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. कौआ और हंस
गरीब, हंस गवन करते नहीं, मानसरोवर छाड़ी।
कौवा उडि उडि जात हैं, खाते मांसा हाड।।
गरीब, मानसरोवर मुक्ति फल, मुक्ता हल के ढेर।
कौवा आसन नां बंधै, जै भूमि दीन सुमेर।।
गरीब, कौवा रूपी भेष है, ना परतीत यकीन।
अठसठि का फल मेटि करि, भये दीन बे दीन।।
गरीब, हंस दशा तौ साध हैं, सरोवर है सतसंग।
मुक्ताहल बानी चुगैं, चढत नबेला रंग।।
उपरोक्त वाणियों में संत गरीबदास जी ने समझाया है कि जिस सरोवर में मोती होते हैं। उस सरोवर पर हंस पक्षी ही रहते हैं यानि हंस ही स्थाई निवास करते हैं क्योंकि उनका आहार मोती ही होता है। हंस मछली या अन्य जीव-जंतुओं का माँस नहीं खाता। कौआ पक्षी उस सरोवर पर नहीं टिकता। वह कुछ देर आता है। वहाँ माँस नहीं मिलता। फिर माँस खाने के लिए कहीं ओर उड़ जाता है।
सत्संग सरोवर कहा है और साध संगत हंस कहे हैं तथा विकारी व्यक्ति कौए रूपी बताए हैं। भक्त तो सत्संग प्रवचन रूपी मोती खाते हैं जो उनका आहार है तथा शराबी कवाबी कौए रूपी हैं जो सत्संग में अधिक देर नहीं टिकते, परंतु भक्त सत्संग छोड़कर अन्य स्थान पर नहीं जाते जैसे सिनेमा देखना, नाचना, शराब का ठेका आदि स्थानों पर भक्त नहीं जाते तथा अन्य उपासना जो शास्त्राविरूद्ध है, वह करने किसी देवी-धाम, तीर्थ आदि पर नहीं जाते।
जो शास्त्राविरूद्ध साधना करने वाले पंथ हैं, उनके अनुयाई हमारे ज्ञान पर विश्वास न करके अड़सठ।तीर्थों पर भटकते हैं। उनको यह ज्ञान नहीं है कि जिन महापुरूषों ने जिस स्थान पर साधना की है, उनके नाम से वे स्थान प्रसिद्ध हैं। आप भी वैसी साधना करो। उन तीर्थ स्थानों पर जाकर उन अड़सठ तीर्थों का गुण यानि लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। उनका लाभ तो उसी प्रकार डटकर साधना करने से मिलेगा जिसको तीर्थ भ्रमण करने वाले मिटा रहे हैं यानि खो रहे हैं।
गरीब, दरस परस नहीं अंतरा, रूमी बस्त्रा बीच।
पारस लोहा एक ढिग, पलटै नहीं अभीच।।
गरीब, च्यार मुक्ति बैकुंठ बट, सप्तपुरी सैलान।
आगै धाम कबीरका, हंस न पावैं जान।।
गरीब, पल सेती पल ना मिलै, भौंहि लगै नहीं भौंहि।
बिच तकिया महबूब का, परमेश्वर की सौंहि।।
पुराने समय में रोम देश का बना बहुत पतला वस्त्र आता था जिसे सेठ लोग पहनते थे। बताया है कि पारस पत्थर को लोहे से छू दिया जाए तो वह स्वर्ण बन जाता है। यदि पारस पत्थर और लोहा साथ-साथ रखे हैं और उनके बीच में रूपी वस्त्र की मोटाई जितना भी फांसला रह जाए तो चाहे लाख वर्ष रखे रहो, स्वर्ण नहीं बनेगा।
इसी प्रकार संत के पास कपट रखने वाला व्यक्ति भक्त बना दिखाई देता है, परंतु उस पर संत के पारस रूपी सत्संग वचनों का प्रभाव नहीं पड़ता। सात नगरियाँ जो श्री ब्रह्मा, विष्णु, शिव जी तथा दुर्गा, धु्रव, प्रहलाद आदि के लोक हैं, इनमें तो चार मुक्ति वाले निवास करते हैं। फिर जन्म-मरण में आते हैं। इनसे कबीर जी का स्थान दोनों सैलियों के मध्य में यानि त्रिकुटी में है। वहाँ से आगे सतलोक जाते हैं।
सत्य साधना न होने के कारण कोई भी साधक सतलोक नहीं जा पाता। काल जाल में ही रह जाता है। त्रिकुटी स्थान पर कबीर जी का तकिया यानि सिंहासन है। गरीबदास जी ने परमात्मा की सौगंध खाकर बताया है कि मैं सत्य कह रहा हूँ।
कुछ अज्ञानी व्यक्ति स्वयंभू बनकर बैठे हैं। कहते हैं कि आँखों की पलकों को इतना बंद करो कि वे आपस में मिलें नहीं यानि आँखों को थोड़ा खोलकर सामने एकटक देखो, कुछ दिखाई देगा। वह परमात्मा है। कुछेक को अपनी आँखों के सामने वाली काली-2 टिक्की या स्प्रिंग-सा दिखाई देता है। उसी को परमात्मा का स्वरूप बताया जाता है। कुछेक को कुछ नहीं दिखता। वे शर्म के मारे कह देते हैं, हाँ! कुछ दिखा। परंतु बाद में स्पष्ट बताते हैं कि कुछ नहीं दिखा। गुरू जी ने बार-बार कहा तो हाँ भर ली थी।
ऐसे दोनों प्रकार के भ्रमित व्यक्ति संत रामपाल जी महाराज का ज्ञान समझकर संत रामपाल के पास आए और दीक्षा ली, तब बताया। उनको मैंने समझाया कि भक्ति की प्रेरणा पूर्व जन्म के शुभ संस्कारों के कारण होती है। उनमें पूर्व जन्म में की भक्ति की शक्ति यानि भक्ति की कमाई शेष रहती है। विशेष ध्यान देने से आँखों के सामने काली बिन्दु रूप में या बाल जैसे स्प्रिंग के छल्ले रूप में दिखते हैं। यदि फिर से शास्त्र विधि अनुसार सत्य साधना करने को नहीं मिलती तो इसी जन्म में कुछ समय उपरांत दिखाई देनी बंद हो जाती हैं क्योंकि वह खर्च हो जाती हैं।
संत रामपाल दास जी महाराज को बचपन से ही ऐसी वस्तुऐं आँखों के सामने दिखाई देती थी। सोचता था कि मेरी दृष्टि कमजोर है। जिस कारण से ये काली-2 टिकारियाँ दिखाई दे रही हैं। सन् 1988 में गुरू जी से दीक्षा लेने के पश्चात् वे और अधिक हो गई तो चिंता बढ़ गई कि शायद आँखों की दृष्टि और कम हो गई है। चैक करवाया तो आँखें ठीक मिली। एक दिन गुरू जी को बताया तो उन्होंने कहा कि यह तेरी भक्ति का धन है जो बढ़ने लगा है। पहले यह पूर्व जन्म की बची भक्ति दिखाई देती थी। यह धीरे-धीरे समाप्त हो जाती। उसके पश्चात् शांति हुई तथा अब अत्यधिक बढ़ गई है, ढ़ेर लगा है।
गरीब, नर नाडि कूं पकडि हैं, कर सें गहै सुचेत।
निशां नफस में होत है, तब हंसा दरशै श्वेत।
जैसे नाडि़या वैद्य हाथ की नाड़ी को हाथ से सावधानी से पकड़ता है। उसकी गति से रोग को जान लेता है। इसी प्रकार सत्य साधना सावधानी से सुरति-निरति (ध्यान) लगाकर की जाती है। तब साधक सफेद रंग का दिखाई देता है यानि सतलोक में जीवात्मा सफेद नूरी शरीर धारण करती है। चिन्ह साधना करने से मोक्ष के लक्षण दिखाई देते हैं।
गरीब, कलि बिष कोयला कर्म हैं, चिनघी अगनि पतंग।
अजामेल सदना तिरे, जरि बरि गये कुसंग।।
गरीब, मौनि रहैं मघ नां लहैं, मारग बंकी बाट।
शून्य शिखर गढ सुरंग है,करि सतगुरु सें सांट।
पाप कर्म तो कोयले के समान हैं। सत्यनाम की अग्नि की चिंगारी का पतंगा जलता हुआ लकड़ी या कोयले का टुकड़ा यदि उड़कर किसी सूखे घास या कोयले के ढे़र में गिर जाता है। उसे जलाकर राख कर देता है। ऐसे सत्य साधना का पतंगा पापों को जलाकर राख कर देता है। इसी तरह पापी अजामेल तथा सदना कसाई तर गए थे। भवसागर से पार हो गए थे। उनके पाप जल गए। उनका कुसंग यानि बुरी संगत छूट गई थी।
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