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`वो बस्ते का बोझ और यादों का खज़ाना` वो सुबह की नींद का कच्चा नाता, वो माँ का ज़बरदस्ती हमें जगाना। आँखें मलते हुए बस की तरफ भागना, और पीछे से माँ का 'टिफिन ले लो' चिल्लाना। भारी बस्ता कंधों पर, पर दिल बिलकुल हल्का था, हर मुश्किल का हल तब बस एक छोटा सा छर्रा था। वो प्रार्थना की लाइन में पीछे खड़े होकर बतियाना, और टीचर को देख अचानक 'इतनी शक्ति हमें देना' गाना। चौक की वो डस्ट, ब्लैकबोर्ड का वो कालापन, वहीं तो रंगा था हमारा मासूम सा बचपन। वो रफ कॉपी के पीछे 'कट्टम-कुट्टम' का खेल, दोस्ती ऐसी कि जैसे हो लोहे का मेल। पेंसिल की नोक टूटना और शापनर का गुमान, रबड़ खो जाने पर जैसे जाता था जहान। डेस्क पर नाम कुरेदना अपनी पहचान बनाना, और पेन की स्याही से उँगलियों को सजाना। पीरियड के बीच में छुपकर टिफिन का खाना, वो आम का अचार और पराठे का दीवाना। घंटी बजते ही जैसे पिंजरा खुल जाता था, पूरा स्कूल गलियारे में उमड़ आता था। वाटर बोतल से पानी नहीं, प्यार पीते थे, हम असल में उसी एक घंटे में जीते थे। वो पीटी के पीरियड में धूप का सुहानापन, और रेस में जीतने का वो पागल सा जुनून। तब लगता था कि कब आज़ाद होंगे हम, कब इस स्कूल की कैद से बाहर होंगे हम। पर आज जब पीछे मुड़कर उन गलियों को देखते हैं, तो अपनी आज़ादी को स्कूल की उस 'कैद' से तौलते हैं। अब न वो लाइनें हैं, न वो बेंचों का शोर है, ज़िंदगी अब भाग रही किसी अनजानी ओर है। डिग्रियाँ तो हाथ में हैं, पर वो हुनर खो गया, वो बेपरवाह बच्चा कहीं भीड़ में सो गया। > "किताबों के बीच दबी वो सूखी गुलाब की पत्ती तो नहीं मिली, पर स्कूल की यादों ने आज दिल की हर धूल साफ कर दी।" अगर इस poem ने आपका दिल छुआ हो तो like जरूर कर दीजिएगा😇 𝐃𝐫. 𝐉𝐬 𝐆𝐚𝐧𝐝𝐡𝐚𝐫 𝐒𝐚𝐡𝐚𝐛 ✍️✍️ #मेरी कविता ✍️✍️ #मेरे अल्फाज़ ✍️✍️ #☝ मेरे विचार #✍मेरे पसंदीदा लेखक #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता ✍️✍️ - बो बस्ते का बोझ और यादों का खज़ाना` वो सुबह की नींद का कच्चा नाता, बो माँ का ज़बरदस्ती हमें जगाना। आँखें मलते हुए बस की तरफ भागना, और पीछे से माँ का 'टिफिन ले लो' चिल्लाना। নিলব্ল भारी बस्ता कंधों पर, पर दिल हल्का था, हर मुश्किल का हल तब बस एक छोटा सा छर्रा था। लाइन में पीछे खड़े होकर बतियाना , बो प्रार्थना की और टीचर को देख अचानक ' इतनी शक्ति हमें देना' गाना।  चौक की बो डस्ट, ब्लैकबोर्ड का वो कालापन , वहीं तो रंगा था हमारा मासूम सा बचपन। वो रफ कॉपी के पीछे कट्टम ्कुट्टम' का खेल दोस्ती ऐसी कि जैसे हो लोहे का मेल।  பR की नोक टूटना और शापनर का गुमान  रबड़ खो जाने पर जैसे जाता था जहान। पर नाम कुरेदना अपनी पहचान बनाना, डेस्क और पेन की स्याही से उँगलियों को सजाना।  पीरियड के बीच में छुपकर टिफिन का खाना, बो आम का अचार और पराठे का दीवाना। घंटी बजते ही जैसे पिंजरा खुल जाता थाः पूरा स्कूल गलियारे में उमड़ आता था। बाटर बोतल से पानी नहीं, प्यार पीते थे, हम असल में उसी एक घंटे में जीते थे। बो बस्ते का बोझ और यादों का खज़ाना` वो सुबह की नींद का कच्चा नाता, बो माँ का ज़बरदस्ती हमें जगाना। आँखें मलते हुए बस की तरफ भागना, और पीछे से माँ का 'टिफिन ले लो' चिल्लाना। নিলব্ল भारी बस्ता कंधों पर, पर दिल हल्का था, हर मुश्किल का हल तब बस एक छोटा सा छर्रा था। लाइन में पीछे खड़े होकर बतियाना , बो प्रार्थना की और टीचर को देख अचानक ' इतनी शक्ति हमें देना' गाना।  चौक की बो डस्ट, ब्लैकबोर्ड का वो कालापन , वहीं तो रंगा था हमारा मासूम सा बचपन। वो रफ कॉपी के पीछे कट्टम ्कुट्टम' का खेल दोस्ती ऐसी कि जैसे हो लोहे का मेल।  பR की नोक टूटना और शापनर का गुमान  रबड़ खो जाने पर जैसे जाता था जहान। पर नाम कुरेदना अपनी पहचान बनाना, डेस्क और पेन की स्याही से उँगलियों को सजाना।  पीरियड के बीच में छुपकर टिफिन का खाना, बो आम का अचार और पराठे का दीवाना। घंटी बजते ही जैसे पिंजरा खुल जाता थाः पूरा स्कूल गलियारे में उमड़ आता था। बाटर बोतल से पानी नहीं, प्यार पीते थे, हम असल में उसी एक घंटे में जीते थे। - ShareChat