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#भगवत गीता #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गुरु महिमा😇 #🙏कर्म क्या है❓
भगवत गीता - समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः| शीतोष्णसखदःखेषु समः सङ्गविवर्जितःाजो शत्र मित्र में और मॉन अपमान में सम है तथा सर्दी ग्मी और सख दःखादिद्विंद्वोमेसम है और ऑसक्ति स रहितहै ||i8||| a इस श्लोक में भगवान श्री कष्ण ने ऐसे भक्त का वर्णन किया हैज हर परिस्थितिम समान भाव खखता हावह शत्रु और मित्र HHJR अपमान औरसख और दःखके प्रति समान दृष्टिकोण खखता है। इस श्लोकक अनुसार एक सच्चा भक्त शीत और ऊष्ण सुख और दुःख और मान और अपमान के मॉमलों मे असंग रहता ह। इसका मतलब यह हैकि वह भौतिक और मानसिक स्थितियों मे कभी प्रभावित नहीं होता। उसका मन स्थिर होता है और वह सब घटनाओं को समान भाव सेदेखता है। समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः| शीतोष्णसखदःखेषु समः सङ्गविवर्जितःाजो शत्र मित्र में और मॉन अपमान में सम है तथा सर्दी ग्मी और सख दःखादिद्विंद्वोमेसम है और ऑसक्ति स रहितहै ||i8||| a इस श्लोक में भगवान श्री कष्ण ने ऐसे भक्त का वर्णन किया हैज हर परिस्थितिम समान भाव खखता हावह शत्रु और मित्र HHJR अपमान औरसख और दःखके प्रति समान दृष्टिकोण खखता है। इस श्लोकक अनुसार एक सच्चा भक्त शीत और ऊष्ण सुख और दुःख और मान और अपमान के मॉमलों मे असंग रहता ह। इसका मतलब यह हैकि वह भौतिक और मानसिक स्थितियों मे कभी प्रभावित नहीं होता। उसका मन स्थिर होता है और वह सब घटनाओं को समान भाव सेदेखता है। - ShareChat