#ନମୋ ଭଗବତେ ବାସୁଦେବାୟ एकादशी व्रत कथा?*
*परम एकादशी (जिसे परमा या कामदा एकादशी भी कहा जाता है) हर तीन साल में एक बार अधिक मास (मलमास) के कृष्ण पक्ष में आती है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। इस व्रत के प्रभाव से दरिद्रता दूर होती है, समस्त पापों का नाश होता है और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।परमा एकादशी व्रत कथा (Parama Ekadashi Vrat Katha)पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम के एक अत्यंत धर्मात्मा और पुण्यवान ब्राह्मण रहते थे*
*उनकी पत्नी का नाम पवित्रा था, जो बहुत ही पतिव्रता और संस्कारी थीं। अत्यधिक धर्म-कर्म करने के बावजूद, पूर्व जन्म के कर्मों के कारण यह दंपत्ति भीषण गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहा था। स्थिति यह थी कि सुमेधा ब्राह्मण को भिक्षा मांगकर भी भरपेट भोजन नहीं मिल पाता था।अपने पति की इस दयनीय स्थिति को देखकर पवित्रा ने कहा, "हे स्वामी! दरिद्रता सबसे बड़ा कष्ट है। हमें धन कमाने के लिए किसी अन्य देश में जाना चाहिए।" इस पर सुमेधा ने उत्तर दिया, "बिना भाग्य के धन नहीं मिलता। जहाँ हम जाते हैं, वहीं का भाग्य साथ चलता है। इसलिए हमें यहीं रहकर अपने कर्मों को भोगना चाहिए।"एक दिन उस नगर में महर्षि कौण्डिन्य का आगमन हुआ。 सुमेधा और उनकी पत्नी ने बड़े ही आदर-सत्कार के साथ ऋषि की सेवा की और अपनी दरिद्रता दूर करने का उपाय पूछा*
*तब महर्षि कौण्डिन्य ने उन्हें बताया, "अधिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली परमा एकादशी अत्यंत फलदायी और चमत्कारी है। यह व्रत स्वयं भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और यह सभी पापों व दरिद्रता को नष्ट कर देती है।"ऋषि की आज्ञा के अनुसार सुमेधा और उनकी पत्नी पवित्रा ने पूरी श्रद्धा, नियम और निष्ठा के साथ पांच दिनों तक निर्जल रहकर परमा एकादशी का व्रत किया और रात्रि में भगवान विष्णु की स्तुति की।इस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उन्हें दरिद्रता समाप्त होने का वरदान दिया। कुछ ही समय में उनके घर में धन-धान्य की वर्षा होने लगी और वे अपने जीवन में सभी सुख-सुविधाएं भोगकर अंत में बैकुंठ लोक (श्रीहरि के धाम) को प्राप्त हुए।इस कथा के अनुसार, जो भी भक्त इस व्रत को करता है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।*
*अन्य महत्वपूर्ण जानकारी:महिमा: ऐसी मान्यता है कि धन के देवता कुबेर ने भी इस एकादशी का व्रत किया था, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें देवताओं का कोषाध्यक्ष बनाया था।राजा हरिश्चंद्र ने भी अपनी पत्नी और बच्चे को बेचे जाने के कष्ट से मुक्ति के लिए इस एकादशी का व्रत किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हो गया था।*