पच्चीस तबादले, करीब दो दशक की सेवा—और फिर भी ड्यूटी से पीछे नहीं हटे तुकाराम मुंडे।
यह गीत सिर्फ एक अफ़सर की तारीफ़ नहीं है। यह एक सवाल है—अगर कोई अधिकारी कानून के मुताबिक अपना काम करता है, तो बार-बार तबादले आखिर क्यों?
क्या ईमानदारी से काम करना किसी अधिकारी के लिए सज़ा बन जाना चाहिए?
और अगर किसी ईमानदार अधिकारी का जल्दी तबादला होता है, तो क्या जनता को चुप रहना चाहिए?
हम संजीव भट्ट और अशोक खेमका का साथ उस समय नहीं दे सके। कम-से-कम आज तुकाराम मुंडे जैसे अधिकारियों का हौसला तो बढ़ा सकते हैं।
कुछ नहीं कर सकते तो एक Reel बनाइए।
एक पोस्ट कीजिए।
एक आवाज़ उठाइए।
यह गीत किसी व्यक्ति के खिलाफ व्यक्तिगत अभियान नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही पर सवाल उठाने वाली एक रचनात्मक अभिव्यक्ति है।
🇮🇳 जय हिन्द।
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