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जहाँ ठहराव है वहीं आप हो जीवन में ठहराव नहीं है,इसीलिये लोग भटक रहे हैँ, जीवन में ठहराव आयेगा मात्र अनहद श्रवण से , ये अनहद श्रवण है क्या चीज तो उसका अर्थ है जो ध्वनि स्वतः सफुरित होती है। 🖋️प्रमोद कुमार सिन्हा इंडिया न्यूज़ डेस्क, (जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन कार्यालय न्यूज़ डेस्क 11 मार्च, 2026)। आज क़े भाग - दौर की जिंदगी में सभी दौर लगा रहे हैँ कोई राजनीती में दौर लगा रहा है तो कोई छल नीति में कोई षड्यंन्त्र में तो कोई धन में यानी किसी ना किसी रूप में सभी दौड़ में मशगुल हैँ। कोई किसी मंत्र का जाप करबा रहा है तो कोई तंत्र में फंसा रहा है किसी को सेक्स का भूख है तो कोई नपुंसकता पर अपने आप को औऱ भगवान पर ठीकरा फोर रहा है कहने का गर्ज है आज लोग किसी ना किसी दौर में दांव लगा रहे हैँ क्या यही जिंदगी है ? जीवन में ठहराव नहीं है इसीलिये लोग भटक रहे हैँ जीवन में ठहराव आयेगा मात्र अनहद श्रवण से , ये अनहद श्रवण है क्या चीज तो उसका अर्थ है जो ध्वनि स्वतः सफुरित होती है यहाँ जितने भी ध्वनि हैँ वो दो चीज क़े टकराव से हो रहा है मैं बोलता हूँ तो मेरी जिहवा वोकल कॉर्ड से टकराती है तब मैं बोल पाता हूँ ताली बजाता हूँ तो दो हथेलियों का टकराव होता है किसी तंत्र - मन्त्र - जाप - पुजा - पाठ सभी टकराहटों का ही परिणाम है नतीजा ये है मेरा मन बेचैन है इसका मुख्य कारण है हमारी दौड़ चाहे जिस माध्यम से हो इसलिये ओशो का कथन है यदि स्वं को जानना चाहते हो तो सब कुछ छोड़ दो यानी भगवान को जानना चाहते हो तो स्थिर स्वं में हो जाओ भगवान कोई औऱ नहीं वह तुम ही हो पहले अपने आप को जान लो तो सब कुछ जान लोगो अपने आप को जानने क़े लिये तुम्हें कुछ नहीं करना है " sitting cilently and doing nothing " यानी चुप चाप बैठ जाना है जहाँ कोई शोर ना हो मन का भटकाव नहीं हो यह स्वाभाबिक है मन दौड़ लगायेगा मेरे परम पुज्य सृष्टि सृजनहार बाबाजी विजय वत्स कहते हैँ मन दौड़ लगा रहा है उसे दौड़ने दो रोको मत रोकोगे तो मुश्किल होगा उसे बादलों की भाँति देखते रहो देखते देखते वह स्वतः बन्द हो जायेगा लेकिन यह होगा तभी जब तुम्हें अनहद की धुन सुनाई पढ़ने लगेगी ज़ब तक यह अनहद सुनाई नहीं पड़ेगा मन स्थिर नहीं होगा कबीर साहब का वचन है " तन थिर मन थिर सूरत निरत थिर होत है " तन स्थिर होने पर मन भी स्थिर होने लगता है औऱ ये अनहद अंकुश का काम करता है जिससे बड़ा भारी जानवर गज़ यानी हाथी भी बश में हो जाता है मन बड़ा चंचल है कबीर साहब का बचन " मन लोभी मन लालची मन चंचल मन चित्त चोर, मन क़े मते ना चालिये पलक पलक मन मांगे मोर " जो इस चंचल मन को समझ लिया समझो उसने अपने आप को जीत लिया सारा खेला तो ये मन का ही है कोई शिव शिव कह रहा है कोई राम राम सब तो मन क़े फेरे में ही हैँ किसी को हनुमान मिल रहे हैँ तो किसी को महवतार बाबा सब मन को बहलाने का ग़ालिब ख्याल अच्छा है इसलिये यदि धन या कामना है टूसमें लगे रहिये पूर्ति होगी ही यदि स्वं को पाना है तो इससे परे होना होगा श्री कृष्ण गीता में स्पष्ट रूप से कहे हैँ देने बाला तो केवल मैं ही हूँ लेकिन लेनेबाला अपने अपने भाव क़े अनुसार जो पूजता है मैं उसे उसी रूप में देता हूँ ज़ब देने बाला एक ही वही परम पिता परमात्मा है तो भिन्न भिन्न से मांगना व्यर्थ है। 👆उपरोक्त आलेख प्रकाशन हेतु प्रमोद कुमार सिन्हा, केंद्रीय ब्यूरो चीफ, जनक्रांति हिन्दी न्यूज़ बुलेटिन द्वारा प्रेषित व समस्तीपुर जनक्रांति प्रधान कार्यालय से प्रकाशक /सम्पादज राजेश कुमार वर्मा द्वारा प्रकाशित व प्रसारित। #moj_content
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