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मैं भी अना-पसंद हूँ लेकिन करूँ तो क्या दिल मानता नहीं उसे सज्दा किए बग़ैर मंसूब किससे होती फिर आख़िर मता-ए-दिल मैं तुमको छोड़ देता जो अपना किए बग़ैर #faizankhangani
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