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#GodMorningMonday #Annapurna_Muhim_SantRampalJi . कर्म का फल . मृत्युलोक में प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मरता है। प्राणी का धन-वैभव घर में ही छूट जाता है। मित्र और स्वजन श्मशान में छूट जाते हैं। शरीर को अग्नि ले लेती है। पाप पुण्य के कर्म ही उस जीव के साथ जाते हैं। अकेले ही वह पाप पुण्य के कर्म का भोग करता है परन्तु धर्म ही उसका अनुसरण करता है। शरीर और कर्म इन दोनों में बहुत अंतर है, क्योंकि शरीर तो थोड़े ही दिनों तक रहता है किन्तु कर्म प्रलयकाल तक बने रहते हैं। कर्म दो तरह के होते है एक पापकर्म दुसरा पुण्यकर्म।वेदों में जिन कर्मों का विधान है, वे धर्मकर्म अथार्त पुण्य हैं और उनके विपरीत पापकर्म अथार्त अधर्म पापकर्म कहलाते हैं। मनुष्य एक दिन या एक क्षण में ऐसे पुण्य या पाप कर सकता है कि उसका भोग सहस्त्रों वर्षों में भी पूर्ण न हो। मनुष्य की आत्मा उसके किये गये कर्म की साक्षी है। कर्म से ही देह मिलता है। पृथ्वी पर जो मनुष्य-देह है उसमें एक सीमा तक ही सुख या दु:ख भोगने की क्षमता है। जो पुण्य या पाप पृथ्वी पर किसी मनुष्य-देह के द्वारा भोगने संभव नही, उनका फल जीव स्वर्ग या नरक में भोगता है। पाप या पुण्य जब इतने रह जाते हैं कि उनका भोग पृथ्वी पर संभव हो, तब वह जीव पृथ्वी पर किसी देह में जन्म लेता है। कर्मों के अवशेष भाग को भोगने के लिए मनुष्य मृत्युलोक में स्थावर-जंगम अर्थात् वृक्ष, गुल्म, लता, बेल, पर्वत और तृण–आदि योनि प्राप्त करता है। ये सब दु:खों के भोग की योनियां हैं। वृक्षयोनि में दीर्घकाल तक सर्दी-गर्मी सहना, काटे जाने व अग्नि में जलाये जाने सम्बधी दु:ख भोगना पड़ता है। यदि जीव कीट योनि प्राप्त करता है तो अपने से बलवान प्राणियों द्वारा दी गयी पीड़ा सहता है, शीत-वायु और भूख के क्लेश सहते हुए मल-मूत्र में विचरण करना आदि दारुण दु:ख उठाता है। इसी तरह से पशुयोनि में आने पर अपने से बलवान पशु द्वारा दी गयी पीड़ा का कष्ट पाता रहता है। पक्षी की योनि में आने पर कभी वायु पीकर रहना तो कभी अपवित्र वस्तुओं को खाने का कष्ट उठाना पड़ता है। यदि भार ढोने वाले पशुओं की योनि में जीव आता है तो रस्सी से बांधे जाने, डण्डों से पीटे जाने व हल जोतने का दारुण दु:ख जीव को सहना पड़ता है। मनुष्य योनि दुर्लभ है। इस प्रकार बहुत-सी योनियों में भ्रमण करके जीव किसी महान पुण्य के कारण मनुष्य योनि प्राप्त करता है। मनुष्ययोनि प्राप्त करके भी यदि दरिद्र, रोगी, काना या अपाहिज जीवन मिले तो बहुत अपमान व कष्ट भोगना पड़ता है। इसलिए दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर संसार-बंधन से मुक्त होने के लिए प्राणी को परमपिता परमात्मा कबीर साहिब जी की आराधना करनी चाहिए क्योंकि वे ही कर्मफल के दाता व संसार-बंधन से छुड़ाने वाले मोक्षदाता हैं। कबीर साहिब जी की भक्ति उनके द्वारा भेजे गये संत या यु कहे कि परमात्मा कबीर साहिब जी स्वम एक संत के रूप मे सदगुरू बनकर आते है और अपना तत्वज्ञान बताकर इस संसार सागर से पार करवाते है। Visit Annapurna Muhim YouTube #sant ram pal ji maharaj #me follow
sant ram pal ji maharaj - शत गक्ति संदेश @శకలె का कृषा पात्र कर्म न यारी देत है॰ भसमागीर भस्मन्त। कर्म व्यर्थ है तास का॰जे रीझै नहीं भगवन्त।| जो खेत में बीज नर्ही बोता है। फिर वर्षा हो जाती है। यढि वह फसल पाने की आशा ஈள लगाता है तो भी व्यर्थ है। भावार्थ है कि भक्त कर्म भी और परमेश्वर का कृपा पात्र भी बना रहे तो जीव को लाश मिलता है। जगतगुरु तत्वदशी संत रामपाल जी महाराज SPIRIIUAL LEADER SanT RamPAL Ji @SAINIRAMPAUIM SUPREMEGOD ORG SAINT RAMPAL JI MAHARA शत गक्ति संदेश @శకలె का कृषा पात्र कर्म न यारी देत है॰ भसमागीर भस्मन्त। कर्म व्यर्थ है तास का॰जे रीझै नहीं भगवन्त।| जो खेत में बीज नर्ही बोता है। फिर वर्षा हो जाती है। यढि वह फसल पाने की आशा ஈள लगाता है तो भी व्यर्थ है। भावार्थ है कि भक्त कर्म भी और परमेश्वर का कृपा पात्र भी बना रहे तो जीव को लाश मिलता है। जगतगुरु तत्वदशी संत रामपाल जी महाराज SPIRIIUAL LEADER SanT RamPAL Ji @SAINIRAMPAUIM SUPREMEGOD ORG SAINT RAMPAL JI MAHARA - ShareChat