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#कबीर दास #संत कबीर दास के दोहे #🖋️ कबीर दास जी के दोहे
कबीर दास - हेरत हेरत हे सखी , रह्या कबीर हिराई। समानी समुंद मैँ , सो कत हेरी जाइ।I अभ्युदय साहित्य कबीरदास साधना की चरमावस्था में जीवात्मा का अहंभाव नष्ट हो जाता है। अद्वैत की अनुभूति जाग जाने के कारण आत्मा का पृथक्ता बोध समाप्त हो जाता है। अंश आत्मा अंशी परमात्मा में लीन होकर अपना अस्तित्व मिटा देती है। के पृथक् अस्तित्व को यदि कोई आत्मा खोजना चाहे तो लिए यह असाध्य उसके कार्य होगा। हेरत हेरत हे सखी , रह्या कबीर हिराई। समानी समुंद मैँ , सो कत हेरी जाइ।I अभ्युदय साहित्य कबीरदास साधना की चरमावस्था में जीवात्मा का अहंभाव नष्ट हो जाता है। अद्वैत की अनुभूति जाग जाने के कारण आत्मा का पृथक्ता बोध समाप्त हो जाता है। अंश आत्मा अंशी परमात्मा में लीन होकर अपना अस्तित्व मिटा देती है। के पृथक् अस्तित्व को यदि कोई आत्मा खोजना चाहे तो लिए यह असाध्य उसके कार्य होगा। - ShareChat