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#उत्तरप्रदेश #news #न्यूज़
उत्तरप्रदेश - टाइम्स ऑफ जनसत्ता हिन्दी दैनिक संक्षिप्त समाचार मुख्यमंत्री को भेजी शिकायत पर डीपीआरओ की भ्रामक आख्या जनसुनवाई व्यवस्था पर उठे सवाल गोंडा। उत्तर प्रदेश सरकार की जनसुनवाई व्यवस्था की पारदर्शिता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। को भेजी गई एक मुख्यमंत्री  शिकायत के निस्तारण में जिला पंचायत राज अधिकारी ( डीपीआरओ गोंडा द्वारा प्रस्तुत की गई १५वीं आख्या को शिकायतकर्ता ने असत्य व भ्रामक बताते हुए प्रशासनिक लापरवाही का आरोप लगाया है। मामला ऑनलाइन शिकायत संदर्भ संख्या ६००००२५०२९३५८ से जुड़ा है, जिसे रामकेवल पुत्र स्व. अयोध्या प्रसाद, निवासी ग्राम पंचायत परेड सरकार, विकास खंड झंझरी, जनपद गोंडा द्वारा दर्ज कराया गया था। शिकायत में आरोप है कि पिता के निधन के बाद नियमों को दरकिनार कर परिवार रजिस्टर में नामांतरण किया गया तथा बिना वैधानिक आदेश के मकान संख्या में परिवर्तन कर दिया गया। डीपीआरओ की रिपोर्ट पर विरोधाभास दिनांक 7 जनवरी २०२६ को जारी डीपीआरओ की आख्या में कहा गया है कि शिकायतकर्ता का नाम परिवार रजिस्टर से नहीं हटाया गया है और किसी प्रकार का परिवार विभाजन आदेश पारित नहीं किया गया। हालांकि, शिकायतकर्ता का कहना है कि जब विभाजन का कोई आदेश ही नहीं है, तो परिवार रजिस्टर में परिवर्तन और मकान संख्या में बदलाव किस आधार पर किया गया, यह स्पष्ट नहीं किया गया। दस्तावेज़ों के अनुसार, डीपीआरओ की रिपोर्ट में २१ जनवरी २०२१ के एक आदेश का हवाला दिया गया है, जबकि उसी आदेश में परिवार विभाजन की पुष्टि नहीं होती। इसके बावजूद कार्रवाई दर्शाकर शिकायत को निस्तारित बताया जाना प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। बार-बार शिकायत के बावजूद नहीं मिला न्याय-शिकायतकर्ता का आरोप है कि उसने विभिन्न माध्यमों से बार-बार शिकायत दर्ज कराई, लेकिन हर बार औपचारिक रिपोर्ट लगाकर मामला निस्तारित कर दिया इससे जनसुनवाई व्यवस्था की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। गया। जनसुनवाई प्रणाली पर सवाल मुख्यमंत्री तक पहुंचने वाली शिकायत पर भी यदि तथ्यों की अनदेखी कर रिपोर्ट प्रस्तुत की जा रही है, तो आम नागरिक को न्याय कैसे मिलेगा- यह बड़ा प्रश्न बनकर सामने आया है। प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय न होने से जनसुनवाई व्यवस्था केवल कागजी प्रक्रिया बनती जा रही है। मामले में डीपीआरओ कार्यालय, सहायक विकास अधिकारी ( पंचायत एवं संबंधित पंचायत कर्मियों की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठ रही है। साथ ही भ्रामक आख्या प्रस्तुत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की जा रही है। टाइम्स ऑफ जनसत्ता हिन्दी दैनिक संक्षिप्त समाचार मुख्यमंत्री को भेजी शिकायत पर डीपीआरओ की भ्रामक आख्या जनसुनवाई व्यवस्था पर उठे सवाल गोंडा। उत्तर प्रदेश सरकार की जनसुनवाई व्यवस्था की पारदर्शिता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। को भेजी गई एक मुख्यमंत्री  शिकायत के निस्तारण में जिला पंचायत राज अधिकारी ( डीपीआरओ गोंडा द्वारा प्रस्तुत की गई १५वीं आख्या को शिकायतकर्ता ने असत्य व भ्रामक बताते हुए प्रशासनिक लापरवाही का आरोप लगाया है। मामला ऑनलाइन शिकायत संदर्भ संख्या ६००००२५०२९३५८ से जुड़ा है, जिसे रामकेवल पुत्र स्व. अयोध्या प्रसाद, निवासी ग्राम पंचायत परेड सरकार, विकास खंड झंझरी, जनपद गोंडा द्वारा दर्ज कराया गया था। शिकायत में आरोप है कि पिता के निधन के बाद नियमों को दरकिनार कर परिवार रजिस्टर में नामांतरण किया गया तथा बिना वैधानिक आदेश के मकान संख्या में परिवर्तन कर दिया गया। डीपीआरओ की रिपोर्ट पर विरोधाभास दिनांक 7 जनवरी २०२६ को जारी डीपीआरओ की आख्या में कहा गया है कि शिकायतकर्ता का नाम परिवार रजिस्टर से नहीं हटाया गया है और किसी प्रकार का परिवार विभाजन आदेश पारित नहीं किया गया। हालांकि, शिकायतकर्ता का कहना है कि जब विभाजन का कोई आदेश ही नहीं है, तो परिवार रजिस्टर में परिवर्तन और मकान संख्या में बदलाव किस आधार पर किया गया, यह स्पष्ट नहीं किया गया। दस्तावेज़ों के अनुसार, डीपीआरओ की रिपोर्ट में २१ जनवरी २०२१ के एक आदेश का हवाला दिया गया है, जबकि उसी आदेश में परिवार विभाजन की पुष्टि नहीं होती। इसके बावजूद कार्रवाई दर्शाकर शिकायत को निस्तारित बताया जाना प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। बार-बार शिकायत के बावजूद नहीं मिला न्याय-शिकायतकर्ता का आरोप है कि उसने विभिन्न माध्यमों से बार-बार शिकायत दर्ज कराई, लेकिन हर बार औपचारिक रिपोर्ट लगाकर मामला निस्तारित कर दिया इससे जनसुनवाई व्यवस्था की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। गया। जनसुनवाई प्रणाली पर सवाल मुख्यमंत्री तक पहुंचने वाली शिकायत पर भी यदि तथ्यों की अनदेखी कर रिपोर्ट प्रस्तुत की जा रही है, तो आम नागरिक को न्याय कैसे मिलेगा- यह बड़ा प्रश्न बनकर सामने आया है। प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय न होने से जनसुनवाई व्यवस्था केवल कागजी प्रक्रिया बनती जा रही है। मामले में डीपीआरओ कार्यालय, सहायक विकास अधिकारी ( पंचायत एवं संबंधित पंचायत कर्मियों की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठ रही है। साथ ही भ्रामक आख्या प्रस्तुत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की जा रही है। - ShareChat

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