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#युध्द का असर
युध्द का असर - ईरान युद्ध की आंच खेतों तक , खाद 10 से 30 % महंगी उर्वरक रसायनों की आपूर्ति पर खतरा ; किसानों को संसाधनों की कमी के कारण पैदावार में भारी गिरावट का डर अमोनिया , फॉस्फेट और | उर्वरक उद्योग के लिए जरूरी अमोनिया , सल्फर का 20 % हिस्सा अकेले खाड़ी देशों से आता है । नई दिल्ली । एजेंसी । मध्य - पूर्व में बढ़ते तनाव का असर अब सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रह गया है , बल्कि इसकी आंच दुनिया के खेतों तक पहुंचने लगी है । उर्वरक बनाने के लिए जरूरी रसायनों और कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है । युद्ध शुरू होने के बाद से ही वैश्विक बाजार में खाद की कीमतें 10 से 30 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं । हालांकि यह स्तर अभी भी 2022 में रूस - यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद देखी गई ऊंचाई से फॉस्फेट और सल्फर की वैश्विक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से करीब 40 प्रतिशत कम है , लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे तो खाद की उपलब्धता और कीमत दोनों पर बड़ा असर पड़ सकता है इसका सीधा प्रभाव किसानों की लागत और फसलों की पैदावार पर पड़ने की आशंका है । ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के मुताबिक , दुनिया भर में व्यापार होने वाले यूरिया , जो सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली नाइट्रोजन खाद है , का लगभग आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है . इसमें से अकेले कतर पूरी दुनिया की सप्लाई के 10 फीसदी हिस्से का उत्पादन करता है . जब पिछले हफ्ते ईरान ने दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी और फर्टिलाइजर हमलों से बढ़ी सप्लाई बाधित होने की आशंका हब ' लफ्फान ' पर हमला किया था , तो कतर एनर्जी को अपना उत्पादन रोकना पड़ा . इस वजह से लाखों टन ज़रूरी फर्टिलाइजर न्यूट्रिएंट्स और उन्हें बनाने वाले कच्चे माल ( प्रिकर्सर्स ) जहां के तहां रुक गए । विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समुद्री मार्गों में जोखिम बढ़ता है तो कई शिपिंग कंपनियां अपने जहाजों को इस क्षेत्र से गुजरने से रोक सकती हैं । इससे वैश्विक बाजार में उर्वरकों की उपलब्धता पर सीधा असर पड़ेगा । किसानों की लागत और फसल उत्पादन पर असर उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सबसे पहले किसानों पर पड़ता है । खेती की लागत बढ़ने से किसान फसल चयन में बदलाव कर सकते हैं और ऐसी फसलों की ओर रुख कर सकते हैं जिन्हें कम उर्वरक की जरूरत होती है । वॉशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान के विशेषज्ञों का कहना है कि उर्वरक महंगे होने से मक्का , गेहूं और चावल जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है , क्योंकि इनकी खेती काफी हद तक नाइट्रोजन आधारित खाद पर निर्भर करती है । इसका असर उन देशों पर ज्यादा पड़ सकता है जो उर्वरकों के आयात पर निर्भर हैं । उदाहरण के लिए भारत अपनी जरूरत की बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन खाद खाड़ी देशों से आयात करता है । वहीं ब्राजील भी लगभग 40 प्रतिशत नाइट्रोजन उर्वरक के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर है । यदि आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा बनी रहती है तो खेती की लागत बढ़ने के साथ - साथ वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर भी दबाव बढ़ सकता है । विशेषज्ञों के मुताबिक , ऐसे हालात बने रहे तो इसका असर अंततः दनिया भर के उपभोक्ताओं की थाली तक पहुंच सकता है । - ShareChat