#❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 गणेश जी का जन्म
एक दिन कैलाश पर्वत पर माता पार्वती अकेली थीं। वे नहा रही थीं और चाहती थीं कि कोई उनका दरवाज़ा संभाले ताकि कोई अंदर न आ सके। महादेव तो ध्यान में, शिवगण अपने काम में लगे थे।
माँ पार्वती ने सोचा,
“क्यों न मैं खुद ही अपना रक्षक बना लूँ?”
उन्होंने अपने शरीर के उबटन (हल्दी-चंदन के लेप) से थोड़ी मिट्टी ली और प्यार से एक सुंदर बालक की मूर्ति बनाई।
फिर उसमें प्राण स्थापित किए और बोलीं,
“आज से तुम मेरे पुत्र हो। तुम्हारा नाम गणेश है।
तुम्हारा काम है – मेरी आज्ञा का पालन करना और मुझे बिना इजाज़त किसी को अंदर न आने देना।”
गणेश जी ने हाथ जोड़कर कहा,
“माता, आपके आदेश मेरा धर्म हैं।”
थोड़ी देर बाद महादेव वहाँ आए।
वे अंदर जाना चाहते थे, पर उन्हें दरवाज़े पर एक छोटा बालक रोकता है।
शिवजी ने कहा,
“बालक, हट जाओ, मुझे भीतर जाना है।”
गणेश जी ने हाथ फैलाकर कहा,
“नहीं, मेरी माँ ने मना किया है। बिना उनकी अनुमति कोई अंदर नहीं जा सकता – चाहे वह कोई भी हो।”
शिवजी ने सोचा,
“ये कौन नया बालक है, जो मुझे ही रोक रहा है?”
शिवगणों ने गणेश को समझाने की कोशिश की,
“ये स्वयं महादेव हैं, इन्हें कोई नहीं रोक सकता।”
गणेश जी ने दृढ़ता से कहा,
“मेरे लिए सबसे पहले मेरी माँ की आज्ञा है।
जब तक वे न कहें, मैं किसी को अंदर नहीं जाने दूँगा।”
शिवगण क्रोधित हो गए, युद्ध शुरू हो गया।
छोटे से बालक ने अकेले ही सब देवों और गणों को रोक लिया।
उसकी शक्ति देख सब चकित हो गए।
अंत में महादेव स्वयं आगे बढ़े।
विवाद बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ गया कि कृष्ण-नीति के अनुसार, युद्ध में गणेश जी का सिर कट गया।
उधर अंदर पार्वती जी ध्यान में थीं।
जब उन्हें पता चला कि उनके ही बनाए पुत्र का सिर काट दिया गया है,
तो उनका हृदय छलनी हो गया।
माता पार्वती क्रोध और वेदना से भर गईं।
उन्होंने कहा,
“अगर मेरे पुत्र को जीवन नहीं मिला,
तो मैं पूरी सृष्टि का विनाश कर दूँगी।”
सब देवता घबरा गए।
वे विष्णु जी के पास गए, सबने महादेव से प्रार्थना की।
महादेव बोले,
“ये मेरा ही भूल हो गया।
मैं इसके प्रायश्चित के लिए तैयार हूँ।”
तय हुआ – जिस प्राणी का सिर सबसे पहले उत्तर दिशा में मिलेगा, उसका सिर गणेश के धड़ पर लगाया जाएगा।
देवता उत्तर दिशा की ओर गए, उन्हें एक शिशु हाथी (गज) मिला।
उसका सिर सम्मानपूर्वक लाकर गणेश जी के धड़ पर लगाया गया।
महादेव ने अपने कर-कमलों से उसे जीवनदान दिया।
जैसे ही गणेश जी जीवित हुए,
पार्वती की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।
उन्होंने अपने पुत्र को गले से लगा लिया।
महादेव ने प्रेम से कहा,
“आज से तुम सिर्फ पार्वती पुत्र नहीं,
तुम ‘गणों के ईश’ – गणेश हो।
तुम्हें सबसे पहले पूजा जाएगा।
कोई भी शुभ कार्य, कोई भी यज्ञ, कोई भी पूजा –
तुम्हारे नाम के बिना शुरू नहीं होगी।”
विष्णु जी बोले,
“जहाँ तुम हो, वहाँ विघ्न दूर होंगे,
इसलिए तुम ‘विघ्नहर्ता’ कहलाओगे।”
सब देवताओं ने मिलकर गणेश जी को आशीर्वाद दिया।
और उस दिन से हर शुभ काम की शुरुआत इन शब्दों से होने लगी –
“वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव, सर्वकार्येषु सर्वदा॥”
सीख क्या मिलती है इस कहानी से?
- माँ की आज्ञा और सम्मान बहुत बड़ा धर्म है।
- महादेव जैसे महान भी अपनी भूल मानते हैं – ये विनम्रता है।
- जिसे आज आप साधारण समझते हैं, वही कल सबसे पूज्य बन सकता है।



