🇮🇳🤞साल था 1955, हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे शम्मी कपूर की मुलाकात अभिनेत्री गीता बाली से फिल्म रंगीन रातें के दौरान हुई। पहली मुलाकात भले ही सामान्य थी, लेकिन धीरे-धीरे दोनों के बीच मुलाकातें बढ़ीं, बातें बढ़ीं और यह रिश्ता प्यार में बदल गया। फिर दोनों ने शादी करने का फैसला किया, लेकिन उनकी शादी किसी भव्य समारोह की तरह नहीं, बल्कि बिल्कुल फिल्मी अंदाज में हुई। 24 अगस्त 1955 को शम्मी कपूर और गीता बाली अचानक मुंबई के बाणगंगा मंदिर पहुंचे। उनके साथ शम्मी कपूर के दोस्त हरी वालिया भी थे, जबकि परिवार का कोई सदस्य वहां मौजूद नहीं था। शादी की रस्में शुरू हुईं, लेकिन तभी पता चला कि वहां सिंदूर नहीं था। माहौल में एक पल के लिए असमंजस पैदा हुआ, लेकिन गीता बाली ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने पर्स से लिपस्टिक निकाली और शम्मी कपूर से कहा कि इसी से उनकी मांग भर दें। शम्मी कपूर ने लिपस्टिक से उनकी मांग भर दी और इस तरह दोनों ने एक-दूसरे को जीवनसाथी स्वीकार कर लिया। न कोई बड़ी बारात, न कोई भव्य समारोह और न ही रिश्तेदारों की भीड़—सिर्फ प्यार और एक-दूसरे पर भरोसा। लेकिन उस समय शायद दोनों को यह अंदाजा नहीं था कि उनकी यह खूबसूरत प्रेम कहानी आगे चलकर एक बेहद भावुक और दर्दनाक अध्याय में बदलने वाली है।
आज शम्मी कपूर की 15वीं पुण्यतिथि है।
शम्शेर राज कपूर का जन्म 21 अक्तूबर 1931 को बॉम्बे में हुआ, मशहूर थिएटर और फ़िल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और उनकी पत्नी रामसरनी मेहरा कपूर के घर। उनके दो भाई-बहनों का निधन उनके जन्म से पहले हो चुका था, और उनके जन्म के साल ही दो और भाई-बहन, देवी और नंदी, निमोनिया से चल बसे — यानी परिवार पहले ही गहरे दुख से गुज़र चुका था, जब शम्मी का जन्म हुआ।
1948 में उन्होंने पिता की थिएटर कंपनी, पृथ्वी थिएटर्स, से जुड़कर अपने करियर की शुरुआत की। 1953 में उन्होंने बड़े पर्दे पर क़दम रखा, मगर शुरुआती फ़िल्में ज़्यादातर कम बजट की तलवारबाज़ी वाली फ़िल्में और रोमांटिक ड्रामा थीं, जो बॉक्स-ऑफ़िस पर कामयाब नहीं हो पाईं।
1961 की "जंगली" ने उनकी क़िस्मत हमेशा के लिए बदल दी। इसके बाद "प्रोफ़ेसर" (1962), "चाइना टाउन" (1962), "दिल तेरा दीवाना" (1962), "कश्मीर की कली" (1964), "जानवर" (1965), "तीसरी मंज़िल" (1966), "ब्रह्मचारी" (1968), "अंदाज़" (1971) जैसी फ़िल्मों की एक लंबी क़तार आई, जिसने उन्हें 1960 के दशक का सबसे बड़ा रोमांटिक और डांसिंग सुपरस्टार बना दिया। उनका बेतरतीब, ऊर्जावान डांस स्टाइल — कभी उछलना, कभी झूमना, कभी बेतकल्लुफ़ अंदाज़ में मटकना — उस दौर के हिंदी सिनेमा के लिए बिल्कुल नया था, और उन्हें "भारत का एल्विस प्रेस्ली" या "हिंदी सिनेमा का पहला रॉकस्टार" जैसे ख़िताब दिलाए।
मगर 1965 में एक गहरा सदमा लगा — गीता बाली का चेचक की वजह से अचानक निधन हो गया, स्मॉलपॉक्स की आख़िरी शिकार बनने वालों में से एक। यह शम्मी कपूर के लिए बेहद मुश्किल दौर था। 1969 में उन्होंने नीला देवी गोहिल से दूसरी शादी की।
1970 के दशक तक आते-आते, बढ़ते वज़न और बदलती शारीरिक बनावट की वजह से शम्मी कपूर ने लीड रोल छोड़कर सहायक भूमिकाओं की तरफ़ रुख़ किया — "ज़मीर" (1974) में सायरा बानो के पिता, "परवरिश" में अमिताभ बच्चन के पालक पिता जैसे किरदार निभाए। 1982 की "विधाता" के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर अवॉर्ड मिला — यानी बतौर लीड और सपोर्टिंग एक्टर, दोनों हैसियत से उन्होंने फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड जीते। उन्होंने ख़ुद दो फ़िल्मों का निर्देशन भी किया — "मनोरंजन" (1974) और "बंडल बाज़" (1976), हालांकि दोनों बॉक्स-ऑफ़िस पर ज़्यादा कामयाब नहीं रहीं।
शम्मी कपूर की एक कम-चर्चित मगर दिलचस्प पहचान यह भी थी कि वे टेक्नोलॉजी के मामले में अपने दौर से बहुत आगे थे। 1995 में भारत में औपचारिक तौर पर इंटरनेट लॉन्च होने से पहले ही उनके पास इंटरनेट एक्सेस था, और वे "इंटरनेट यूज़र्स कम्युनिटी ऑफ़ इंडिया" के संस्थापक और चेयरमैन भी बने। उन्होंने कपूर ख़ानदान के लिए ख़ुद अपनी वेबसाइट बनाई, जहां वे परिवार की जानकारी अपडेट करते और फ़ैंस से सीधे बातचीत करते।
अपने आख़िरी सात साल उन्होंने क्रॉनिक किडनी फ़ेल्योर से जूझते हुए गुज़ारे, हफ़्ते में तीन बार डायलिसिस करवाते हुए — मगर इस बीमारी ने भी उनके जोशीले, ज़िंदादिल स्वभाव को कभी कम नहीं होने दिया। 1995 में उन्हें फ़िल्मफ़ेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला। उनकी आख़िरी फ़िल्म "रॉकस्टार" (2011) उनके निधन के बाद रिलीज़ हुई, जिसमें उन्होंने अपने पड़पोते रणबीर कपूर के साथ स्क्रीन शेयर की।
14 अगस्त 2011 की सुबह क़रीब सवा पांच बजे, मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में किडनी फ़ेल्योर से उनका निधन हो गया, उन्यासी साल की उम्र में।
आज, उनकी पुण्यतिथि पर, शम्मी कपूर को श्रद्धांजलि — उस अभिनेता को, जिसने बार-बार की नाकामियों के बाद भी हार नहीं मानी, और आख़िरकार अपने बेतरतीब, बेख़ौफ़ अंदाज़ से हिंदी सिनेमा को उसका पहला असली "रॉकस्टार" दिया।😎🌷🇮🇳🤞
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