ShareChat
click to see wallet page
search
#Jai Shri Radhe
Jai Shri Radhe - চ भक्ति की शक्ति  சி ரி एक बार वृन्दावन आये वहाँ पर वह नित्य ही कृष्ण स्वरूप श्रीनाथजी के दर्शन ೫ ಗಹ को जाते थे उस मन्दिर महन्त थे जिनका नाम परशुराम था, एक दिन जब नित्य की तरह तुलसी बाबा दर्शन करने पहुँचे तो उन्होंने देखा कि प्रभु के एक हाथ में बंशी है और एक हाथ में लकुटि है प्रभु ने धोती काछ रखी है माथे पर सुन्दर मुकुट है और गले में माला है।  दर्शन कर ही रहे थे कि महन्त जी बोले - हर कोई अपने इष्ट ரி নানা को वन्दन करता है और आप के इष्ट तो राम हैं ये तो मेरे इष्ट हैं और जो दूसरे के इष्ट को नमन करता है वो मूरख कहलाता है।' ही पहले तो बाबा हँसे फिर मन में सीताराम को याद करके इतना सुनते बोले - ' प्रभु आज की छवि का क्या वर्णन क्या जाए। प्रभु आप कितने सुन्दर हो लेकिन अब ये तुलसी मस्तक जब झुकेगा जब आप धनुष ्बाण हाथ में लोगे। ' ९  जैसे ही तुलसी दास ने कहा तो प्रभु की मुरली लकुटी गायब हो गयी जो श्रीनाथजी की प्रतिमा थी वो श्री राम की प्रतिमा हो गयी और हाथ में धनुष बाण   तुलसीदास जी की जयन्जयकार होने लगी  आ गये। चारो तरफ নানা ন ரி प्रसन्न मन से प्रभु को शीश नवाया। अब बात ये आती है कि ऐसा हुआ कैसे और अब क्यों नही होता तो इसका सीधा सा प्रमाण रामचरित मानस में देखने को मिलता है जब प्रभु श्री 79 कहते हैंः H निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।l मुझे कपट छल निन्दयी नहीं बल्कि निर्मल और शुद्ध हृदय वाले लोग भाते हैं। इसलिये निर्मल ह्रदय से प्रभु को भजिये और सबको प्यार करिये किसी से द्वेष मत रखिये क्योंकि- रामहि केवल प्रेम पियारा। जान लेहु जेहि जान निहारा।।  85 ।।जय श्री राम।। श्रीजी की चरण सेवा চ भक्ति की शक्ति  சி ரி एक बार वृन्दावन आये वहाँ पर वह नित्य ही कृष्ण स्वरूप श्रीनाथजी के दर्शन ೫ ಗಹ को जाते थे उस मन्दिर महन्त थे जिनका नाम परशुराम था, एक दिन जब नित्य की तरह तुलसी बाबा दर्शन करने पहुँचे तो उन्होंने देखा कि प्रभु के एक हाथ में बंशी है और एक हाथ में लकुटि है प्रभु ने धोती काछ रखी है माथे पर सुन्दर मुकुट है और गले में माला है।  दर्शन कर ही रहे थे कि महन्त जी बोले - हर कोई अपने इष्ट ரி নানা को वन्दन करता है और आप के इष्ट तो राम हैं ये तो मेरे इष्ट हैं और जो दूसरे के इष्ट को नमन करता है वो मूरख कहलाता है।' ही पहले तो बाबा हँसे फिर मन में सीताराम को याद करके इतना सुनते बोले - ' प्रभु आज की छवि का क्या वर्णन क्या जाए। प्रभु आप कितने सुन्दर हो लेकिन अब ये तुलसी मस्तक जब झुकेगा जब आप धनुष ्बाण हाथ में लोगे। ' ९  जैसे ही तुलसी दास ने कहा तो प्रभु की मुरली लकुटी गायब हो गयी जो श्रीनाथजी की प्रतिमा थी वो श्री राम की प्रतिमा हो गयी और हाथ में धनुष बाण   तुलसीदास जी की जयन्जयकार होने लगी  आ गये। चारो तरफ নানা ন ரி प्रसन्न मन से प्रभु को शीश नवाया। अब बात ये आती है कि ऐसा हुआ कैसे और अब क्यों नही होता तो इसका सीधा सा प्रमाण रामचरित मानस में देखने को मिलता है जब प्रभु श्री 79 कहते हैंः H निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।l मुझे कपट छल निन्दयी नहीं बल्कि निर्मल और शुद्ध हृदय वाले लोग भाते हैं। इसलिये निर्मल ह्रदय से प्रभु को भजिये और सबको प्यार करिये किसी से द्वेष मत रखिये क्योंकि- रामहि केवल प्रेम पियारा। जान लेहु जेहि जान निहारा।।  85 ।।जय श्री राम।। श्रीजी की चरण सेवा - ShareChat