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#भगवत गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓
भगवत गीता - नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवं विधो द्रष्टं दृष्ट्वानसिमां यथा।| जिस प्रकार तमने मझरकों देखा है इस प्रकार चतर्भज मैनवेदोसि न तप से न दान से औरन यज्ञ aIGI सेहीदेखा जा सकता हँ ||53|| ಖlrl: इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि उनके विराट रूप कोविदों, तपस्या, दान, या यज्ञों कि माध्यम सेनही देखा जा सकता| यह विराट रूप केवल दिव्य दृष्टि वाले विशेष योगियों कोही दिखता है।श्री कृष्ण यहॉ स्पिष्ट कर रहेहै कि उनके इस रूप कोदेखना या समझना केवल भक्ति ओर अध्यात्मिक दृष्टिस संभव है न कि केवल बाहरी कर्मों द्वारा इस श्लोक का उद्देश्य यहहै कि धतमिक अनुष्ठानों और कर्मकांडो से अधिक महत्वपूर्णहैओत्मा की गहराई और इश्वरके प्रति सच्ची श्रद्रय यहॉँश्री कष्ण यहबताना चाहत है कि केवल धार्मिक कर्मों सहीईश्वरकी दिव्यता का अनुभव नही किया जा सकता; इसके लिए एक उच्च स्तरीय अध्यात्मिक जगरूकता और भक्तिको आवश्यकता हैl नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवं विधो द्रष्टं दृष्ट्वानसिमां यथा।| जिस प्रकार तमने मझरकों देखा है इस प्रकार चतर्भज मैनवेदोसि न तप से न दान से औरन यज्ञ aIGI सेहीदेखा जा सकता हँ ||53|| ಖlrl: इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि उनके विराट रूप कोविदों, तपस्या, दान, या यज्ञों कि माध्यम सेनही देखा जा सकता| यह विराट रूप केवल दिव्य दृष्टि वाले विशेष योगियों कोही दिखता है।श्री कृष्ण यहॉ स्पिष्ट कर रहेहै कि उनके इस रूप कोदेखना या समझना केवल भक्ति ओर अध्यात्मिक दृष्टिस संभव है न कि केवल बाहरी कर्मों द्वारा इस श्लोक का उद्देश्य यहहै कि धतमिक अनुष्ठानों और कर्मकांडो से अधिक महत्वपूर्णहैओत्मा की गहराई और इश्वरके प्रति सच्ची श्रद्रय यहॉँश्री कष्ण यहबताना चाहत है कि केवल धार्मिक कर्मों सहीईश्वरकी दिव्यता का अनुभव नही किया जा सकता; इसके लिए एक उच्च स्तरीय अध्यात्मिक जगरूकता और भक्तिको आवश्यकता हैl - ShareChat