जय श्रीकृष्ण जय श्रीकृष्ण

Maa Ki Diwani Muskan
370 views
3 hours ago
क्या आप जानते हैं श्री कृष्ण की बांसुरी का नाम क्या था? 😱🦚 | 99% लोग नहीं जानते | राधे राधे 🙏 "#श्रीकृष्ण #कृष्ण #कृष्णकीबांसुरी #बांसुरी #कृष्णभक्ति #राधाकृष्ण #राधेराधे #कृष्णज्ञान #कृष्णकथा #हिंदूधर्म #सनातनधर्म #भक्तिवीडियो #धार्मिकज्ञान #रोचकतथ्य #क्याआपजानतेहैं #रोचकजानकारी #भगवानश्रीकृष्ण #वायरल #ट्रेंडिंग #ShareChat #भक्ति #जय श्री कृष्ण #कान्हा #janm astami #भक्ति # 🙏मेरे भगवान 🙏#🏵️ कृष्णा कथाएं #🙏 श्री कृष्णा 🌺# खाटू श्या उपम जी 🌼🙏🙏 #MaaKiDeewaniMuskan"
K S Supyal
604 views
2 days ago
AI indicator
Sri Krishna Janmashtami is a Hindu festival celebrating the birth of Lord Krishna, traditionally regarded as the eighth avatar of Lord Vishnu. It is commonly observed with fasting, prayers, bhajans, reading or reciting Krishna’s stories, decorating temples and homes, and midnight worship, since Krishna’s birth is traditionally celebrated at midnight. In many places, festivities also include Dahi Handi, where groups form human pyramids to break a pot suspended above the ground. श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🙏🦚 May Lord Krishna bless you and your family with happiness, peace, love, and prosperity. Hare Krishna! 🌸शुभ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी!🚩 #🌞 Good Morn!ng #शुभ जन्माष्टमी #जय श्रीकृष्ण #happy janmashtami #राधे राधे
NARENDRA ZINZUVADIYA -
1K views
8 days ago
#जय श्री कृष्ण
sn vyas
726 views
10 days ago
#जय श्री कृष्ण #महाभारत की कथा #महाभारत युद्ध #महाभारत भगवान श्रीकृष्ण ने ली कर्ण की दानशीलता की परीक्षा:: कहा जाता है कि कर्ण के द्वार से कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था। उनके लिए दान केवल धन-संपत्ति देने का नाम नहीं था। दान उनके लिए जीवन का व्रत था। उनका विश्वास था— दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य। यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥ भावार्थ: धन की तीन ही गतियाँ होती हैं—दान, भोग और नाश। जो न स्वयं उसका सदुपयोग करता है और न दूसरों को देता है, उसके धन की अंततः नाश की ओर गति होती है। कर्ण के जीवन में दान इतना महत्वपूर्ण था कि वे अपने प्राणों से भी अधिक अपने वचन को महत्व देते थे। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ बैठे थे। अर्जुन को अपने धनुष, पराक्रम और युद्ध-कौशल पर गर्व था। किंतु श्रीकृष्ण जानते थे कि कर्ण के व्यक्तित्व में एक ऐसी शक्ति है जो उसे संसार के महानतम दानवीरों में स्थान देती है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा— “पार्थ! संसार में अनेक वीर हैं, अनेक धनवान हैं और अनेक यशस्वी हैं। लेकिन कर्ण जैसा दानी मिलना अत्यंत दुर्लभ है।” अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा— “माधव! क्या कोई व्यक्ति दान में इतना महान हो सकता है कि उसके सामने संसार का कोई दूसरा व्यक्ति टिक ही न सके?” श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने कहा— “किसी मनुष्य की वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब उससे वही वस्तु माँगी जाए जिसे देना उसके लिए अत्यंत कठिन हो।” अर्जुन शांत हो गए। तब श्रीकृष्ण ने कर्ण की दानशीलता की परीक्षा लेने का निश्चय किया। कहा जाता है कि एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और कर्ण के महल की ओर चल पड़े। उस समय आकाश में घने बादल छाए हुए थे। वर्षा हो रही थी। चारों ओर जल ही जल था। कर्ण अपने महल में बैठे हुए थे। उन्होंने जैसे ही उस वृद्ध ब्राह्मण को अपने द्वार पर देखा, तुरंत उठ खड़े हुए। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर कहा— “आइए विप्रवर! आपका मेरे द्वार पर आना ही मेरे लिए सौभाग्य है। कृपया बताइए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?” वृद्ध ब्राह्मण ने कहा— “राजन! मैं अत्यंत आवश्यक कार्य से आया हूँ। मुझे यज्ञ के लिए कुछ विशेष सूखी चंदन की लकड़ियाँ चाहिए।” कर्ण ने तुरंत अपने सेवकों को आदेश दिया— “राजभंडार से उत्तम चंदन की लकड़ियाँ लाओ।” सेवक गए और थोड़ी देर बाद लौटकर बोले— “महाराज! बाहर बहुत वर्षा हो रही है। महल के भंडार में रखी सारी लकड़ियाँ गीली हो चुकी हैं। एक भी लकड़ी ऐसी नहीं है जिसे अभी यज्ञ में जलाया जा सके।” कर्ण ने ब्राह्मण की ओर देखा। ब्राह्मण शांत खड़े थे। उन्होंने कहा— “राजन, यदि सूखी लकड़ी नहीं है तो मैं लौट जाता हूँ।” कर्ण ने कहा— “नहीं विप्रवर! मेरे द्वार से कोई याचक निराश होकर नहीं लौट सकता।” उन्होंने चारों ओर देखा। बारिश लगातार हो रही थी। महल की खिड़कियों और दरवाजों पर सुंदर, सुगंधित चंदन की लकड़ी लगी हुई थी। कर्ण कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने अपनी तलवार उठाई। अर्जुन की आँखों के सामने जैसे कर्ण का पूरा व्यक्तित्व जीवित हो उठा— वह योद्धा जिसने अपना जन्मजात कवच दान कर दिया था… वह पुरुष जिसने अपने जीवन की सबसे प्रिय वस्तुएँ भी याचक को दे दी थीं… और अब वह अपने महल को भी दान करने के लिए तैयार था। कर्ण ने अपनी तलवार से महल के चंदन के दरवाजे और चौखटें काटनी शुरू कर दीं। ठक! एक लकड़ी टूटी। ठक! दूसरी चौखट टूट गई। बारिश बाहर बरस रही थी, लेकिन कर्ण के हाथों में दान का संकल्प अग्नि की तरह प्रज्वलित था। उन्होंने सारी चंदन की लकड़ियाँ एकत्र कर उस ब्राह्मण के सामने रख दीं। कर्ण ने हाथ जोड़कर कहा— “विप्रवर! मेरे पास जो कुछ था, वह मैंने आपको दे दिया। यदि आपको और कुछ चाहिए तो निःसंकोच कहिए।” तब ब्राह्मण का वास्तविक रूप प्रकट हुआ वृद्ध ब्राह्मण मुस्कुराए। अचानक उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकलने लगा। वृद्धावस्था का रूप समाप्त हो गया। सामने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण खड़े थे। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म की दिव्य आभा दिखाई देने लगी। कर्ण कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गए। उन्होंने तुरंत भूमि पर दंडवत प्रणाम किया। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। कर्ण बोले— “प्रभु! आपने मेरी परीक्षा क्यों ली?” श्रीकृष्ण ने कर्ण को उठाया और प्रेमपूर्वक कहा— “राधेय! मैं तुम्हारे दान की परीक्षा लेने नहीं आया था। मैं तो संसार को यह दिखाने आया था कि सच्चा दान क्या होता है।” कर्ण ने सिर झुका लिया। श्रीकृष्ण ने कहा— “जिसके पास बहुत धन हो और वह थोड़ा-सा दे दे, उसे दानी कहना सरल है। लेकिन जिसके पास जो कुछ है, वह उसे भी याचक के चरणों में रख दे—उसका त्याग असाधारण होता है।” दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥ जो दान केवल इसलिए दिया जाता है कि देना मेरा कर्तव्य है, जो उचित समय, उचित स्थान और योग्य पात्र को बिना किसी प्रत्युपकार की इच्छा के दिया जाए—वह सात्त्विक दान कहलाता है। श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा— “राधेय! तुम्हारे दान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि तुम दान के बदले कुछ माँगते नहीं हो।” “तुम्हारे लिए दान सौदा नहीं है।” “तुम्हारे लिए दान तुम्हारे हृदय की स्वाभाविक करुणा है।” कर्ण की आँखों में आँसू आ गए कर्ण ने धीरे से कहा— “प्रभु! मेरे पास ऐसा क्या है जो आपका नहीं है? यह शरीर, यह धन, यह राज्य, यह जीवन—सब तो समय ने मुझे दिया है। यदि मेरे द्वार पर कोई आवश्यकता लेकर आता है, तो मैं उसे कैसे लौटा दूँ?” श्रीकृष्ण कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने कर्ण के कंधे पर हाथ रखा। उन्होंने कहा— “इसीलिए तो तुम कर्ण हो।” कर्ण के दान की महानता केवल इस बात में नहीं थी कि वह बहुत कुछ देता था। उनकी महानता यह थी कि— वह प्रिय वस्तु देता था। वह कठिन समय में देता था। वह बिना बदले की अपेक्षा के देता था। और सबसे बड़ी बात— वह याचक की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता से ऊपर रख देता था। शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः। वक्ता दशसहस्रेषु दाता भवति वा न वा॥ सैकड़ों में कोई एक वीर मिलता है, हजारों में कोई विद्वान मिलता है, दस हजारों में कोई अच्छा वक्ता मिलता है; लेकिन सच्चा दानी मिले या न मिले, यह निश्चित नहीं। भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा— “दान की कीमत वस्तु से नहीं, त्याग की भावना से निर्धारित होती है।” “जिस वस्तु को देकर तुम्हें कोई पीड़ा नहीं होती, उसका दान सरल है।” “लेकिन जिसे देने में हृदय काँप उठे और फिर भी तुम उसे किसी जरूरतमंद को दे दो—वही वास्तविक त्याग है।” कर्ण ने भगवान के चरणों में अपना सिर रख दिया। श्रीकृष्ण ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा— “तुम्हारा जीवन संघर्षों से भरा रहा है, राधेय। तुम्हें संसार ने बहुत कुछ दिया भी और बहुत कुछ छीन भी लिया। लेकिन तुम्हारे भीतर जो दान का प्रकाश है, उसे कोई नहीं छीन सकता।” कर्ण की आँखों से आँसू बह रहे थे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा— “प्रभु! यदि मेरे जीवन में कोई पुण्य है, तो वह केवल इतना है कि मेरे द्वार से कोई निराश होकर न जाए।” श्रीकृष्ण मुस्कुराए। और उस क्षण मानो स्वयं धर्म ने कर्ण के सामने सिर झुका दिया। कर्ण की यह लोकप्रचलित कथा हमें यह नहीं सिखाती कि मनुष्य अपनी सारी संपत्ति बाँट दे। यह हमें इससे कहीं गहरी बात सिखाती है— दान वस्तु का नहीं, हृदय का होता है। किसी भूखे को भोजन देना दान है। किसी दुखी को सहारा देना दान है। किसी निराश व्यक्ति को आशा देना दान है। किसी अज्ञानी को ज्ञान देना दान है। और किसी जरूरतमंद के आँसू पोंछ देना भी दान है। कर्ण की कथा हमें याद दिलाती है— धन से बड़ा दान हृदय का है, वस्तु से बड़ा दान भावना का है, और जीवन का सबसे बड़ा दान है— अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी दूसरे के काम आ जाना। इसीलिए युगों बाद भी जब “दानवीर” शब्द बोला जाता है, तो कर्ण का नाम आदर से लिया जाता है। जय श्रीकृष्ण। 🙏 दानवीर कर्ण को शत-शत नमन। 🙏