श्रीराम कथा

sn vyas
609 views
15 hours ago
##रामायण #रामायण #रामायण कथा #रामायण ज्ञान #रामायण चौपाई रामायण के उस महान योद्धा की कथा बेहद अद्भुत है, जिसकी शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता है कि स्वयं लंकापति रावण भी उसके पराक्रम से परिचित था। यह योद्धा कोई और नहीं बल्कि जांबवंत जी थे, जिन्हें ऋक्षराज भी कहा जाता है। वे केवल एक शक्तिशाली योद्धा ही नहीं, बल्कि अत्यंत बुद्धिमान, अनुभवी और भगवान श्रीराम के परम भक्त थे। उनकी आयु और अनुभव इतने विशाल माने जाते हैं कि उन्होंने अनेक युगों की घटनाओं को अपनी आंखों से देखा था। उनके बारे में पुराणों और रामायण की परंपराओं में अनेक अद्भुत प्रसंग मिलते हैं। कहा जाता है कि वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र माने गए और देवताओं के महान कार्यों में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उनका शरीर विशाल, उनका पराक्रम अद्भुत और उनका आत्मविश्वास अटल था। लेकिन जांबवंत जी की इस कथा में सबसे रोचक बात उनकी शक्ति नहीं, बल्कि उनके मन में छिपी एक ऐसी इच्छा थी, जिसे पूरा होने में पूरा एक युग नहीं बल्कि युगों का समय लग गया। कथा के अनुसार जांबवंत जी ने भगवान विष्णु के वामन अवतार के समय भी उनकी दिव्य लीला को देखा था। जब भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण करके राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी और फिर विराट रूप धारण किया, तब उनका स्वरूप इतना विशाल हो गया कि संपूर्ण ब्रह्मांड उनके चरणों में समाया हुआ दिखाई देने लगा। जांबवंत जी ने उस अद्भुत स्वरूप को देखकर भगवान की महिमा का अनुभव किया और परंपरा में यह वर्णन मिलता है कि उन्होंने उस विराट स्वरूप की बार-बार परिक्रमा की। यह प्रसंग उनके असाधारण वेग और सामर्थ्य का प्रतीक माना जाता है। समय आगे बढ़ा और त्रेता युग में भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया। जब अयोध्या के राजकुमार राम वनवास गए और माता सीता का रावण द्वारा हरण हुआ, तब भगवान श्रीराम की सहायता के लिए वानर सेना का संगठन हुआ। उसी समय जांबवंत जी भी भगवान श्रीराम के साथ खड़े हुए और लंका विजय के महान अभियान में उन्होंने अपनी बुद्धि, अनुभव और शक्ति से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जांबवंत जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल बल पर भरोसा नहीं करते थे। जब पूरी वानर सेना समुद्र के किनारे खड़ी थी और किसी को समझ नहीं आ रहा था कि विशाल समुद्र को पार करके लंका तक कौन पहुंचेगा, तब जांबवंत जी ने ही हनुमान जी को उनकी भूली हुई शक्ति का स्मरण कराया था। उन्होंने हनुमान जी को बताया कि उनके भीतर अपार सामर्थ्य छिपा है और वे चाहे तो समुद्र को एक छलांग में पार कर सकते हैं। जांबवंत जी के शब्दों ने हनुमान जी के भीतर आत्मविश्वास जगाया और फिर पवनपुत्र ने समुद्र लांघकर लंका पहुंचने का असंभव कार्य संभव कर दिखाया। इससे पता चलता है कि जांबवंत जी स्वयं जितने शक्तिशाली थे, उतने ही महान मार्गदर्शक भी थे। वे जानते थे कि वास्तविक शक्ति केवल शरीर में नहीं होती, बल्कि सही समय पर सही व्यक्ति को उसकी शक्ति का बोध कराने में भी होती है। लंका विजय के बाद जब भगवान श्रीराम का अभियान सफल हुआ और रावण का अंत हो गया, तब जांबवंत जी के मन में एक अलग ही इच्छा जागी। उन्होंने भगवान श्रीराम से इच्छा व्यक्त की कि वे स्वयं प्रभु के साथ युद्ध करना चाहते हैं। यह सुनकर भगवान श्रीराम मुस्कुराए। जांबवंत जी की भावना में अहंकार नहीं था, बल्कि उनके मन में प्रभु के साथ युद्ध करके उनके विराट पराक्रम का अनुभव करने की तीव्र इच्छा थी। भगवान राम ने उनके भाव को समझा और कहा कि इस अवतार में उनकी वह इच्छा पूरी नहीं हो सकती, लेकिन जब वे द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेंगे, तब जांबवंत जी की यह इच्छा अवश्य पूरी होगी। भगवान के इस वचन को जांबवंत जी ने अपने हृदय में धारण कर लिया। अब उन्हें केवल उस समय की प्रतीक्षा करनी थी जब त्रेता समाप्त होगी, द्वापर आएगा और उनके आराध्य प्रभु एक नए रूप में उनके सामने आएंगे। समय का चक्र घूमता रहा। त्रेता युग बीत गया और द्वापर युग का आरंभ हुआ। भगवान श्रीराम अब श्रीकृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हो चुके थे। इसी दौरान स्यमंतक मणि से जुड़ी एक घटना ने भगवान श्रीकृष्ण को जांबवंत जी की गुफा तक पहुंचा दिया। स्यमंतक मणि अत्यंत मूल्यवान और दिव्य मणि मानी जाती थी। उसके गायब होने और उससे जुड़े आरोपों के कारण श्रीकृष्ण उसकी खोज में निकल पड़े। खोज करते-करते वे एक गहरी और रहस्यमयी गुफा तक पहुंचे। यही वह स्थान था जहां जांबवंत जी लंबे समय से निवास कर रहे थे। गुफा के भीतर अंधकार था और बाहर की दुनिया से वह स्थान लगभग अलग दिखाई देता था। श्रीकृष्ण जब भीतर पहुंचे तो उन्होंने स्यमंतक मणि को जांबवंत जी की पुत्री जांबवती के पास देखा। भगवान मणि को अपने साथ ले जाने के लिए आगे बढ़े, लेकिन तभी जांबवंत जी की नजर उन पर पड़ी। गुफा के अंधकार में जांबवंत जी भगवान श्रीकृष्ण को पहचान नहीं सके। उन्होंने उन्हें कोई साधारण योद्धा समझा और अपने अधिकार वाली मणि को लेने से रोकने के लिए युद्ध की चुनौती दे दी। यहीं से वह महायुद्ध शुरू हुआ जिसकी प्रतीक्षा जांबवंत जी युगों से कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण और जांबवंत जी के बीच भयंकर मल्लयुद्ध हुआ। दोनों ही असाधारण योद्धा थे। एक ओर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे और दूसरी ओर युगों के अनुभव और अपार बल से संपन्न जांबवंत जी। युद्ध इतना कठिन था कि दोनों में से कोई भी आसानी से पीछे हटने को तैयार नहीं था। दिन बीतते गए, लेकिन युद्ध समाप्त नहीं हुआ। परंपरागत कथा के अनुसार यह युद्ध लगातार अट्ठाईस दिनों तक चला। गुफा के भीतर लगातार होने वाले उस संघर्ष से धरती तक मानो कांप उठी थी। जांबवंत जी अपनी पूरी शक्ति से युद्ध कर रहे थे। उन्हें विश्वास था कि उनके सामने कोई साधारण योद्धा नहीं, बल्कि अत्यंत शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी जरूर है। लेकिन जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ता गया, उनके शरीर की शक्ति कम होने लगी। वर्षों और युगों से संचित उनका बल भी उस दिव्य योद्धा के सामने धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। अंततः जांबवंत जी के मन में एक प्रश्न उठा कि आखिर यह कौन है जिसके सामने उनकी इतनी विशाल शक्ति भी टिक नहीं पा रही। उन्होंने अपने जीवन में असंख्य योद्धाओं को देखा था, लेकिन ऐसा सामर्थ्य उन्होंने किसी में नहीं देखा था। तभी उनके भीतर एक पहचान की किरण जागी। उन्हें अनुभव होने लगा कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकता। ऐसा बल केवल उसी परम सत्ता में हो सकता है जिसे वे युगों पहले श्रीराम के रूप में देख चुके थे। भगवान श्रीकृष्ण ने जांबवंत जी की इस पहचान को पूर्ण करने के लिए उन्हें अपना श्रीराम स्वरूप दिखाया। जैसे ही जांबवंत जी ने श्रीकृष्ण में अपने आराध्य भगवान श्रीराम का दर्शन किया, उनके भीतर की सारी शंका समाप्त हो गई। उनकी आंखों में भावुकता भर आई और उन्हें समझ आ गया कि जिस युद्ध की इच्छा उन्होंने त्रेता युग में व्यक्त की थी, वह इच्छा आज पूरी हो चुकी है। सामने कोई दूसरा योद्धा नहीं बल्कि वही उनके आराध्य प्रभु थे, जिन्होंने त्रेता में उन्हें अपना वचन दिया था। जांबवंत जी तुरंत भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े। उनकी आंखों से भक्ति के आंसू बहने लगे। उन्होंने प्रभु से क्षमा मांगी और कहा कि वे उन्हें पहचान नहीं पाए। भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपने भक्त को प्रेमपूर्वक स्वीकार किया और जांबवंत जी की भक्ति से प्रसन्न हुए। इसके बाद जांबवंत जी ने स्यमंतक मणि भगवान श्रीकृष्ण को सौंप दी। लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं हुई। जांबवंत जी ने अपनी पुत्री जांबवती का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। इस प्रकार जिस युद्ध की प्रतीक्षा जांबवंत जी ने युगों तक की थी, वही युद्ध अंततः उनके लिए भगवान के दर्शन और उनके परिवार के साथ भगवान के संबंध का कारण बन गया। यह प्रसंग केवल एक महायुद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि भक्त और भगवान के बीच उस संबंध की कथा है जिसमें समय की सीमाएं भी समाप्त हो जाती हैं। त्रेता में भगवान राम ने जो वचन दिया था, द्वापर में वही वचन पूरा हुआ। जांबवंत जी ने अपने प्रभु को पहचानने में भले ही देर की, लेकिन जब पहचान हुई तो उनका हृदय पूरी तरह भक्ति से भर गया। जांबवंत जी की यह कथा हमें एक गहरा संदेश भी देती है। शक्ति कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसके सामने परम शक्ति के आगे अंततः अहंकार नहीं बल्कि समर्पण ही टिकता है। जांबवंत जी स्वयं महान योद्धा थे, लेकिन उन्होंने भगवान को पहचानते ही अपनी शक्ति का अभिमान छोड़कर उनके चरणों में सिर झुका दिया। यही उनकी सबसे बड़ी महानता थी। उन्होंने त्रेता में भगवान राम की सेवा की, हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया और द्वापर में उसी भगवान के कृष्ण रूप के साथ युद्ध करके अपना पुराना संकल्प पूरा किया। इसलिए जांबवंत जी केवल रामायण के एक योद्धा नहीं थे, बल्कि वे कई युगों को जोड़ने वाली उस दिव्य कथा के पात्र हैं जिसमें भगवान अपने भक्त को दिया हुआ वचन कभी नहीं भूलते। आज भी गुजरात के पोरबंदर क्षेत्र से जुड़ी जांबवंत गुफा को इस कथा की स्मृति से जोड़ा जाता है और श्रद्धालु इसे जांबवंत जी तथा भगवान श्रीकृष्ण के उस अद्भुत प्रसंग से जोड़कर देखते हैं। चाहे इस कथा को आस्था और पुराण परंपरा के रूप में समझें या एक आध्यात्मिक संदेश के रूप में, इसका भाव अत्यंत सुंदर है—भगवान और भक्त के बीच बना संबंध समय, युग और परिस्थितियों से परे होता है। जांबवंत जी ने त्रेता में जो इच्छा अपने प्रभु के सामने रखी थी, उसका उत्तर उन्हें द्वापर में मिला। और जब अंततः उन्होंने पहचान लिया कि उनके सामने वही परम प्रभु खड़े हैं, तो युद्ध का अंत पराजय से नहीं बल्कि भक्ति, प्रेम और समर्पण से हुआ। यही जांबवंत जी की सबसे महान विजय थी। जय श्री राम। जय श्री कृष्ण।
sn vyas
516 views
15 hours ago
#रामायण महाभारत #रामायण कथा #रामायण गीधराज जटायु और भीष्म पितामह — कर्म का अंतर रामायण में गीधराज जटायु की कथा केवल एक पक्षी के बलिदान की कथा नहीं है, बल्कि यह धर्म, साहस और नारी-सम्मान का अद्भुत संदेश देती है। जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले जा रहा था, तब वृद्ध जटायु ने उसे रोकने का साहस किया। उन्होंने रावण को समझाया कि पराई स्त्री का हरण अधर्म है। लेकिन रावण नहीं माना। तब जटायु ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना रावण से युद्ध किया। उन्होंने सीता माता की रक्षा के लिए अपना पूरा सामर्थ्य लगा दिया। अंततः रावण ने जटायु के दोनों पंख काट दिए और उन्हें घायल अवस्था में धरती पर छोड़ दिया। जटायु मृत्यु के निकट थे, लेकिन उन्होंने अपने प्राण नहीं छोड़े। उनके मन में केवल एक संकल्प था— “जब तक प्रभु श्रीराम को माता सीता के हरण का समाचार नहीं दे दूँगा, तब तक प्राण नहीं त्यागूँगा।” कुछ समय बाद श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ पहुँचे। घायल जटायु ने उन्हें पूरी घटना बताई और कहा कि रावण माता सीता को दक्षिण दिशा की ओर ले गया है। श्रीराम ने जटायु को अपनी गोद में उठा लिया। प्रभु की आँखों से आँसू बहने लगे। जिस जटायु ने सीता माता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी, उसे अंत समय में स्वयं भगवान श्रीराम की गोद प्राप्त हुई। रामचरितमानस में श्रीराम जटायु के कर्म को स्मरण करते हुए कहते हैं— “जल भरि नयन कहत रघुराई। तात करम ते निज गति पाई॥” अर्थात् श्रीराम ने आँसुओं से भरे नेत्रों से कहा कि हे तात! आपने अपने कर्मों के कारण परम गति प्राप्त की है। अब महाभारत की ओर देखिए। भीष्म पितामह महान योद्धा, तपस्वी और धर्मज्ञ थे। उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। महाभारत युद्ध के बाद वे बाणों की शय्या पर पड़े रहे और उचित समय की प्रतीक्षा करते रहे। यहाँ एक गहरी सीख दिखाई जाती है— जटायु ने एक असहाय नारी की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी, जबकि हस्तिनापुर की सभा में द्रौपदी के अपमान के समय भीष्म धर्म-संकट में मौन रहे। इसीलिए जटायु का अंतिम क्षण भगवान की गोद में दिखाई देता है, जबकि भीष्म को बाणों की शय्या पर पड़े रहना पड़ा। यह तुलना किसी महान पुरुष को छोटा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि कर्म और धर्म के महत्व को समझाने के लिए कही जाती है। जटायु हमें सिखाते हैं— धर्म की रक्षा करने के लिए सामर्थ्य छोटा-बड़ा नहीं देखा जाता। वृद्ध होने के बावजूद जटायु ने रावण जैसे शक्तिशाली राजा को चुनौती दी। उन्हें पता था कि वे शायद जीत नहीं पाएँगे, फिर भी उन्होंने अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया। क्योंकि उनके लिए अपने प्राणों से बड़ा था— माता सीता का सम्मान और धर्म की रक्षा। और यही कारण है कि श्रीराम ने जटायु को केवल एक पक्षी नहीं माना, बल्कि उन्हें अपने पिता के समान सम्मान दिया। सच्ची भक्ति केवल भगवान का नाम लेने में नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर धर्म के पक्ष में खड़े होने में भी है। जटायु ने अपने कर्मों से सिद्ध कर दिया कि— “जो धर्म के लिए अपना सब कुछ त्याग देता है, उसके अंतिम क्षणों में स्वयं भगवान उसका हाथ थाम लेते हैं।” 🙏 जय श्री राम। 🙏 जय गीधराज जटायु। 🚩 भक्त और भगवान की जय।
sn vyas
670 views
2 days ago
#रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान 🌺 जब राजा जनक के महल में नन्ही सीता जी का रोना बंद नहीं हुआ, तो उन्हें चुप कराने कौन आया? जनकनंदिनी माता सीता की अद्भुत रुदन लीला 🌺 🔸 मिथिला में छाई व्याकुलता आज मिथिला में राजा जनक के महल में बड़ी बेचैनी छाई हुई है। आज जनकलली (नन्ही सीता जी) का रोना बंद ही नहीं हो रहा है। कभी वे आंखें बंद कर लेती हैं, तो कभी आधी खोलती हैं। माता सुनयना जी बार-बार उन्हें छाती से लगाकर दूध पिलाने का प्रयास कर रही हैं, किंतु जनकलली की पीड़ा शांत होने का नाम ही नहीं ले रही। किसी ने कहा बिटिया को कोई रोग लग गया है, तो कोई इसे 'नजरदोष' या 'ग्रह-बाधा' बताने लगा। मिथिला में यह खबर आग की तरह फैल गई। जो जिस हाल में था, उसी हाल में अपनी सुध-बुध खोकर जनकमहल की ओर दौड़ पड़ा। 🔸 भगवान शंकर का तांत्रिक भेष में आगमन जब मिथिला की यह खबर भगवान शंकर के कानों में पड़ी, तो वे अपने आराध्य के दर्शन हेतु एक 'सिद्ध तांत्रिक' का वेष धारण कर मिथिला में प्रकट हो गए। गुदड़ी लपेटे, कांपता हुआ शरीर लिए यह तांत्रिक मिथिला की गलियों में आवाज लगाने लगा— "सुनो! मैं रोगों को दूर करने का व्रत लेकर तुम्हारे नगर आया हूँ। रोगी को ठीक किए बिना मैं अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करता।" 🔸 महल में प्रवेश और तांत्रिक की मूर्च्छा यह खबर जब महल पहुंची, तो दासी के माध्यम से तांत्रिक (भगवान शिव) को बुलाया गया। बीमार जनकलली को देखते ही भगवान शंकर भावावेश में आकर मूर्च्छित हो गए! यह देख माता सुनयना घबरा गईं कि यह कैसा तांत्रिक है जो स्वयं बेहोश हो गया। तभी शंकर जी ‘हरि! हरि!’ कहते हुए उठ बैठे और बोले— "मइया चिंता मत करो! मैं तो अपने गुरुदेव का ध्यान कर बच्ची की व्याधि का पता लगा रहा था।" 🔸 शिव जी की अद्भुत स्तुति और उपचार इसके बाद तांत्रिक ने नन्ही सीता जी की तीन बार परिक्रमा की और अपना सिर उनके चरणों में रख दिया। सुनयना जी ने टोका— "योगीराज! आप वृद्ध और ब्राह्मण होकर कन्या के चरणों में सिर क्यों रख रहे हैं?" शंकर जी ने बात बनाते हुए कहा— "मइया, यह तांत्रिक उपचार का तरीका है, आप बस देखती रहें।" फिर महादेव ने मन ही मन जनकलली की स्तुति की: ✨ जय जय शिशुरूपे तप्त चामी कराभे विमल कमल नेत्रे पूर्ण शीतांशु वक्त्रे। निखिल भुवन जीवानन्दनि:श्रेयसे श्रीजनकनृपति गेहे क्रीडमाने प्रसीद।। ✨ (अर्थात्: हे तपाये हुए स्वर्ण सी कांति और कमल नयनों वाली किशोरी! आप प्रसन्न हों।) 🔸 जनकलली की मुस्कान और अनोखी विदाई तांत्रिकाचार्य शंकर जी की भावपूर्ण प्रार्थना सुनकर जनकलली ने आराम से आंखें खोल दीं और प्रेमपूर्वक दुग्धपान करने लगीं। पूरे जनकमहल में खुशी की लहर दौड़ गई। महाराज जनक ने तांत्रिक को स्वर्ण, रजत और राजकोष देना चाहा, लेकिन शंकर जी ने इंकार कर दिया। उन्होंने कहा— "मुझे बस इस कन्या का पहना हुआ कोई वस्त्र दे दीजिए, वही मेरा रक्षा-कवच होगा।" माता सुनयना ने वस्त्र भेंट किया। तांत्रिक ने पुनः कन्या की परिक्रमा की, चरणों में शीश नवाया और वहां से अंतर्धान हो गए। 🙏 जनक सुता जगजननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।। ताके जुग पद कमल मनावहूँ। जासु कृपा निरमल मति पावहूँ।।
sn vyas
677 views
6 days ago
रामचरित के आधार पर भाईचार प्रसंग में 'संगति' और सिक्के का दोनों तरफ : ------------------------------------------------------------------ त्रेता और द्वापर युग में भाईचार की निदर्शन कुछ अलग होने से भी इसकी मौलिक अंतःस्वर में कुछ भी फर्क नहीं आती है। इसीलिए सार्वजनीन और सर्वकालीन मंथन योग्य होकर, आजतक भारतीय आर्यों के सामाजिक तथा सांस्कृतिक चेतना के अंदर उज्जीवित रहा है। भाई के लिए भाई कैसे आंख बन्द कर उच्छर्गीकृत होता है, रोचक शैली में इसकी अनेकानेक उदाहरण योग्य कथावस्तु को हमलोग रामायण और महाभारत से जानते है। लेकिन कुछ वस्तुवादी लोगों इन बातों को सिर्फ काव्यमयी कहानियां समझकर, असल में इनकी अंतर्निहित दिव्य सन्देश को महत्व नहीं दे पाते हैं।। इस कलियुग में श्रीक्षेत्र- पूरी में विराजित श्रीमंदिर के अंदर रत्न- सिंघासनोपरि दोनों भ्राता श्रीजगन्नाथ जी और श्रीबलभद्र जी के साथ, बहन सुभद्रा जी को कोई दर्शन करें, तो वंहा विश्व- भाईचार के अनोखा प्रतीकात्मक स्वरूप, मतलब भाई- बहनों का पवित्र- अटूट- अनमोल रिस्ते को अवश्य प्रत्यक्ष कर पाएंगे। सिर्फ इतनी सी बात नहीं, जब वंहा कोई आषाढ़ शुक्ल दशमी के अवसर पर अनुष्ठित विश्व प्रसिद्ध 'रथ- यात्रा' में तीनों भाई- बहनों की नगर परिक्रमा दृश्य देखते हैं, तब लाखों लोगों के भव्य समारोह में वंहा रगरग से अभूतपूर्व भाईचार की शिहरण फैल जाते हैं।। त्रेता युगीय रामायण में रघुकुल- नन्दन चारो भाइयों के आपस में उच्छर्गीकृत प्रेमभाव को कौन सभ्य इंसान नहीं जानता ! वंहा भी विश्रवा- कुल के सिर्फ हरिभक्त बिभीषण को छोड़कर, लंकपति असुरराज रावण समेत उनके पुत्र और भाइयों तथा कुटुंब के अन्यान्य लोगों में भी मरते दम तक कैसे एकता रूपी भाईचार सम्पर्क अटूट रहा था, ये बात को कोई नजर अंदाज नहीं कर सकते हैं।। ऐसे, कोई भी द्वापर कालीन महाभारत को मंथन करेंगे, तो वंहा पांडवों का आपस में भाईचार को देखकर अभिभूत होना कोई नयी बात नहीं है। और दूसरे तरफ पंच पांडवों से अलग धृतराष्ट्र नन्दन दुर्योधन समेत कौरवों शत भाइयों तथा कुटुंब और बन्धुओं में जीवदशा व्यापी जिस हिसाब से इच्छाकृत या अनिच्छाकृत "संगति" अटूट रहा था, ओ सब भी चिन्तन योग्य उदाहरण होकर सामने है।। 💐 गोस्वामी तुलसी दास जी श्री रामचरित मानस- अरण्य काण्ड- दोहा- 1, 2, 4, 5 में लिखे है-- "जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहिं बिलोकत पातक भारी। निज दुख गिरि सम रज करि जाना, मित्र क दुख रज मेरु समयााना। कुपथ निवारि सुपंथ चलावा, गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा। देत लेत मन संक न धरई, बल अनुमान सदा हित करई। बिपति काल कर सतगुन नेहा, श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।" उपरोक्त दोहे की भावार्थ है-- "जो लोग किसी को अपना मित्र तो मानते है, पर मित्र के दुख में न तो दुख महसूस करते है और न ही अपने मित्र का सहयोग करते है-- दुख के समय मित्र के दुख में दुखी न होने वाले ऐसे स्वार्थी मित्रो को देखने से भी पाप लगता है। जो अपने बड़े से बड़े दुख को बहुत छोटा मानकर अनदेखा कर अपने मित्र के छोटे से छोटे दुख को बड़ा मानकर प्राथमिकता दे, जो अपने मित्र को कुपथ (बुरी संगति और बुरे रास्ते) से दूर हटा कर सुपथ (सुसंगति और सही मार्ग) पर ले जाये, मित्र के अवगुणों को दूर कर मित्र के अंदर सद्गुणों को विकसित करे, मित्र से लेन- देन करते समय छल- कपट- भेदभाव- शंका- संदेह न करे तथा अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार सदैव मित्र का हित करे, सामान्य परिस्थितियो की तुलना में बिपत्ति के समय सौ गुना अधिक मित्र से प्रेम करते हुए उसकी परवाह करे, श्रुति (वेद) के अनुसार वही सज्जन (सच्चा) मित्र होता है।" इसीलिए कोई समाज में अपने लिए अच्छा, सच्चा और सज्जन मित्र चाहते है, तो स्वयं में इन गुणों का विकास कर, पहले स्वयं एक आदर्श मित्र बने और गुण- दोष का परीक्षण कर उचित व्यक्ति के साथ ही मित्रता करें।। फिर गोस्वामी जी निष्कर्ष में कहते हैं की-- हमेशा "संगति' अच्छा रखना चाहिए; यथा-- "तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ। नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ।" इस एक ही दोहा में अति सुंदर व रोचक शैली में सन्त गोस्वामी जी "संगति" से उपजे दोनों किसम के 'अछे' और 'बुरे' "भाईचार" को विश्लेषण करने की दिगदर्शन अर्पित किया है। उनके दिव्यदृष्टि से-- "अच्छे लोगों की संगति से मनुष्य अच्छा और बुरे लोगों की संगति से बुरा हो जाता है।।" सामान्यतः लोहा पानी में डूब जाता है; लेकिन लोहे को नाव का कील बना देने से वह लोगों को पार करने वाला हो जाता है। संगीत यंत्र में वह लोहा लग गया तो सुमधुर संगीत निकलता है, जिससे आनंद की अनुभूति होती है। परन्तु यदि वही लोहा कुसंगति में पड़ गया तो, घातक या नाशक बन जाता है। जैसे, कसाई के जीव हत्या वाला तीर- तलवार- छुरी- चाकू आदि आखिर यह भी तो लोहा ही है ना, पर हत्या आदि कार्यों में प्रयुक्त होता है। अतः "भूलि न करिय कुसंग"-- अर्थात, अच्छे लोगों की संगति हमेशा श्रेयष्कर होते है।। गोस्वामी जी की उपरोक्त सन्देश में रघुकुल के चारों भ्राता, सुग्रीब- हनुमान आदि बानर मित्र, असुर कुल से होने भी हरिभक्त मित्र विभीषण-- एक- एक सही मित्र होने की कर्त्तव्य- कर्म के साथ भाईचार का भी अनमोल दृष्टान्त योग्य बने थे। ऐसे द्वापर में भी त्रेता युगीय रावण वंश तुल्य कुरुकुल- भाईचार की प्राचुर्य तो देखने लायक है, जंहा "सत्ता" हासिल की "स्वार्थ" ही मुख्य रूप में अंत:स्वर बन गयी थी। और इसीलिए त्रेता युगीय रघुवंशी चारों भ्राताओं में "संगति" जैसी "निःस्वार्थ भाईचार" की अनन्य आदर्श एक विरल दृष्टान्त होकर रह गया है।। ##रामायण #रामायण महाभारत #रामायण कथा #रामायण ज्ञान #रामायण चौपाई
sn vyas
2.1K views
19 days ago
#रामायण #रामायण कथा ये उस समय की बात है जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए पूरी वानर सेना सेतु निर्माण के कार्य में लगी थी सभी वानर दूर-दूर से शिलाएँ लेकर आ रहे थे। नल-नील को मिला श्राप वरदान साबित हो रहा था। वे प्रभु श्रीराम का नाम ले-लेकर सभी शिलाओं को सागर में डाल रहे थे। प्रभु श्रीराम के नाम से डाली गयी सभी शिलायें सागर जल में तैर रही थीं। शीघ्रता से सेतु निर्माण का कार्य चल रहा था। लक्ष्मण, विभिषण तथा सुग्रीव सेतु निर्माण कार्य का निरिक्षण कर रहे थे। श्री रामचन्द्र जी भी समीप ही एक शिला पर बैठे इस कार्य को देख रहे थे। उनके मन में विचार आया कि सभी सेतु निर्माण में व्यस्त है किन्तु मैं यहाँ खाली बैठ कर देखता रहूँ यह तो उचित नहीं है। वे चुपके से उठे और सबसे नजरें बचा कर एक शिला को उठाकर उन्होंने भी सागर जल में छोड़ दिया। किन्तु यह क्या जहाँ सभी शिलायें सागर जल में तैर रही थी, प्रभु श्रीराम द्वारा छोड़ी गई शिला तुरन्त जल में डूब गई। यह देख श्रीरामजी को बहुत आत्मग्लानि हुई की उनकी छोड़ी शिला क्यों जल में डूब गयी। वे चुपचाप आकर वापस शिला पर बैठ गये। शिला के डूब जाने से वे बहुत उदास थे। हनुमानजी उन्हें उदास देख उनके पास आये तथा उदासी का कारण पूछा। तब श्रीरामजी ने पूरी बात उन्हें बताई। श्रीरामजी की पूरी व्यथा सुनने के बाद हनुमानजी ने कहा- "प्रभु! जिन्हें श्रीराम का नाम मिल जाये वे इस सागर मे तो क्या भवसागर में भी तैर जायेंगे, किन्तु जिसे श्रीराम ही छोड़ दें, वे तो भवसागर क्या इस सागर में भी एक-पल नहीं तैर सकते।" हनुमानजी के मुख से ये वचन सुन श्रीरामजी की आँखों में आँसू छलक आये, उन्होंने भावविभोर हो हनुमानजी को हृदय से लगा लिया।
sn vyas
726 views
22 days ago
#राम #रामायण कथा #रामायण ज्ञान #रामायण हिंदू धर्म ग्रंथों और पुराणों में बहुत से लोगों की कथाएं प्रचलित है जिन्हें किसी न किसी श्राप के कारण अपने असली रूप को खोना पड़ा। ऐसा ही एक रामायण का एक पात्र काक भुशुण्डि हैं जो एक ऋषि के द्वारा दिए गए श्राप के कारण कौआ बन गए। काकभुशुण्डि के बारे में रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में लिखा है कि काकभुशुण्डि परमज्ञानी राम भक्त थे। लेकिन एक ऋषि के श्राप के कारण अपना पूरा जीवन एक कौआ बनकर बिताना पड़ा था। कौन थें काकभुशुण्डि?: पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री राम की कथा भगवान शिव ने माता पार्वती को सुनाई थी। उस कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया थी।उसी कौवे का पुनर्जन्म काकभुशुण्डि के रूप में हुआ था। काक भुशुण्डि को पिछले जन्म में भगवान शिव के मुख से सुनी हुई रामकथा पूरी तरह से याद थी, इसलिए उन्होंने यह कथा अन्य लोगों को भी सुनाई। भगवान शिव के द्वारा सुनाई गई कथा अध्यात्म रामायण के नाम से जानी गई । शास्त्रों में काकभुशुण्डि परमज्ञानी और राम भक्त बताया गया है। रामचरितमानस के अनुसार, प्रभु श्री राम और रावण के युद्ध में जब रावण पुत्र मेघनाद ने श्री राम और लक्ष्मण को नागपाश से बांध दिया था ,तब नारद मुनि के कहने पर गरुड़ जी ने श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्ति दिलाई थी। काकभुशुण्डि दूर किया संदेह: श्रीराम के इस तरह नागपाश में बंध जाने से गरुड़ जी को उनके अवतारी होने पर संदेह हो गया था। तब उनका संदेह दूर करने के लिए नारद जी ने उनको ब्रह्मा जी के पास भेजा। ब्रह्मा जी ने उनको महादेव के पास भेज दिया। महादेव ने गरुड़ के संदेह को दूर करने के लिए उनको काकभुशुण्डि जी के पास भेज दिया. अंत में काकभुशुण्डि ने श्रीराम का चरित्र गरुड़जी के सुनाकर उनका संदेह दूर किया। काकभुशुण्डि ऐसे बने कौआ: गरुड़ जी का संदेह दूर करने के बाद काकभुशुण्डि ने उन्हें अपने कौआ बनने की कथा सुनाई थी। जिसके अनुसार, काकभुशुण्डि जी का प्रथम जन्म अयोध्या पुरी में एक शूद्र के घर में हुआ उस जन्म में वह भगवान शिव के भक्त थे, लेकिन अहंकार के वशीभूत होकर उन्होंने अन्य देवताओं की निंदा करते थे। एक बार अयोध्या में अकाल पड़ जाने पर वह उज्जैन चले गये। उन्होंने एक दयालु ब्राह्मण की सेवा की और उन्हीं के साथ रहने लगे। वह ब्रह्मण भी शिवभक्त थे लेकिन अन्य देवताओं की निंदा नहीं करते थे। एक बार काकभुशुण्डि से परेशान होकर गुरु ने उन्हें राम भक्ति का उपदेश देना शुरू किया। भगवान शिव ने दिया श्राप: घमंड में चूर काकभुशुण्डि ने एक बार अपने गुरु का ही अपमान कर दिया, जिससे भगवान शिव नाराज हो गए और श्राप दिया कि तूने अपने गुरु का अपमान किया है। इसलिए तूझे सर्प योनि में जन्म लेने के बाद 1000 बार कई योनियों में जन्म लेना पड़ेगा। लेकिन ब्राह्मण ने भगवान शिव से काकभुशुण्डि को क्षमा करने का निवेदन किया, लेकिन भगवान शिव ने कहा कि जब तक इसे अपने पापों का प्रायश्चित करना होगा। लोमेश ऋषि ने दिया श्राप समय के साथ उनमें श्री राम के प्रति भक्ति उत्पन्न हो गई और अंत में ब्राह्मण का शरीर प्राप्त किया। वह ज्ञान प्राप्ति के लिए लोमश ऋषि के पास गए। जब लोमश ऋषि उसे ज्ञान देते थे तो वह उनसे अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क करता था। उसके इस व्यवहार से कुपित होकर लोमश ऋषि ने उसे शाप दे दिया कि जा तू चाण्डाल पक्षी यानी कौआ बन जा। वह तत्काल कौआ बनकर उड़ गया। श्राप देने के बाद ऋषि को पश्चाताप हुआ और उन्होंने उस कौए को वापस बुला कर राममंत्र दिया और साथ में इच्छामृत्यु का वरदान भी दिया राममंत्र मिलने के कारण उसको उस कौए के शरीर से भी प्रेम हो गया और बाद में वह काकभुशुण्डि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।