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कथा के अनुसार, द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण द्वारका के राजा थे, तब उनके बचपन के सखा श्रीधामा ब्रज में ही रहते थे। समय बीतने पर श्रीधामा के पुत्र का विवाह तय हुआ। श्रीधामा ने प्रेमवश अपने सखा कृष्ण को निमंत्रण भेजा, लेकिन वे जानते थे कि कृष्ण अब द्वारकाधीश हैं और शायद उनका आना संभव न हो।
जब विवाह संपन्न हुआ और बहू घर आई, तब ब्रज की परंपरा के अनुसार 'मुँह दिखाई' की रस्म शुरू हुई। गाँव की गोपियाँ और सखियाँ आकर बहू का मुख देख रही थीं और उसे उपहार दे रही थीं। श्रीधामा के मन में एक ही इच्छा थी—"काश! मेरा कन्हैया भी यहाँ होता।"
ठाकुर जी का वेश बदलकर आना
भक्त की पुकार सुनकर ठाकुर जी कैसे रुक सकते थे? कृष्ण ने एक वृद्ध सखी (बुढ़िया) का रूप धरा। उन्होंने सिर पर ओढ़नी डाली, हाथों में चूड़ियाँ पहनीं और लचकते हुए श्रीधामा के आँगन में पहुँच गए।
भगवान कृष्ण, जो ब्रह्मांड के स्वामी हैं, अपनी बहू (सखा के पुत्र की पत्नी) का मुख देखने के लिए एक साधारण स्त्री बन गए।
जब ठाकुर जी की बारी आई, तो उन्होंने बड़े लाड़ से बहू का घूँघट उठाया। उन्होंने उपहार स्वरूप उसे कोई साधारण आभूषण नहीं, बल्कि अपनी वह दिव्य मुस्कान और आशीर्वाद दिया जिससे उसका वैवाहिक जीवन धन्य हो गया।
कहते हैं कि श्रीधामा ने उस वृद्ध सखी की चाल और उसकी आँखों की चमक से उसे पहचान लिया। जब श्रीधामा ने मुस्कुराते हुए उनकी ओर देखा, तो ठाकुर जी ने इशारे से उन्हें चुप रहने को कहा ताकि लीला का आनंद बना रहे।
यह कहानी हमें सिखाती है कि भगवान के लिए कोई भी रिश्ता छोटा नहीं है। वे केवल भाव के भूखे हैं। अपने सखा के मान रखने और उनके परिवार की खुशियों में शामिल होने के लिए वे द्वारका के वैभव को छोड़कर ब्रज की गलियों में एक साधारण स्त्री बनने को भी तैयार हो गए।