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#❤️जीवन की सीख
❤️जीवन की सीख - मन-्मन्दिर की यात्रा ने संत से पूछा, 'क्या आप जानते हैं कि भगवान कहां मिलेंगे? एक युवक संत ने गंभीर होकर कहा, 'तुम अगर यही मान बैठे हो कि पूजा स्थलों व तीर्थस्थलों में ही मिलेंगे तो यह भ्रम है, परमात्मा मिलेंगे तो हमारे अंदर ही क्योंकि जहां है, वहीं तो मिलेंगे। लेकिन हम बाहरी यात्रा ही करते है, उसे पाने के लिए। अंदर हमने कभी झांका ही नहीं , जिस क्षण हम अंदर की यात्रा आरम्भ करेंगे , यानी हम शांत मन से साक्षी भाव को, दृष्टा भाव को शामिल करेंगे , तब हमें कि पूजा 7 हमें उसकी अनुभूति होने लगेगी। इसका अर्थ यह नहीं है " स्थलों पर न जायें, जायें पर ये न न समझें कि बस हो गयी उसकी प्रार्थना, अब और कुछ की आवश्यकता नहीं है। पूजा स्थलों पर जाने का बस इतना ही महत्व है कि हमारा मन शांत हो जाये। इससे हमारा अहंकार खत्म होगा। यह भावना कि मैं बहुत य बड़ा धार्मिक हूं॰ पूजा पाठी हूं कि मैंने बहुत नहीं आनी चाहिए  बड़ा तीर्थ कर लिया है। मन और अधिक अशांत होगा। बस तीर्थ इससे का लाभ मन को शांत करने में ही करना है। जब मन शांत हो जायेगा , तभी अंदर की यात्रा आरम्भ हो सकती है और तभी उस परम की अनुभूति होगी। 35 सीखः बाहरी तीर्थयात्राओं का उद्देश्य केवल मन को शांत करना और अहंकार को मिटाना है। सच्ची दिव्यता और परम की अनुभूति केवल 35 अंदर की यात्रा से, शांत मन और साक्षी भाव से ही संभव है। हमारे पेज से जुड़ने के लिए फॉलो करना न भूले मन-्मन्दिर की यात्रा ने संत से पूछा, 'क्या आप जानते हैं कि भगवान कहां मिलेंगे? एक युवक संत ने गंभीर होकर कहा, 'तुम अगर यही मान बैठे हो कि पूजा स्थलों व तीर्थस्थलों में ही मिलेंगे तो यह भ्रम है, परमात्मा मिलेंगे तो हमारे अंदर ही क्योंकि जहां है, वहीं तो मिलेंगे। लेकिन हम बाहरी यात्रा ही करते है, उसे पाने के लिए। अंदर हमने कभी झांका ही नहीं , जिस क्षण हम अंदर की यात्रा आरम्भ करेंगे , यानी हम शांत मन से साक्षी भाव को, दृष्टा भाव को शामिल करेंगे , तब हमें कि पूजा 7 हमें उसकी अनुभूति होने लगेगी। इसका अर्थ यह नहीं है " स्थलों पर न जायें, जायें पर ये न न समझें कि बस हो गयी उसकी प्रार्थना, अब और कुछ की आवश्यकता नहीं है। पूजा स्थलों पर जाने का बस इतना ही महत्व है कि हमारा मन शांत हो जाये। इससे हमारा अहंकार खत्म होगा। यह भावना कि मैं बहुत य बड़ा धार्मिक हूं॰ पूजा पाठी हूं कि मैंने बहुत नहीं आनी चाहिए  बड़ा तीर्थ कर लिया है। मन और अधिक अशांत होगा। बस तीर्थ इससे का लाभ मन को शांत करने में ही करना है। जब मन शांत हो जायेगा , तभी अंदर की यात्रा आरम्भ हो सकती है और तभी उस परम की अनुभूति होगी। 35 सीखः बाहरी तीर्थयात्राओं का उद्देश्य केवल मन को शांत करना और अहंकार को मिटाना है। सच्ची दिव्यता और परम की अनुभूति केवल 35 अंदर की यात्रा से, शांत मन और साक्षी भाव से ही संभव है। हमारे पेज से जुड़ने के लिए फॉलो करना न भूले - ShareChat