sant ramp ji

gajendra singh lodhi
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1 days ago
#संत रामपाल जी #Annapurna_Muhim_SantRampalJi अन्नपुर्णा मुहिम विश्व के लिए वरदान दिल्ली के सुल्तानपुरी में गरीबी और संघर्ष झेल रही विधवा मां और दो बेटियों के जीवन में संत रामपाल जी महाराज की अन्नपुर्णा मुहिम ने आशा जगाई। अवश्य देखें Annapurna Muhim YouTube Channel पर
Rajhans Kumar
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2 days ago
#संत रामपाल जी महाराज जी पूरे विश्व में पाखण्ड का दुकान पर ताला लगाने वाले मात्र एक संत है
Vijay Dass
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3 days ago
True worship (Satbhakti) grants deliverance from the affliction of birth and death. Thereafter, the soul never again wanders through the cycle of the 8.4 million species. It is solely through the practice of true worship that KavirDev (Kabir Saheb Ji) liberates the soul from the captivity of Kaal (Time/Death) and transports it to Satlok—the immortal and imperishable realm. Evidence found in Rigveda, Mandala 10—Hymn 161 (Verses 2, 5), Hymn 162 (Verse 5), and Hymn 163 (Verses 1–3)—affirms that the Supreme God, Kabir Saheb Ji, extends the lifespan of those who engage in true worship; furthermore, even if a sick person is on the verge of death, He can restore their health and bestow upon them a full lifespan of one hundred years. #TrueWorship_EndsSuffering #SaTrueStoryYouTubeChannel #worship #faith #cancer #fyp #coloncancer #healthcare #stroke #digitalhealth #cancertreatment #healthsecrets #meditation #waheguru #harharmahadev #shiv #viralreels #SantRampalJiMaharaj #TrueGuru #TatvdarshiSant #sant ram pal ji maharaj #me follow
gajendra singh lodhi
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5 days ago
#संत रामपाल जी #TrueWorship_EndsSuffering सतभक्ति से मिले अजब गजब सुख संत रामपाल जी महाराज जी से नाम उपदेश लेने के बाद चर्मरोग से मिला छुटकारा। Sa True Story YtChannel
gajendra singh lodhi
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7 days ago
#संत रामपाल जी #Facts_About_EasterSunday ईसा मसीह की पूज्य माता जी का नाम मरियम तथा पूज्य पिताजी का नाम यूसुफ था। परन्तु मरियम को गर्भ एक देवता से रहा था। यूसुफ ने मरियम को त्यागना चाहा तो स्वपन में (फरिश्ते) देवदूत ने ऐसा न करने को कहा तथा यूसुफ मरियम के साथ पति-पत्नी रूप में रहे।
gajendra singh lodhi
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13 days ago
#संत रामपाल जी #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 नहीं हुआ ब्रह्मा के पैरों से दलितों की उत्पत्ति संत रामपाल जी महाराज करेंगे रहस्य का उद्घाटन अवश्य देखिए डॉ. भीमराव अंबेडकर जी की बड़ी भूल । भाग - 2 Factful Debates यूट्यूब चैनल पर
Vijay Dass
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13 days ago
#GodMorningMonday #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 , चौसठ लाख शिष्यों की परिक्षा लेना परमात्मा कबीर जी विशेषकर ऐसी लीला उस समय किया करते जिस समय दिल्ली का सम्राट सिकंदर लोधी काशी नगरी में आया हो। उस समय सिकंदर लोधी राजा काशी में उपस्थित था। काजी-पंडितों ने राजा को शिकायत कर दी कि कबीर जुलाहे ने जुल्म कर दिया। शर्म-लाज समाप्त करके सरेआम वैश्या के साथ हाथी के ऊपर गलत कार्य कर रहा था। शराब पी रहा है। राजा ने तुरंत पकड़कर गंगा में डुबोकर मारने का आदेश दिया। अपने हाथों से राजा सिकंदर ने हाथों में हथकड़ी तथा पैरों में बेड़ी तथा गले में तोक लगाई। नौका में बैठाकर गंगा दरिया के मध्य में ले जाकर दरिया में सिपाहियों ने पटक दिया। हथकड़ी, बेड़ी तथा तोक अपने आप टूटकर जल में गिर गई। परमात्मा जल पर पद्म आसन लगाकर बैठ गए। नीचे से गंगा जल चक्कर काटता हुआ बह रहा था। परमात्मा जल के ऊपर आराम से बैठे थे। कुछ समय उपरांत परमात्मा कबीर जी गंगा के किनारे आ गए। सिपाहियों ने शेखतकी के आदेश से कबीर जी को पकड़ कर नौका में बैठाकर कबीर परमात्मा के पैरों तथा कमर पर भारी पत्थर बाँधकर हाथ पीछे को रस्सी से बाँधकर गंगा दरिया के मध्य में फैंक दिया। रस्से टूट गए। पत्थर जल में डूब गए। परमेश्वर कबीर जी जल के ऊपर बैठे रह गए। जब देखा कि कबीर गंगा दरिया में डूबा नहीं तो क्रोधित होकर शेखतकी ने राजा से कहकर तोब के गोले मारने का आदेश दे दिया। पहले कबीर जी को पत्थर मारे, गोली मारी, तीर मारे। अंत में तोब के गोले चार पहर यानि बारह घण्टे तक कबीर जी के ऊपर चलाए। कोई तो वहीं किनारे पर गिर जाता, कोई दूसरे किनारे पर जाकर गिरता, कोई दूर तालाब में जाकर गिरता। एक भी गोला, पत्थर, बंदूक की गोली या तीर परमेश्वर कबीर जी के आसपास भी नहीं गया। इतना कुछ देखकर भी काशी के व्यक्ति परमेश्वर को नहीं पहचान पाए। तब परमेश्वर कबीर जी ने देखा कि ये तो अक्ल के अँधे हैं। ‌‌उसी समय गंगा के जल में समा गए और अपने भक्त रविदास जी के घर प्रकट हो गए। दर्शकों को विश्वास हो गया कि कबीर जुलाहा गंगा जल में डूबकर मर गया है। उसके ऊपर रेत व रेग (गारा) जम गई होगी। सब खुशी मनाते हुए नाचते-कूदते हुए नगर को चल पड़े। शेखतकी अपनी मण्डली के साथ संत रविदास जी के घर यह बताने के लिए गया कि जिस कबीर जी को तुम परमात्मा कहते थे, वह डूब गया है, मर गया है। संत रविदास जी के घर पर जाकर देखा तो कबीर जी इकतारा बजा-बजाकर शब्द गा रहे थे। शेखतकी की तो माँ सी मर गई। राजा सिकंदर के पास जाकर बताया कि वह आँखें बचाकर भाग गया है। रविदास के घर बैठा है। यह सुनकर बादशाह सिंकदर लोधी संत रविदास जी की कुटी पर गया। परमात्मा कबीर जी वहाँ से अंतध्र्यान होकर गंगा दरिया के मध्य में जल के ऊपर समाधि लगाकर जैसे जमीन पर बैठते हैं, ऐसे बैठ गए। रविदास से पूछा कि कबीर जी कहाँ पर हैं? संत रविदास जी ने कहा कि हे बादशाह जी! वे पूर्ण परमात्मा हैं, वे ही अलख अल्लाह हैं। आप इन्हें पहचानो। वे तो मर्जी के मालिक हैं। जहाँ चाहें चले जाऐं। मुझे कुछ नहीं पता, कहाँ चले गए? वे तो सबके साथ रहते हैं। उसी समय किसी ने बताया कि कबीर जी तो गंगा के बीच में बैठे भक्ति कर रहे हैं। सब व्यक्ति तथा राजा व सिपाही गंगा दरिया के किनारे फिर से गए। राजा ने नौका भेजकर मल्लाहों के द्वारा संदेश भेजा कि बाहर आऐं। मल्लाहों ने नौका कबीर जी के पास ले जाकर राजा का आदेश सुनाया कि आपको सिकंदर बादशाह याद कर रहे हैं। आप चलिए। परमेश्वर कबीर जी उस जहाज (बड़ी नौका) में बैठकर किनारे आए। राजा सिकंदर ने फिर गिरफ्तार करवाकर हाथ-पैर बाँधकर खूनी हाथी से मरवाने की आज्ञा कर दी। चारों और जनता खड़ी थी। सिकंदर ऊँचे स्थान पर बैठे थे। परमात्मा को बाँध-जूड़कर पृथ्वी पर डाल रखा था। महावत (हाथी के ड्राइवर) ने हाथी को शराब पिलाई और कबीर जी को कुचलकर मरवाने के लिए कबीर जी की ओर बढ़ा। कबीर जी ने अपने पास एक बब्बर सिंह खड़ा दिखा दिया। वह केवल हाथी को दिखा। हाथी चिंघाड़कर डर के मारे वापिस भाग गया। महावत को नौकरी का भय सताने लगा। हाथी को भाले मार-मारकर कबीर जी की ओर ले जाने लगा, परंतु हाथी उल्टा भागे। तब पीलवान (महावत) को भी शेर खड़ा दिखाई दिया तो डर के मारे उसके हाथ से अंकुश गिर गया। हाथी भाग गया। परमेश्वर कबीर जी के बंधन टूट गए। कबीर जी खड़े हुए तथा अंगड़ाई ली तो लंबे बढ़ गए। सिर आसमान को छूआ दिखाई देने लगा। प्रकाशमान शरीर दिखाई देने लगा। सिकंदर राजा भय से काँपता हुआ परमेश्वर कबीर जी के चरणों में गिर गया। क्षमा याचना की तथा कहा कि आप परमेश्वर हैं। मेरी जान बख्शो। मेरे से भारी भूल हुई है। मैं अब आपको पहचान गया हूँ। आप स्वयं अल्लाह पृथ्वी पर आए हो। तब परमेश्वर कबीर जी काशी नगर में आए तथा उसी गणिका के मकान के चैंक में बैठ गए। लड़की परमात्मा के चरण दबा रही थी। परमेश्वर कबीर जी के पैर अपनी साथलों (घुटनों से ऊपर की टाँग) पर रख लिए। फिर गणिका कै संग चले, शीशी भरी शराब। गरीबदास उस पुरी में, जुलहा भया खराब।।726।। तारी बाजी पुरी में, भिष्ट जुलहदी नीच। गरीबदास गनिका सजी, दहूं संतौं कै बीच।।727।। गावत बैंन बिलासपद, गंगाजल पीवंत। गरीबदास विह्नल भये, मतवाले घूमंत।।728।। भडु.वा भडु.वा सब कहैं, कोई न जानैं खोज। दास गरीब कबीर करम, बांटत शिरका बोझ।।729।। देखो गनिका संगि लई, कहते कौंम छतीस। गरीबदास इस जुलहदी का, दर्शन आन हदीस।।730।। शाह सिकंदर कूं सुनी, भिष्ट हुये दो संत। गरीबदास च्यारों वरण, उठि लागे सब पंथ।।731।। च्यारि वरण षट आश्रम, दोनौं दीन खुशाल। गरीबदास हिंदू तुरक, पड्या शहर गलि जाल।।732।। शाह सिकंदरकै गये, सुनि कबले अरदास। गरीबदास तलबां हुई, पकरे दोनौं दास।।733।। कहौ कबीर यौह क्या किया, गनिका लिन्हीं संग। गरीबदास भूले भक्ति, पर्या भजन में भंग।।734।। सुनौं सिकंदर बादशाह, हमरी अरज अवाज। गरीबदास वह राखिसी, जिन यौह साज्या साज।।735।। जड़ियां तौंक जंजीर गल, शाह सिकंदर आप। गरीबदास पद लीन है, तारी अजपा जाप।।736।। हाथौं जड़ी हथकड़ी, पग बेड़ी पहिराय। गरीबदास बीच गंग में, तहां दीन्हा छिटकाय।।737।। झड़ि गये तौंक जंजीर सब, लगै किनारै आय। गरीबदास देखै खलक, स्यौं काजी बादशाह।।738।। नीचै नीचै गंगाजल, ऊपर आसन थीर। गरीबदास बूडै़ नहीं, बैठे अधर कबीर।।739।। योह अचरज कैसा भया, देखैं दोनौं दीन। गरीबदास काजी कहंै, बांधि दिया जल सीन।।740।। गल में फांसी डारि करि, बांधौ शिला सुधारि। गरीबदास यौह जुलहदी, जब बूडै़ गंगधार।।741।। शिला धरी जब नाव में, बांधी गलै कबीर। गरीबदास फंद टूटि कै, ना डूबै जलनीर।।742।। शिला चली शाह और कौं, देखत काशी ख्याल। गरीबदास कबीर का आसन अधर हमाल।।743।। तीर बाण गोली चलैं, तोप रहकल्यौं शोर। गरीबदास उस जुलहदीकै, गई एक नहीं ओर।।744।। अधर धार गोले बहैं, जलकै बीच गभाक। गरीबदास उस जुलहदी पर, शस्त्रा छूटैं लाख।।745।। तोप रहकले सब चलैं, तीर बाण कमान। गरीबदास वह जुलहदी, जल पर रहै अमान।।746।। अधरि धार अपार गति, जल परि लगी समाधि। गरीबदास निज ब्रह्मपद, खेलैं आदि अनादि।।747।। जुलम हुआ बूडै़ नहीं, शस्त्रा लगै न बाण। गरीबदास इब कौंन गति, कैसैं लीजै प्राण।।748।। लगी समाधी अगाध में, बिचरै काशी गंग। गरीबदास किलोल सर, छूहैं चरण तरंग।।749।। च्यारि पहर गोले बगे, धमी मुलक मैदान। गरीबदास पोखर सुखैं, रहे कबीर अमान।।750।। अपनी करनी सब करी, थाके दोनौं दीन। गरीबदास अब जुलहदी, पैठि गये जलमीन।।751।। डूब्या डूब्या सब कहैं, हो गये गारत गोर। गरीबदास कबले धनी, तुम आगै क्या जोर।।752।। आनंद मंगल होत है, बटैं बधाई बेग। गरीबदास उस जुलहदी पर फिर गई रेती रेघ।।753।। हस्ती घोडे़ चढत हैं, पान मिठाई चीर। गरीबदास काशी खुसी, बूडे़ गंग कबीर।।754।। जावो घरि रैदासकै, हिलकारे हजूर। गरीबदास खुसिया कहौ, कहियो नहीं कसूर।।755।। झालरि ढोलक बजत हैं, गावैं शब्द कबीर। गरीबदास रैदास संगि, दोनौं एकही तीर।।756।। काजी पंडित सब गये, शाह सिकंदर उठ। गरीबदास रैदासकै, भेष गये जटजूट।।757।। कोठी कुठले सब झके, बासन टींडर गोलि। गरीबदास रहदास सुनौं, कहां गये वह बोल।।758।। वे प्रगट पूरण पुरूष हैं, अबिनाशी अलख अल्लाह। गरीबदास रैहदास कहैं, सुनौं सिकंदर शाह।।759।। सूरजमुखी सुभांन सर, खिले फूल गुलजार। गरीबदास काजी पंडित करता शाह पुकार।।760।। शाह सिकंदर फिर गये, उस गंगा कै तीर। दास गरीब कबीर हरी, बैठे ऊपर नीर।।761।। बैठि मलाह जिहाज में, गये धार कै बीच। गरीबदास हरि हरि करैं, प्रेम फुहारे सीच।।762।। करी अरज मलाह तहां, दीन दुनी बादशाह। गरीबदास आसन उधर, लगी समाधि जुलाह।।763।। भंवर फिरत हैं गंग जल, फूल उगानें कोटि। गरीबदास तहां बंदगी, हरिजन हरि की ओट।।764।। संकल सीढी लाय करि, उतरे तहां मलाह। गरीबदास हम बंदगी, याद किये बादशाह।।765।। बैठ कबीर जहाज में, आये गंगा घाट। गरीबदास काशी थकी, हांडे बौह बिधि बाट।।766।। ‘खूनी हाथी से कबीर परमेश्वर को मरवाने की कुचेष्टा’’ खूनी हाथी मस्त है, पग बंधे जंजीर। गरीबदास जहां डारिया, मसक बांधि कबीर।।767।। सिंह रूप साहिब धर्या, भागे उलटे फील। गरीबदास नहीं समझती, याह दुनिया खलील।।768।। बने केहरी सिंह जित, चैंर शिखर असमांन। गरीबदास हस्ती लख्या, दीखै नहीं जिहांन।।769।। कूटै शीश महावतं, अंकुश शीर गरगाप। गरीबदास उलटा भगै, तारी दीजैं थाप।।770।। भाले कोखौं मारिये, चरखी छूटैं पाख। गरीबदास नहीं निकट जाय, किलकी देवैं लाख।।771।। जैसी भक्ति कबीर की, ऐसी करै न कोय। गरीबदास कुंजर थके, उलटे भागे रोय।।772।। दुंम गोवैं मंूडी धुनैं, सैंन न समझै एक। गरीबदास दीखै नहीं, आगै खड़ा अलेख।।773।। पीलवान देख्या तबै, खड़ा केहरी सिंघ। गरीबदास आये तहां, धरि मौला बहु रंग।।774।। उतरे मौला अरस तैं, भाव भक्ति कै हेत। गरीबदास तब शाह लखे, कबीर पुरूष सहेत।।775।। लीला की कबीर ने, दो रूप में रहे दीस। दासगरीब कबीर कै, पास खडे़ जगदीश।।776।। जंभाई अंगडाईयां, लंबे भये दयाल। गरीबदास उस शाह कूं, मानौं दश्र्या काल।।777।। कोटि चन्द्र शशि भान मुख, गिरद कुंड दुम लील। गरीबदास तहां ना टिके, भागि गये रनफील।।778।। नयन लाल भौंह पीत हैं, डूंगर नक पहार। गरीबदास उस शाह कूं, सिंह रूप दीदार।।779।। मस्तक शिखर स्वर्ग लग, दीरघ देह बिलंद। गरीबदास हरि ऊतरे, काटन जम के फंद।।780। गिरद नाभि निरभै कला, दुदकारै नहीं कोय। गरीबदास त्रिलोकि में, गाज तास की होय।।781।। ज्यूं नरसिंह प्रहलादकै, यूं वह नरसिंह एक। गरीबदास हरि आईया, राखन जनकी टेक।।782।। बार-बार सताय कर, मस्तक लीना भार। गरीबदास शाह यौं कहै, बकसौ इबकी बार।।783।। तहां सिंह ल्यौलीन हुआ, परचा इबकी बार। गरीबदास शाह यौं कहै, अल्लह दिया दीदार।।784।। सुन काशी के पण्डितौ, काजी मुल्लां पीर। गरीबदास इसके चरण ल्यौह, अलह अलेख कबीर।।785।। यौह कबीर अल्लाह है, उतरे काशी धाम। गरीबदास शाह यौं कहैं, झगर मूंये बे काम।।786।। काजी पंडित रूठिया, हम त्याग्या योह देश। गरीबदास षटदल कहैं, जादू सिहर हमेश।।787।। इन जादू जंतर किया, हस्ती दिया भगाय। गरीबदास इत ना रहैं, काशी बिडरी जाय।।788।। काशी बिडरी चहौं दिशा, थांभन हारा एक। गरीबदास कैसे थंभै, बिडरे बौहत अनेक।।789।। Factful Debates YouTube #sant ram pal ji maharaj #me follow
Vijay Dass
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13 days ago
#GodMorningMonday #डॉBRअंबेडकरजी_कीबड़ीभूलPart2 . गरीब, यह चूक, धूरो दूर ! छःसौ वर्ष बाद वही इतिहास दोहराने की कोशिश हो रही है। छःसौ वर्ष पहले भी जब कबीर परमेश्वर जी हमें निज धाम सतलोक ले जाने के लिये आये थे तो उस वक्त भी उनको बहुत संघर्ष करना पड़ा था पाखंडी पंडितो ओर मुल्ला काजियो ने कबीर परमात्मा का बहुत विरोध किया। उन्हे झूठा बदनाम किया उन्हे यहां तक की उन्हे खत्म करने के लिये सभी प्रयास किये तोप से उड़ाने की कोशिश, भूखे शेर के पिंजरे में डाला, हाथी से कुचलना चाहा तो कभी गंगा में डुबोना चाहा, उबलते गर्म तेल की कड़ाई में डाला लेकिन वो दुष्ट लोग अविनाशी कबीर परमात्मा का कुछ नही बिगाड़ पाये। वो कबीर परमात्मा चाहते तो क्षण भर में सबको सबक सिखा सकते थे, लेकिन उन्होने ऐसा नही किया परमात्मा कहते है । यह सब मेरी ही आत्माये है। यह भटके हुऐ है क्योकि बच्चे जितने मर्जी बुरे हो जाये, लेकिन मां बाप कभी गलत नही हो सकता। इसलिये परमात्मा उनके जैसा नही बन सकता बल्कि हमे सीधे मार्ग पर लाने लिये हर कष्ट को सहन किये। लेकिन हम नीच लोग फिर भी परमात्मा को पहचान नही पाये, ओर वो 120 वर्ष लीला करने के बाद मगहर से सहशरीर वापिस सतलोक चले गये। और हम आज तक इस गंदे लोक में भटक रहे है। यह हमारी उसी गलती की सजा है। अब छःसौ वर्षो बाद परमात्मा पुनः आये है। फिर वही लीला कर रहे है। और हमारे लिये बहुत जुल्म सह रहे है। दूसरी बार जेल चले गये। लेकिन हम नीच फिर वही गलती दोहराने की राह पर चल रहे है लेकिन इस बार यह अंतिम मौका है। गरीब, यह चूक, धूरो दूर ! अब कि चूक गये तो पता नही काल कहां पटकेगा। लख चौरासी के फेर में कुत्ते गधे सुअर बनकर यहीं धक्के खाते रहेंगे। पिछली गलती को न दोहराये। इसलिये भक्तसमाज से निवेदन है की संत रामपाल जी को पहचानो। उनके वचनो को सुनो फिर अपने विवेक से निर्णय करो की संत रामपाल जी क्या है? ऐसे ही किसी कही सुनी बातो पर विश्वास करके संत रामपाल जी को बुरा न समझे। वो सबका कल्याण करने के लिये आये है। यह सुनहरा अवसर है। संत रामपाल जी की शरण में आओ और अपना कल्याण करवाओ। गरीब, मानुष जीवन दुर्लभ है, मिले न बारम्बार ! जैसे तरूवर से पत्ता टूट गिरे, बहुर लगे न डार !! Factful Debates YouTube #sant ram pal ji maharaj #me follow