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islamic naats - रुला देने वाली नात अफ़सोस सर से बाप का साया चला गया बे फ़िक्र ज़िंदगी का सहारा चला गया बरकत थी जिस के दम से हमारे मकान में यानी वो बरकतों का ख़ज़ीना चला गया वो जिस के दम से मेरे चमन में बहार थी खुल्द ए बरीं का करने नज़ारा चला गया रौशन थीं जिस को देख कर आँखों की पुतलिय अफ़सोस वो करम का सितारा चला गया कुछ भी न कह सका वो बेटों से अपने आह तो चुप के से तन्हा चला गया आई क़ज़ा इक पल मुझे क़रार नहीं है तेरे बगैर रोता सिसकता छोड़ के कैसा चला गया सब सो रहे थे रात की तन्हाई में शकील गुलशन उजाड़ कर कोई साया चला गया रुला देने वाली नात अफ़सोस सर से बाप का साया चला गया बे फ़िक्र ज़िंदगी का सहारा चला गया बरकत थी जिस के दम से हमारे मकान में यानी वो बरकतों का ख़ज़ीना चला गया वो जिस के दम से मेरे चमन में बहार थी खुल्द ए बरीं का करने नज़ारा चला गया रौशन थीं जिस को देख कर आँखों की पुतलिय अफ़सोस वो करम का सितारा चला गया कुछ भी न कह सका वो बेटों से अपने आह तो चुप के से तन्हा चला गया आई क़ज़ा इक पल मुझे क़रार नहीं है तेरे बगैर रोता सिसकता छोड़ के कैसा चला गया सब सो रहे थे रात की तन्हाई में शकील गुलशन उजाड़ कर कोई साया चला गया - ShareChat