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#गुलज़ार शायरी
गुलज़ार शायरी - बोझ साँसों का था और हम बस्ता बदलते रहे। | मंज़िल मिट्टी में थी और हम रस्ता बदलते रहे। | अल्फ़ाज़ कलम से बोझ साँसों का था और हम बस्ता बदलते रहे। | मंज़िल मिट्टी में थी और हम रस्ता बदलते रहे। | अल्फ़ाज़ कलम से - ShareChat

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