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makar sankranti aur padosan ek hasya kavita. #laughterkefatke #📚कविता-कहानी संग्रह #kavita #कविता
laughterkefatke - १५०. मकर संक्रान्ति और पड़ोसन देखो आया मकर संक्रान्ति का त्यौहार संग में लेकर अपने ख़ुशहाली अपार। सभी अपनी छत पर उड़ा रहे थे पतंग चारों ओर छायी थी ख़ुशी और उमंग| काई पो लपेट से आसमाँ था गूँज रहा हर कोई मस्त हो मस्ती में था झूम रहा। मैंने भी सोचा चलो आज पतंग उड़ाएँगे पड़ोसन के साथ नज़रों के पेच लड़ाएँगे | इसी नेक इरादे से आया अपनी छत पर एक हाथ में चरखी दूसरे में पतंग लेकर। बड़ी ही सुहानी और ठंडी ठंडी हवा चल रही थी, अपनी नज़रें पड़ोसन के दरवाजे पर टिकी थी। ठीक तभी मेरी श्रीमती जी छत पर आई तिल के लड्डू और गजक साथ में लाई। लड्डू की ख़ुशबू मेरा मन लुभा रही थी गजक अपनी ओर मुझे बुला रही थी।  ही लड्डू तोड़ने के लिए मैंने दाँत से दबाया  ज्यों लड्डू तो टूटा नहीं मेरा दाँत ही टूट गया भाया। दर्द के मारे मैं तो कराह रहा था, गुस्से से बीवी को निहार रहा था। हाय रे मेरी फूटी किस्मत पडोसन छत पर आयी, प्यारी सी स्माइल से वो मुझे देख रही थी भाई।  मैं चाह कर भी स्माइल नहीं कर सकता था टूटे हुए दाँत से कैसे मुस्कुरा सकता था? मेरे प्यारे अरमानों पर जैसे पानी फिर गया मकर संक्रान्ति की मस्ती में खलल पड़ गया। इस तरह मेरी मकर संक्रान्ति फिकी रह गई मेरी पडोसन मुझसे पटते- पटते रह सुमित मानधना 'गौरव सूरत (गुजरात) १५०. मकर संक्रान्ति और पड़ोसन देखो आया मकर संक्रान्ति का त्यौहार संग में लेकर अपने ख़ुशहाली अपार। सभी अपनी छत पर उड़ा रहे थे पतंग चारों ओर छायी थी ख़ुशी और उमंग| काई पो लपेट से आसमाँ था गूँज रहा हर कोई मस्त हो मस्ती में था झूम रहा। मैंने भी सोचा चलो आज पतंग उड़ाएँगे पड़ोसन के साथ नज़रों के पेच लड़ाएँगे | इसी नेक इरादे से आया अपनी छत पर एक हाथ में चरखी दूसरे में पतंग लेकर। बड़ी ही सुहानी और ठंडी ठंडी हवा चल रही थी, अपनी नज़रें पड़ोसन के दरवाजे पर टिकी थी। ठीक तभी मेरी श्रीमती जी छत पर आई तिल के लड्डू और गजक साथ में लाई। लड्डू की ख़ुशबू मेरा मन लुभा रही थी गजक अपनी ओर मुझे बुला रही थी।  ही लड्डू तोड़ने के लिए मैंने दाँत से दबाया  ज्यों लड्डू तो टूटा नहीं मेरा दाँत ही टूट गया भाया। दर्द के मारे मैं तो कराह रहा था, गुस्से से बीवी को निहार रहा था। हाय रे मेरी फूटी किस्मत पडोसन छत पर आयी, प्यारी सी स्माइल से वो मुझे देख रही थी भाई।  मैं चाह कर भी स्माइल नहीं कर सकता था टूटे हुए दाँत से कैसे मुस्कुरा सकता था? मेरे प्यारे अरमानों पर जैसे पानी फिर गया मकर संक्रान्ति की मस्ती में खलल पड़ गया। इस तरह मेरी मकर संक्रान्ति फिकी रह गई मेरी पडोसन मुझसे पटते- पटते रह सुमित मानधना 'गौरव सूरत (गुजरात) - ShareChat