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11 days ago
🌊📿 नर्मदे हर जीवन भर 🙏🌺 ✨ ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग — नर्मदा की गोद में शिव का ‘ॐ’ स्वरूप ✨ भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि शिव और नर्मदा के दिव्य मिलन का जीवंत केंद्र है। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित यह पवित्र तीर्थ मंधाता द्वीप पर बना है — और इसकी सबसे अद्भुत विशेषता है कि यह द्वीप स्वयं ‘ॐ’ (ॐकार) के आकार जैसा दिखाई देता है। 🌊 नर्मदा के मध्य — जहाँ शिव स्वयं विराजमान हैं माँ नर्मदा की अविरल धारा इस द्वीप को चारों ओर से घेरे हुए है, मानो माँ स्वयं अपने आंचल में शिव को धारण किए हुए हों। यहाँ खड़े होकर साधक को केवल मंदिर नहीं दिखता — उसे प्रवाह, मौन और दिव्यता का संगम अनुभव होता है। एक ओर शांत बहती नर्मदा, दूसरी ओर प्राचीन घाट और मंदिरों की श्रृंखला, बीच में शिवलिंग — जो साक्षात् “ॐ” का प्रतीक है। 🔱 पौराणिक महत्व कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने यहाँ ॐकार रूप में प्रकट होकर देवताओं को दर्शन दिए। यह भी कहा जाता है कि — यहाँ की साधना से मन की अशांति शांत होती है, और शिव कृपा से साधक को ज्ञान और मोक्ष का मार्ग मिलता है। ओंकारेश्वर में दो मुख्य रूपों की पूजा होती है: 1. ओंकारेश्वर (ॐकार स्वरूप) 2. ममलेश्वर (अमलेश्वर) — जो तट पर स्थित है इन दोनों का दर्शन पूर्ण करने से ही तीर्थ की यात्रा पूर्ण मानी जाती है। 🌸 आध्यात्मिक अनुभव — केवल दर्शन नहीं, साधना है ओंकारेश्वर का वातावरण साधक को भीतर तक बदल देता है। यहाँ — नर्मदा की लहरें मंत्र की तरह गूँजती हैं, घाटों पर बैठा हर साधक ध्यान में खो जाता है, और मंदिर की घंटियों में अदृश्य ऊर्जा का स्पंदन महसूस होता है। यहाँ आकर समझ आता है — > “शिव केवल मूर्ति में नहीं, प्रवाह में भी हैं, मौन में भी हैं, और हर श्वास में हैं।” 🌿 नर्मदा परिक्रमा और ओंकारेश्वर नर्मदा परिक्रमा करने वाले साधकों के लिए यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहीं से अनेक परिक्रमा यात्राएँ प्रारंभ होती हैं। परिक्रमावासी मानते हैं — > “ओंकारेश्वर केवल एक पड़ाव नहीं, यह वह स्थान है जहाँ साधना दिशा पाती है।” 🌺 प्रकृति और दिव्यता का अद्भुत संगम झूलता पुल (सस्पेंशन ब्रिज) से दिखता नर्मदा का दृश्य सुबह-शाम की आरती में दीपों की श्रृंखला पहाड़ियों से घिरा शांत वातावरण यह सब मिलकर ओंकारेश्वर को केवल तीर्थ नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण का स्थल बना देता है। 🕉️ संदेश — ‘ॐ’ का अर्थ समझो ओंकारेश्वर हमें सिखाता है — “ॐ” केवल ध्वनि नहीं, अस्तित्व का आधार है। शिव केवल देव नहीं, चेतना हैं। और नर्मदा केवल नदी नहीं, जीवन का प्रवाह हैं। 🙏 प्रार्थना हे माँ नर्मदा, हे ओंकारेश्वर महादेव, हमारे जीवन में भी ऐसा संतुलन दें — जहाँ मौन हो, शांति हो, और सत्य का प्रकाश हो। 📿 हर हर महादेव 📿 जय माँ नर्मदा 🌊📿 नर्मदे हर जीवन भर ✍️ रेवा मां को प्रणाम #🌅 सूर्योदय शुभकामनाएं #🌞 Good Morning🌞 #💥🔥आज के चर्चित मुद्दे🔥💥 #लोकप्रिय ।
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16 days ago
जिस केदारनाथ में शंख नहीं बजता वहाँ आतिशबाजी हो रही है और इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला जा रहा है। हमारे पूर्वज कहा करते थे कि कविलासों(हिमालय) में चीखना चिल्लाना या ज़ोर से आवाज़ नहीं करनी चाहिए दोष लगता है। शंख बजाना ही नहीं हिमालय के कुछ स्थानों पर ढोल दमाऊं लेकर जाना भी वर्जित था। हिमालय बहुत संवेदनशील पर्वत हैं वहाँ के दुर्लभ जीव-जंतु वहाँ की परिस्थितिकी बेहद संवेदनशील है। वहाँ रहने वाले मनुष्य–ऋषि, महर्षि भी तपस्या में लीन हो सकते हैं। अतः किसी के जीवन में ख़लल उत्पन्न किए बिना, शांति भंग किए बिना कविलासों की यात्रा सम्पन्न करनी चाहिए। असल में यह खुद के जिंदा लौटने और यात्रा सम्पन्न करने के लिए ज़रूरी भी था। पहले केवल शांति की कामना से ही लोग केदारनाथ(हिमालय) की यात्रा पर जाते थे मीलों पैदल चलते थे तब जाकर केदार भगवान के दर्शन होते थे उसमें कई लोग पहुंच नहीं पाते थे कई पहुंचकर लौट नहीं पाते थे। यात्रा पर जाने से पहले यात्री घरवालों से अच्छे से मिल लेते थे, खूब रो लेते थे संभवतः दुबारा मुलाकात हो न हो। जब जीवन की अनिश्चितता होती है तो आदमी खुदबखुद अच्छा हो जाता है। मौत का भय और भूख प्यास की तड़फ नीच आदमी को भी सज्जन बना देती है इसलिए पापी लोग भी जो यात्रा पूर्ण करके घर लौट आते थे लोग उनकी चरण रज माथे पर लगाते थे वह चलते फिरते धाम बन जाते थे। सम्मान पाए हुए पापी व्यक्ति के लिए पुनः बुरा कार्य करना कुएं से ऊपर आकर फिर कुएं में गिरने जैसा होता है। अतः वह पाप करना छोड़ देता था। धर्म में यात्रा का प्रावधान इसी बदलाव के लिए होता था। किंतु आज लोग यात्रा क्यों कर रहे हैं? क्या यात्रा से लौटे लोगों में आज भी ऐसा बदलाव देखने को मिलता है ? क्या आज भी ईश्वर के लिए ऐसे समर्पित यात्री देखने को मिलते हैं? समय के साथ धर्म का अनर्थ हो गया है केवल धन का ही अर्थ बचा है। खुद को सोशल मीडिया पर अलग दिखाने और लाइक कमेंट्स बटोरने की चाहत में आज का युवा बोरा गया है। पिछले एक डेढ़ दशक में सोशल मीडिया का चलन बढ़ने के साथ केदारनाथ आने वाले यात्रियों में युवाओं की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। सोशल मीडिया पर केदारनाथ यात्रा की फ़ोटो रील्स आदि पोस्ट करने के ट्रेंड ने उन्मत्त और बदमस्त युवाओं को आकर्षित किया है। इन युवाओं को केदारनाथ यात्रा भोलेनाथ से अधिक अपने सोशल मीडिया पोस्ट्स/रील्स के लिए करनी होती है। हर वर्ष हमें ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं जिसमें युवाओं द्वारा धाम की पवित्रता भंग करने के कृत्य किए जाते हैं। यह लगातार हो रहा है और यह बढ़ता ही जा रहा है। हैली सेवा, घोड़े-खच्चर आदि के माध्यम से यात्रा का सरल होना, भोग की वस्तुओं की आसान उपलब्धता और मोबाइल इन चीजों से केदारनाथ की पवित्रता संकट में है। हमारी सरकारों ने तो धामों की पवित्रता को तार-तार करने में कोई कसर छोड़ी नहीं। हैली सेवा के बाद अब सरकार केदारनाथ के लिए रोपवे भी लगवाने वाली है जिससे आने वाले समय में भोगी विलासी यात्रियों की संख्या और बढ़ेगी। समय रहते यदि इस समस्या पर गहन चिंतन न किया गया तो जनसंख्या बढ़ने के साथ नई नई समस्याएं जन्म लेंगी साथ ही धाम की पवित्रता भी जाती रहेगी। ~ नन्द किशोर भट्ट Asha pandey Cg #💥🔥आज के चर्चित मुद्दे🔥💥 #लोकप्रिय ।
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23 days ago
प्राचीन काल की बात है, जब पृथ्वी पर 'ज्वरासुर' नामक एक भयंकर असुर का आतंक फैल गया था। वह असुर रोगों का साक्षात स्वरूप था। उसके स्पर्श मात्र से लोगों के शरीर तपने लगते, अंगों पर दाने निकल आते और पूरी मानवता महामारी की चपेट में आ गई थी। शक्ति का प्राकट्य🔱 जब हाहाकार मच गया, तब समस्त देवगण भगवान शिव की शरण में गए। महादेव के अंश से और आदिशक्ति की कृपा से एक देवी का प्राकट्य हुआ, जिनका स्वरूप अत्यंत शीतल और ममतामयी था। उन्हें 'शीतला' कहा गया। वे नीम की पत्तियों के गहने पहने, हाथ में कलश और झाड़ू लिए गधे पर सवार होकर पृथ्वी पर उतरीं। माँ शीतला ने जैसे ही अपनी झाड़ू से रोगों को बुहारना और कलश के जल से शांति फैलाना शुरू किया, ज्वरासुर और उसके सहायक प्रेत-पिशाच क्रोधित हो उठे। उन्होंने माता के कार्य में विघ्न डालना शुरू कर दिया ताकि महामारी बनी रहे। तब देवी की सहायता के लिए महादेव ने अपने रौद्र रूप 'भैरव' को प्रकट किया🔱 भगवान शिव ने भैरव से कहा: "हे भैरव! तुम देवी के अंगरक्षक और क्षेत्रपाल बनकर उनके साथ रहो। जो भी आसुरी शक्तियाँ या रोगरूपी दानव देवी के मार्ग में आएंगे, उनका संहार करना तुम्हारा उत्तरदायित्व है।" भैरव जी ने माता के आदेश को शिरोधार्य किया। तंत्र ग्रंथों के अनुसार, भैरव ने जहाँ एक ओर दुष्टों के लिए काल का रूप धरा, वहीं भक्तों के लिए वे 'बटुक भैरव' (बालक रूप) बनकर माता के साथ चलने लगे। उन्होंने ज्वरासुर का मान मर्दन किया और उसे माता के चरणों में झुकने पर विवश कर दिया। तब से यह परंपरा बन गई कि माँ शीतला जहाँ भी निवास करती हैं, वहाँ भैरव द्वारपाल या क्षेत्रपाल के रूप में पहरा देते हैं। बिना भैरव की अनुमति और उनके दर्शन के, शीतला माता की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। 🚩 इस कथा का आध्यात्मिक सार यह कहानी केवल दो शक्तियों के मिलन की नहीं है, बल्कि आयुर्वेद और सुरक्षा का संगम है: माँ शीतला: आरोग्य और स्वच्छता का प्रतीक हैं। भैरव: अनुशासन और सुरक्षा का प्रतीक हैं। निष्कर्ष: माँ शीतला की झाड़ू गंदगी (बीमारी की जड़) साफ करती है, कलश का जल घावों को भरता है और भैरव का दंड उन बाहरी नकारात्मक ऊर्जाओं को रोकता है जो दोबारा बीमारी ला सकती हैं। 🙏🔱🚩 #bhaktiwithashok #ViralBhakti #explorepage #jayshreeram #fblifestyle #💥🔥आज के चर्चित मुद्दे🔥💥 #लोकप्रिय । #🌅 सूर्योदय शुभकामनाएं #🌞 Good Morning🌞
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28 days ago
रिश्तों में राजनीति करना हम पसन्द नहीं करते,, हम जहां दिल लगाया करते है वहां कभी दिमाक का इस्तेमाल नहीं करते..!! वफ़ादारी एक "#ब्रांड " है... जो हर कोई "#ऑफॉर्ड "नहीं कर सकता..!! 💖🙂 हर हर महादेव नर्मदे हर जीवन भर 🔱 🙏 🚩 हरे कृष्णा जी राधे राधे जी।। #सनातनहमारीपहचान #highlightseveryone #💥🔥आज के चर्चित मुद्दे🔥💥 #लोकप्रिय । #🌅 सूर्योदय शुभकामनाएं #🌞 Good Morning🌞 #💝 शायराना इश्क़
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29 days ago
तंत्र और योग के गहन विज्ञान में , और जैसे ग्रंथों में आज्ञा चक्र की अधिष्ठात्री देवी — माँ हाकिनी — का अत्यंत रहस्यमय वर्णन मिलता है। माँ हाकिनी ज्ञान, ध्यान, अंतर्दृष्टि और आत्म-शक्ति की देवी हैं। उनका स्थान है — आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य), जहाँ से साधक की चेतना दिव्य स्तर पर प्रवेश करती है। हाकिनी साधना का प्रथम नियम: जो साधक माँ हाकिनी को सिद्ध करना चाहता है, उसे इंद्रिय संयम का पालन करना अनिवार्य है। वह साधक किसी भी प्रकार के काम-भोग, आकर्षण या स्त्री-संग से दूर रहेगा, तभी उसकी ऊर्जा (ओजस) ऊपर उठकर आज्ञा चक्र में स्थिर होगी। बिना ब्रह्मचर्य और मानसिक शुद्धता के हाकिनी साधना केवल कल्पना बनकर रह जाती है। सच्चा साधक वही है — जो अपने मन, इंद्रियों और इच्छाओं पर विजय पा ले। तभी माँ हाकिनी की कृपा से उसे दिव्य दृष्टि, गहन ज्ञान और अंतर-जागृति प्राप्त होती है। यह साधना अत्यंत गूढ़ और शक्तिशाली है, इसे केवल योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। #लोकप्रिय । #💥🔥आज के चर्चित मुद्दे🔥💥 #🌞 Good Morning🌞 #🌅 सूर्योदय शुभकामनाएं
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1 months ago
❝❤ कुछ तो नशा होगा , तेरे इश्क में ऐ दिलबर.. 💚 💜 सारी आदतें अपनी छोड़ के , तलब तेरी जो लगा बैठे हैं हम ...🖤❜❜ *━─── ⊹⊱❤️🌸⊰⊹ ───━* #लोकप्रिय । #💥🔥आज के चर्चित मुद्दे🔥💥 #💝 शायराना इश्क़ #🎶हैप्पी रोमांटिक स्टेटस #❤️प्यार वाले स्टेटस ❤️
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1 months ago
❝❤ कुछ तो नशा होगा , तेरे इश्क में ऐ दिलबर.. 💚 💜 सारी आदतें अपनी छोड़ के , तलब तेरी जो लगा बैठे हैं हम ...🖤❜❜ *━─── ⊹⊱❤️🌸⊰⊹ ───━* #लोकप्रिय । #💥🔥आज के चर्चित मुद्दे🔥💥 #💝 शायराना इश्क़ #🎶हैप्पी रोमांटिक स्टेटस #❤️प्यार वाले स्टेटस ❤️