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MLP
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4 days ago
*🌹सन्यासी बडा या गृहस्थ🌹* 🙏🙏🙏🙏 क्रमशः पार्ट - 2 *हमारे राजा साहब और संन्यासी यह सब हाल वहाँ खड़े हुए देख रहे थे। संन्यासी ने राजा से कहा- "राजन् ! आओ, हम दोनों भी इनके पीछे चल कर देखें कि क्या परिणाम होता है।”* *राजा तैयार हो गया और वे उन दोनों के पीछे थोड़े अन्तर पर चलने लगे। चलते-चलते वह संन्यासी बहुत दूर एक घोर जंगल में पहुँचा, उसके पीछे राजकन्या भी उसी जंगल में पहुँची, आगे चलकर वह संन्यासी बिल्कुल अदृश्य हो गया। बेचारी राजकन्या बड़ी दुखी हुई और घोर अरण्य में भयभीत होकर रोने लगी।* *इतने में राजा और संन्यासी दोनों उसके पास पहुँच गये और उससे बोले- ”राजकन्ये ! डरो मत, इस जंगल में तेरी रक्षा करके हम तेरे पिता के पास तुझे कुशल पूर्वक पहुँचा देंगे। परन्तु अब अँधेरा होने लगा है, इसलिये पीछे लौटना भी ठीक नहीं, यह पास ही एक बड़ा वृक्ष है, इसके नीचे रात काट कर प्रातःकाल ही हम लोग चलेंगे।”* *राजकन्या को उनका कथन उचित जान पड़ा और तीनों वृक्ष के नीचे रात बिताने लगे। उस वृक्ष के कोटर में पक्षियों का एक छोटा सा घोंसला था, उसमें वह पक्षी, उसकी मादी और तीन बच्चे थे, एक छोटा सा कुटुम्ब था। नर ने स्वाभाविक ही घोंसले से जरा बाहर सिर निकाल कर देखा तो उसे यह तीन अतिथि दिखाई दिये।* *इसलिये वह गृहस्थाश्रमी पक्षी अपनी पत्नी से बोला- “प्रिये ! देखो हमारे यहाँ तीन अतिथि आये हुए हैं, जाड़ा बहुत है और घर में आग भी नहीं है।” इतना कह कर वह पक्षी उड़ गया और एक जलती हुई लकड़ी का टुकड़ा कहीं से अपनी चोंच में उठा लाया और उन तीनों के आगे डाल दिया। उसे लेकर उन तीनों ने आग जलाई।* *परन्तु उस पक्षी को इतने से ही सन्तोष न हुआ, वह फिर बोला-"ये तो बेचारे दिनभर के भूखे जान पड़ते हैं, इनको खाने के लिये देने को हमारे घर में कुछ भी नहीं है। प्रिय, हम गृहस्थाश्रमी हैं और भूखे अतिथि को विमुख करना हमारा धर्म नहीं है, हमारे पास जो कुछ भी हो इन्हें देना चाहिये, मेरे पास तो सिर्फ मेरा देह है, यही मैं इन्हें अर्पण करता हूँ।”* *इतना कह कर वह पक्षी जलती हुई आग में कूद पड़ा। यह देखकर उसकी स्त्री विचार करने लगी कि ‘इस छोटे से पक्षी को खाकर इन तीनों की तृप्ति कैसे होगी ? अपने पति का अनुकरण करके इनकी तृप्ति करना मेरा कर्तव्य है।’ यह सोच कर वह भी आग में कूद पड़ी।* *प्रेरणास्पद कथाएं हेतु जुड़े रहे* *यह सब कार्य उस पक्षी के तीनों बच्चे देख रहे थे, वे भी अपने मन में विचार करने लगे कि- "कदाचित अब भी हमारे इन अतिथियों की तृप्ति न हुई होगी, इसलिये अपने माँ बाप के पीछे इनका सत्कार हमको ही करना चाहिये।” यह कह कर वे तीनों भी आग में कूद पड़े।* *यह सब हाल देख कर वे तीनों बड़े चकित हुए। सुबह होने पर वे सब जंगल से चल दिये। राजा और संन्यासी ने राजकन्या को उसके पिता के पास पहुँचाया।* *इसके बाद संन्यासी राजा से बोला- "राजन् !! अपने कर्तव्य का पालन करने वाला चाहे जिस परिस्थिति में हो श्रेष्ठ ही समझना चाहिये। यदि गृहस्थाश्रम स्वीकार करने की तेरी इच्छा हो, तो उस पक्षी की तरह परोपकार के लिये तुझे तैयार रहना चाहिये और यदि संन्यासी होना चाहता हो, तो उस यति की तरह राज लक्ष्मी और रति को भी लज्जित करने वाली सुन्दरी तक की उपेक्षा करने के लिये तुझे तैयार होना चाहिये। कठोर कर्तव्य धर्म को पालन करते हुए दोनों ही बड़े हैं..!!"* *मंगलमय प्रभात* *प्रणाम* #👌 आत्मविश्वास #❤️जीवन की सीख #🏠घर-परिवार #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
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10 days ago
🌹"सच की जीत"🌹 🙏🙏🙏 "समधी जी, क्या बताऊँ… आजकल की बहुएँ काम करने से ज़्यादा आराम करना जानती हैं। सब कुछ तो हमें ही संभालना पड़ता है।" कमला देवी ने बनावटी मुस्कान के साथ यह बात कही और सामने खड़े अपनी समधि की ओर ऐसे देखा, मानो उनकी बहू रीमा पूरे दिन हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती हो। रीमा के चेहरे का रंग एक पल में उड़ गया। उसे समझ नहीं आया कि वह सफाई दे या चुप रहे। शादी को अभी मुश्किल से पंद्रह दिन ही हुए थे। हाथों की मेहंदी भी पूरी तरह फीकी नहीं पड़ी थी कि कमला देवी ने घर की सारी जिम्मेदारियाँ रीमा के कंधों पर डाल दी थीं। सुबह चार बजे उठना, चाय बनाना, नाश्ता तैयार करना, पूरे घर की सफाई, कपड़े धोना, प्रेस करना, दोपहर और रात का खाना बनाना… दिन कब शुरू होता और कब खत्म हो जाता, रीमा को खुद भी पता नहीं चलता। अगर कभी वह पाँच मिनट के लिए अपने कमरे में बैठ जाती तो कमला देवी की आवाज़ आ जाती— "बहू, ज़रा मेरे पैर दबा दो।" कुछ देर बाद… "बहू, अलमारी से पुराने कपड़े निकालकर प्रेस कर दो।" फिर… "बहू, मंदिर की सफाई भी कर देना।" ऐसा लगता था जैसे उन्होंने कामों की एक लंबी सूची पहले से ही तैयार कर रखी हो, ताकि रीमा को आराम का एक पल भी न मिले। रीमा का पति आदित्य दूसरे शहर में नौकरी करता था। शादी के बाद उसे सिर्फ कुछ दिनों की छुट्टी मिली थी, इसलिए वह जल्दी ही वापस चला गया। अब रीमा अकेली थी। ससुराल में हर दिन उसके लिए एक नई परीक्षा लेकर आता। एक सुबह देर रात तक काम करते-करते उसकी आँख थोड़ी देर के लिए लग गई। कमला देवी गुस्से से कमरे में आईं। "अभी तक सो रही हो? तुम्हारे ससुर बिना चाय पिए ऑफिस चले गए। बहू होकर इतनी लापरवाही अच्छी नहीं लगती। कल से चार बजे उठ जाना।" रीमा ने सिर झुका लिया। "माफ़ कर दीजिए माँजी… आगे से ऐसा नहीं होगा।" उसने अपनी गलती मान ली, जबकि गलती उसकी नहीं, उसकी थकान की थी। कुछ दिनों बाद रक्षाबंधन का त्योहार आया। रीमा का बड़ा भाई अपनी बहन से मिलने ससुराल पहुँचा। रीमा ने पूरे मन से उसका स्वागत किया। उसे उम्मीद थी कि आज माँजी उसके भाई के सामने उसकी मेहनत की तारीफ करेंगी। लेकिन जैसे ही भाई बैठक में बैठा, कमला देवी तुरंत रसोई में चली गईं और सिंक में रखे दो-चार कप और प्लेटें धोने लगीं। रीमा हैरान रह गई। "माँजी, रहने दीजिए… मैं कर देती हूँ।" "अरे नहीं बहू, बस दो मिनट का काम है।" रीमा समझ गई कि यह सब दिखावे के लिए हो रहा है। उसने कुछ नहीं कहा। भाई भी बिना कुछ समझे वापस चला गया। उस शाम रीमा ने फोन पर आदित्य को सारी बात बताई। आदित्य ने हल्के अंदाज़ में कहा— "तुम शायद ज़्यादा सोच रही हो। माँ ऐसा क्यों करेंगी?" रीमा चुप हो गई। उसे समझ आ गया कि बिना देखे कोई उसकी बात पर विश्वास नहीं करेगा। समय बीतता गया। कमला देवी का व्यवहार वैसा ही रहा। आख़िरकार एक महीने बाद आदित्य छुट्टी लेकर घर आया। उसने देखा कि रीमा सुबह से रात तक लगातार काम कर रही है। जब भी वह पत्नी को अपने पास बैठाने की कोशिश करता, कमला देवी कोई नया काम बता देतीं। "पहले घर का काम खत्म कर लो, बातें तो सारी उम्र होती रहेंगी।" आदित्य यह सब चुपचाप देखता रहा। कुछ दिनों बाद रीमा के पिता अपनी बेटी और दामाद से मिलने आए। रीमा उन्हें देखकर भावुक हो गई। वह उनके लिए चाय और नाश्ता बनाने चली गई। उधर कमला देवी फिर वही पुराना खेल खेलने लगीं। उन्होंने जान-बूझकर चाय के कप धोने शुरू कर दिए और सब्ज़ी काटने लगीं। रीमा के पिता ने यह देखा तो उन्हें लगा कि शायद उनकी बेटी काम नहीं करती। उन्होंने धीरे से कहा— "बेटा, समधन जी खुद काम कर रही हैं। तुम्हें उनका हाथ बँटाना चाहिए।" कमला देवी ने तुरंत बात लपक ली। "क्या करें समधी जी… आजकल की लड़कियाँ काम से ज़्यादा आराम पसंद करती हैं।" बस, इतना सुनना था कि आदित्य से रहा नहीं गया। वह सबके सामने खड़ा हो गया। "बस माँ… अब बहुत हो गया।" घर में एकदम सन्नाटा छा गया। आदित्य ने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा— "जब रीमा ने पहली बार यही बात मुझे बताई थी, तब मैंने उस पर विश्वास नहीं किया। मुझे लगा था कि वह गलत समझ रही है। लेकिन पिछले एक हफ्ते से मैं अपनी आँखों से सब देख रहा हूँ। सुबह सबसे पहले यही उठती है। सबके लिए खाना बनाती है। पूरा घर संभालती है। आपकी दवाइयों से लेकर पिताजी की हर ज़रूरत का ध्यान रखती है। फिर भी आप उसके मायके वालों के सामने ऐसा दिखाती हैं जैसे वह कुछ करती ही नहीं। माँ, किसी की मेहनत छिपाकर अपनी महानता साबित नहीं की जाती। अगर बहू आपकी बेटी जैसी है, तो उसके सम्मान की रक्षा करना भी आपकी जिम्मेदारी है।" कमला देवी का चेहरा झुक गया। उनके पास कोई जवाब नहीं था। रीमा के पिता की आँखें भी भर आईं। उन्हें समझ आ चुका था कि उनकी बेटी सच कह रही थी। उन्होंने रीमा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा— "मुझे तुम पर गर्व है बेटा।" रीमा की आँखों से आँसू बह निकले। लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं, सम्मान मिलने की खुशी के थे। उस दिन के बाद कमला देवी ने पहली बार अपनी गलती स्वीकार की। धीरे-धीरे उन्होंने रीमा को बेटी की तरह अपनाना शुरू किया। अब जब भी कोई रिश्तेदार घर आता, वह मुस्कुराकर कहतीं— "हमारी बहू पूरे घर की जान है। इसके बिना तो एक दिन भी घर नहीं चल सकता।" रीमा मुस्कुरा देती। क्योंकि अब उसे खुद को साबित करने की ज़रूरत नहीं थी। जिस रिश्ते में सच, सम्मान और विश्वास साथ खड़े हो जाएँ, वहाँ किसी सफाई की आवश्यकता नहीं रहती मंगलमय प्रभात प्रणाम #👍 डर के आगे जीत👌 #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #👌 आत्मविश्वास #🏠घर-परिवार #👍 सफलता के मंत्र ✔️