रोहिणी व्रत - प्रत्येक मास में जिस दिन रोहिणी नक्षत्र हो , उस दिन रोहिणी व्रत करना चाहिये । मृगसिरा नक्षत्र में इस व्रत का पारणा करना चाहिये । रोहिणी व्रत करने से शोक , दारिद्रय आदि नष्ट हो जाते हैं । इस व्रत के प्रभाव से ऐश्वर्य , सुख आदि की वृद्धि होती है । इस व्रत के करने से स्त्रियों को सौभाग्य , संतान , ऐश्वर्य , स्वास्थ्य आदि अनेक फलों की प्राप्ति होती हैं । व्रत विधिः प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन होवे उस दिन चारो प्रकार के आहार का त्याग करें और श्री जिन चैत्यालय में जाकर धर्मध्यान सहित सोलह प्रहर व्यतीत करे अर्थात सामयिक , स्वाध्याय , धर्मचर्चा , पूजा , अभिषेकादि में काल बिताये और स्वशक्ति अनुसार दान करे । इस व्रत के दिन भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है । इस व्रत के उपवास के दिन ऊँ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय नम : ' मंत्र का जाप करना चाहिये । जिनको उपवास करने की शक्ति न हो वे संयम ग्रहण कर अल्पभोजन करें , या काँजी अथवा मांड - भात ले । व्रत के दिन पञ्चाणुव्रतों का पालन करना , कपाय और विकथाओं को छोड़ना आवश्यक है । मृगशिर नक्षत्र में पारण एवं कृतिका नक्षत्र में व्रत की धारणा करने से व्रत विधि पूर्णमानी जाती है । इस प्रकार यह व्रत ५ वर्ष और ५ मास तक करे । इसके पश्चात उद्यापन करे । अर्थात् छत्र , चवर , ध्वजा , पाटला आदि उपकरण मंदिर में चढ़ाये , साधुओं व सधर्मी तथा विद्यार्थियों को शास्त्र देवे , वेष्टन देवे , चारों प्रकार के दान देवे और जो द्रव्य खर्च करने की शक्ति न हो तो दूना व्रत करे । - ShareChat
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8 महीने पहले
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