है, प्रचुर मात्रा में अमृत जैसे गुणों से जो भरा है , जो पापियों के मन में गहरे बैठे पापों को धोने में एक विशेषज्ञ है, न जाने कितने युगो से सबके पाप आप धोती आ रही है लगातार, आपका जल अत्यंत लाभकारी है, पुण्य नंदा गोप के पुत्र के शरीर के स्पर्श से रंगीन हो रहा है हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो, लसत्तरङ्गसङ्गधूतभूतजातपातका नवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका। तटान्तवासदासहंससंसृता हि कामदा धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥३॥ आपकी चमक और चंचल लहरों का स्पर्श जीवित जीवों में उठने वाले पापों को धो देता है, इनमे कई चातक पक्षियों (प्रतीकात्मक) का निवास करते है जो भक्ति (भक्ति) से पैदा हुई ताजी मिठास भरे जल ले जाते हैं (और एक भक्त हमेशा भक्ति की ओर देखते हैं जैसे चातक पक्षी पानी की ओर देखते हैं) आप इतनी कृपामयी हो जल पे बैठे एक हंस को भी आशीर्वाद देती हो जो आपकी नदी के किनारों की सीमा पर अभिसरण और निवास करते हैं, हे कालिंदी नंदिनी (कालिंद पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो, विहाररासखेदभेदधीरतीरमारुता गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता। प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदा धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥४॥ हे यमुना महारानी आपके इस शांत नदी के किनारे हमे अतीत के वो राधा-कृष्णा और गोपियों की रास लीला की याद दिलाती है और इसे वृन्दावन की कई यादें जुड़ी हैं, और जब इन आध्यत्मिक संगम के साथ जो कोई आपका दर्शन करता है तब आपकी नदी के जल की सुंदरता और बढ़ जाती है। आपके जल के प्रवाह के साथ संबंध के कारण, पृथ्वी और अन्य नदियाँ भी शुद्ध हो गई हैं, हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो, तरङ्गसङ्गसैकताञ्चितान्तरा सदासिता शरन्निशाकरांशुमञ्जुमञ्जरीसभाजिता। भवार्चनाय चारुणाम्बुनाधुना विशारदा धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥५॥ नदी के रेत हमेशा आपके बहने वाली लहरों के संपर्क में रहने से चमकती रहती है, नदी और नदी के किनारे शरद ऋतु की रात को और खूबसूरत दीखते है। जो आपके इस रूप की पूजा करते है आप उस संसार के लोगो के सभी पापो को धोने में परनता सक्षम हो। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंद पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो। जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणी स्वभर्तुरन्यदुर्लभाङ्गसङ्गतांशभागिनी स्वदत्तसुप्तसप्तसिन्धुभेदनातिकोविदा। धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥६॥ आपकी नदी-देह उस सुंदर राधारानी के स्पर्श से रंगी है जो आपके इस जल से श्रीकृष्ण के साथ खेला करती थी। आप दूसरों को उस पवित्र स्पर्श (राधा-कृष्ण के) से पोषण करती हो , जिसे प्राप्त करना बहुत मुश्किल है, आप सप्त सिन्धु (सात नदियों) के साथ पवित्र स्पर्श को भी चुपचाप साझा करती हो, आप तेज और कृपा फ़ैलाने पे अति निपुण हैं। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो, जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनी विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी। सदावगाहनावतीर्णभर्तृभृत्यनारदा धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥७॥ आपके इस नदी जल में अच्युता (श्रीकृष्ण) का रंग मिल गया है, तभी आप श्यामल दिखती हो जब वह भावुक गोपियों के साथ खेलते थे , जो मधुमक्खियों की तरह उनके संग घूमती थी। और कभी कभी ऐसा लगता है जैसा राधा रानी के बालो पे लगे काम्पका फूल पे जैसे मधुमखियाँ घूम रही हो। (और आपके नदी में भगवान के सेवक नारद, हमेशा स्नान करने के लिए उतरते हैं। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो, सदैव नन्दनन्दकेलिशालिकुञ्जमञ्जुला तटोत्थफुल्लमल्लिकाकदम्बरेणुसूज्ज्वला जलावगाहिनां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥८॥ आपका नदी-तट सुंदर घाटियों में नंदा का बेटा (यानी श्रीकृष्ण) हमेशा खेलते हैं, और आपके नदी के किनारे मल्लिका और कदंब के फूलों के पराग (यानी फूल) के साथ चमकता ही रहता है। वे व्यक्ति जो आपकी नदी के पानी में स्नान करते हैं, आप उन्हें दुनियावी अस्तित्व के महासागर में ले जाते हैं उस परमांनद की अनभूति कराती है। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो, यमुना अष्टकम पढ़ने के लाभ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यमुना महारानी जो की सूर्य की बेटी, जो लोग इस आठ गुना प्रशंसा का आनंद लेते हैं इसे पढ़ते है। उनकी सभी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और श्री कृष्ण उनको प्यार करते हैं। उसके माध्यम से सभी भक्ति शक्तियाँ प्राप्त होती हैं और श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं। वह भक्तों के स्वभाव को बदल देता है। जो व्यक्ति मुक्ति- भक्ति चाहते हैं, उन्हें नियमित रूप से यमुना अष्टकम का पाठ करना चाहिए। * भगवान श्रीकृष्ण की प्रिया यमुना ब्रजमंडल की आराध्या हैं, ब्रजवासी इन्हें नदी नहीं, बल्कि साक्षात देवी ही मानते हैं। * मथुरा के विश्राम घाट तथा वृंदावन के केशी घाट पर प्रतिदिन होने वाली यमुना जी की आरती में अंसख्य श्रद्धालु भाग लेते हैं। * ब्रज में आने वाला हर तीर्थयात्री यमुना जी का पूजन करके उन्हें दीपदान अवश्य करता है। * मनोरथ पूर्ण होने पर भक्तगण अनेक साडियों को जोडकर यमुना जी को चुनरी चढाते हैं। * ब्रजमंडल में ठाकुर जी का स्नान तथा उनके भोग की तैयारी यमुना जल से ही होती है। * श्रीनाथ जी का श्रीविग्रह ब्रज से मेवाड भले ही पहुंच गया हो, पर उनकी सेवाओं में केवल यमुनाजल का ही प्रयोग होता है। आज भी मथुरा से नित्य यमुनाजल सुरक्षित पात्रों में भरकर श्रीनाथद्वारा भेजा जाता है। * यमुनाजी का वाहन कच्छप (कछुआ) है। आदिवाराह पुराण के अनुसार यमुनाजी में स्नान करने से जन्मान्तर के पाप भस्म हो जाते हैं। इतना ही नहीं जो व्यक्ति दूर रहकर भी भक्ति भावना के साथ यमुनाजी का स्मरण करता है वह भी पवित्र हो जाता है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज हमने यमुना जी को प्रदूषित कर दिया है। अत: उन्हें प्रदूषण से मुक्त कराने के लिए हमें सार्थक प्रयास करना होगा, तभी हमारा यमुना पूजन सफल होगा। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️