एक रचना रोज में प्रस्तुत है आज की रचना “चिट्ठी है किसी दुखी मन की”। इसको लिखा है कुँवर बेचैन जी ने ।✍🏼 #🖋 साहित्य शीर्षक - ख़त
🖋 साहित्य शीर्षक - ख़त - एक रचना रोज चिट्ठी है किसी दुखी मन की बंर्तन की यह उठका पटकी यह बात बात पर झल्लाना । चिट्ठी है किसी दुखी मन की । ' : यह थकी देह पर कर्मभार इसको खांसी उसको बुखार जितना वेतन उतना उधार नन्हें मुन्नों को गुस्से में | हर बार मार कर पछताना । चिट्ठी है किसी दुखी मन की । . इतने धंधे यह क्षीणकाय | ढोती ही रहती विवश हाय खुद ही उलझन खुद ही उपाय आने पर किसी अतिथि जन के दुख में भी सहसा हँस जाना चिट्ठी है किसी दुखी मन की । कुंवर बेचैन ( ) शेयरचैट - ShareChat
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5 महीने पहले
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