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#रामायण ज्ञान #रामायण का ज्ञान
रामायण ज्ञान - दुर्दशा क्या 8? युद्ध भूमि में राम रावण को भक्त और ज्ञानी का अर्थ बताते हुए कह रहे हैं कि भक्त और ज्ञानी में यही अंतर है कि भक्त अनपढ़ हो मूर्ख हो परंतु हृदय का सच्चा हो और मन का सरल, और जिसके हृदय में अधर्म और कपट होता है उसकी जैसी होती है। जिसे स्वर्ण लंका क़े राज 35R अवस्था सिंहासन पर बैठकर भी जीवन की का कांटा चुभ अपूर्णता  ह्रदय में केवल अशांति चिंता और रहा है, इस समय 35R एक तड़प रह गईं हैं और कुछ नही। तेरे जैसे हर एक दुराचारी को एक समय इस बात का आभास हो जाता है और तब वह एक घायल सांप की भांति अपनी सुरक्षा के लिए बिल ढूंढता रहता है। वही अवस्था इस समय तुम्हारी है। तुम्हारा अंत आ नाम दुर्दशा हैं। चुका है रावण, और इसी अवस्था का दुर्दशा क्या 8? युद्ध भूमि में राम रावण को भक्त और ज्ञानी का अर्थ बताते हुए कह रहे हैं कि भक्त और ज्ञानी में यही अंतर है कि भक्त अनपढ़ हो मूर्ख हो परंतु हृदय का सच्चा हो और मन का सरल, और जिसके हृदय में अधर्म और कपट होता है उसकी जैसी होती है। जिसे स्वर्ण लंका क़े राज 35R अवस्था सिंहासन पर बैठकर भी जीवन की का कांटा चुभ अपूर्णता  ह्रदय में केवल अशांति चिंता और रहा है, इस समय 35R एक तड़प रह गईं हैं और कुछ नही। तेरे जैसे हर एक दुराचारी को एक समय इस बात का आभास हो जाता है और तब वह एक घायल सांप की भांति अपनी सुरक्षा के लिए बिल ढूंढता रहता है। वही अवस्था इस समय तुम्हारी है। तुम्हारा अंत आ नाम दुर्दशा हैं। चुका है रावण, और इसी अवस्था का - ShareChat