राहुल और मोदी की लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं है, यह संवेदनशीलता और संवेदनहीनता की लड़ाई है।”
बहुत लोग मुझसे पूछते हैं राजनीति से इतर राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व में असली फर्क क्या है?
पिछले दस दिनों के घटनाक्रम देख लीजिए। फर्क अपने आप साफ हो जाएगा। राहुल गांधी इंदौर में दूषित पानी से मरे लोगों के परिजनों का मुद्दा लगातार उठा रहे हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि एक इंसानी जान की कीमत क्या होती है। एक परिवार के लिए एक सदस्य का चले जाना कितना बड़ा, कितना अपूरणीय आघात होता है—और वह भी तब, जब गलती उस व्यक्ति की हो ही नहीं। राहुल इस दर्द को समझते हैं।
महसूस करते हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि वे अंकिता भंडारी के माता-पिता से भी मिलेंगे जैसे वे मणिपुर की बेटियों से मिले थे।क्योंकि वे समझ सकते हैं कि
जब एक बेटी की अस्मत लूटी जाती है और कहीं से न्याय की कोई किरण न दिखे, तो एक परिवार अंदर से कैसे टूटता है। मध्यप्रदेश, मणिपुर और उत्तराखंड इन घटनाओं ने किसी भी संवेदनशील इंसान को भीतर तक हिला दिया होता।
लेकिन अब ज़राप्रधानमंत्री मोदी को देखिए—कभी स्वयं को अवतार की तरह प्रस्तुत करते हुए डमरू बजाते हैं।कभी सार्वजनिक मंचों पर हँसी के फव्वारे छोड़ते हैं।
मानो देश में कुछ हुआ ही न हो।
हर छोटी बात पर पोस्ट करने का समय है। हर हल्की घटना पर
बयान देने की फुर्सत है। लेकिन
जब देश के नागरिकों को उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है—
तब वे चैन की बंसी बजा रहे होते हैं।
राहुल गांधी मुझे नेहरू जी की संवेदनशीलता और मानवीयता की याद दिलाते हैं। नेहरूजी कहा करते थे—“देश ज़मीन से नहीं, लोगों से बनता है।”
यही दृष्टि राहुल गांधी में दिखती है राहुल गांधी एक सच्चे स्टेट्समैन हैं! और एक जेंटलमैन भी। जबकि मोदी जी झूठ बेचने वाले एक सेल्समैन हैं।
फर्क साफ है।
आप बताइए—देश को सेल्समैन चाहिए या स्टेट्समैन?
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