दिसंबर विदा की दहलीज़ पर है,
जनवरी अभी पगध्वनि-सा उभर रहा है।
दिसंबर के झोले में मैंने चुपके से
रख दी है एक डायरी,
ताकि जाते-जाते वह स्मृतियों को शब्द दे सके।
रास्ते के लिए मठरी, ठेकुआ गुड़-चना और
सत्तू रख दिया है,
भूख लगे तो मुझे याद करते हुए खा लेगा।
तीन सौ पैंसठ दिनों का यह रिश्ता कैलेंडर का नहीं, आदतों और अपनापे का रहा है।
जनवरी के नाम दही-चीनी लिख ली है सूची में
और मन ने एक गुलथुले बच्चे की तरह
उसे बाहों में भर लेने की तैयारी कर ली है।
किसी संकल्प की भारी घोषणा नहीं है
बस जो भीतर बिखरा है, जो बाहर अधूरा है,
उसी को धीरे-धीरे तराशते जाना है।
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