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. सृष्टि रचना
सृष्टि रचना से पहले सिर्फ एक सनातन परमात्मा था जो अपने अनामीलोक में अकेला रहता था। उस परमात्मा का वास्तविक नाम कविर्देव अर्थात कबीर परमेश्वर हैं। वेदों में उन्हें कविर्देव और क़ुरान में कबीरन नाम से पुकारा गया है। पूर्ण परमात्मा देखने में मनुष्य के समान है पर उनका शरीर दीप्तिमान है। उनके एक एक रोम कूप का प्रकाश संख सूर्यों कि रोशनी से भी अधिक है।
उस प्रभु ने मनुष्य को अपने ही स्वरुप में बनाया है, इसलिए मानव का नाम भी पुरुष ही पड़ा है। पुरुष का सही अर्थ परमात्मा होता है। उसी परम पुरुष के शरीर में सभी आत्माएं समायी हुई थी। पूर्ण परमात्मा कविर्देव अथार्त कबीर परमेश्वर ने नीचे के तीन और लोकों अगम लोक, अलख लोक, सतलोक की रचना शब्द वचन से की। यही पूर्णब्रह्म परमात्मा कविर्देव कबीर परमेश्वर ही अगम लोक में प्रकट हुआ तथा कविर्देव अगम लोक का भी स्वामी है तथा वहाँ इनका उपमात्मक पदवी का नाम अगम पुरुष अर्थात् अगम प्रभु है।
इसी अगम प्रभु का मानव सदृश शरीर बहुत तेजोमय है जिसके एक रोम कूप की रोशनी खरब सूर्य की रोशनी से भी अधिक है। यह पूर्ण परमात्मा कविर्देव अथार्त कबिर देव अथार्त कबीर परमेश्वर अलख लोक में प्रकट हुआ तथा स्वयं ही अलख लोक का भी स्वामी है तथा उपमात्मक नाम अलख पुरुष भी इसी परमेश्वर का है तथा इस पूर्ण प्रभु का मानव सदृश शरीर तेजोमय स्वयं प्रकाशित है। एक रोम कूप की रोशनी अरब सूर्यों के प्रकाश से भी ज्यादा है।
यही पूर्ण प्रभु सतलोक में प्रकट हुआ तथा सतलोक का भी अधिपति यही है। इसलिए इसी का उपमात्मक नाम सतपुरुष है। इसी का नाम अकालमूर्ति - शब्द स्वरूपी राम - पूर्ण ब्रह्म - परम अक्षर ब्रह्म आदि हैं। इसी सतपुरुष कविर्देव अथार्त कबीर प्रभु का मानव सदृश शरीर तेजोमय है। जिसके एक रोमकूप का प्रकाश करोड़ सूर्यों तथा इतने ही चन्द्रमाओं के प्रकाश से भी अधिक है। सतलोक में अन्य रचना - इस कविर्देव अथार्त कबीर प्रभु ने सतपुरुष रूप में प्रकट होकर सतलोक में विराजमान होकर प्रथम सतलोक में अन्य रचना की।
एक शब्द वचन से सोलह द्वीपों की रचना की। फिर सोलह शब्दों से सोलह पुत्रों की उत्पत्ति की। एक मानसरोवर की रचना की जिसमें अमृत भरा। सोलह पुत्रों के नाम हैं:-(1) ‘‘कूर्म’’, (2)‘‘ज्ञानी’’, (3) ‘‘विवेक’’, (4) ‘‘तेज’’, (5) ‘‘सहज’’, (6) ‘‘सन्तोष’’, (7)‘‘सुरति’’, (8) ‘‘आनन्द’’, (9) ‘‘क्षमा’’, (10) ‘‘निष्काम’’, (11) ‘जलरंगी‘ (12)‘‘अचिन्त’’, (13) ‘‘पे्रम’’, (14) ‘‘दयाल’’, (15) ‘‘धैर्य’’ (16) ‘‘योग संतायन’’ अर्थात् ‘‘योगजीत‘‘ है।
सतपुरुष कविर्देव ने अपने पुत्र अचिन्त को सत्यलोक की अन्य रचना का भार सौंपा तथा शक्ति प्रदान की। अचिन्त ने अक्षर पुरुष अथार्त परब्रह्म की शब्द से उत्पत्ति की तथा कहा कि मेरी मदद करना। अक्षर पुरुष स्नान करने मानसरोवर पर गया, वहाँ आनन्द आया तथा सो गया। लम्बे समय तक बाहर नहीं आया। तब अचिन्त की प्रार्थना पर अक्षर पुरुष को नींद से जगाने के लिए कविर्देव अथार्त कबीर परमेश्वर ने उसी मानसरोवर से कुछ अमृत जल लेकर एक अण्डा बनाया तथा उस अण्डे में एक आत्मा प्रवेश की तथा अण्डे को मानसरोवर के अमृत जल में छोड़ा। अण्डे की गड़गड़ाहट से अक्षर पुरुष की निंद्रा भंग हुई।
उसने अण्डे को क्रोध से देखा जिस कारण से अण्डे के दो भाग हो गए। उसमें से ज्योति निंरजन अथार्त क्षर पुरुष निकला जो आगे चलकर ‘काल‘ कहलाया। इसका वास्तविक नाम ‘‘कैल‘‘ है। तब सतपुरुष अथार्त कविर्देव ने आकाशवाणी की कि आप दोनों बाहर आओ तथा अचिंत के द्वीप में रहो। आज्ञा पाकर अक्षर पुरुष तथा क्षर पुरुष कैल दोनों अचिंत के द्वीप में रहने लगे। बच्चों की नालायकी उन्हीं को दिखाई कि कहीं फिर प्रभुता की तड़फ न बन जाए, क्योंकि समर्थ बिन कार्य सफल नहीं होता।
फिर पूर्ण धनी कविर्देव ने सर्व रचना स्वयं की। अपनी शब्द शक्ति से एक राजेश्वरी राष्ट्री शक्ति उत्पन्न की, जिससे सर्व ब्रह्मण्डों को स्थापित किया। इसी को पराशक्ति परानन्दनी भी कहते हैं। पूर्ण ब्रह्म ने सर्व आत्माओं को अपने ही अन्दर से अपनी वचन शक्ति से अपने मानव शरीर सदृश उत्पन्न किया। प्रत्येक हंस आत्मा का परमात्मा जैसा ही शरीर रचा जिसका तेज सोलह सूर्यों जैसा मानव सदृश ही है। परन्तु परमेश्वर के शरीर के एक रोम कूप का प्रकाश करोड़ों सूर्यों से भी ज्यादा है।
बहुत समय उपरान्त क्षर पुरुष अथार्त ज्योति निरंजन ने सोचा कि हम तीनों अचिन्त, अक्षर पुरुष, क्षर पुरुष एक द्वीप में रह रहे हैं तथा अन्य एक-एक द्वीप में रह रहे हैं। मैं भी साधना करके अलग द्वीप प्राप्त करूँगा। उसने ऐसा विचार करके एक पैर पर खड़ा होकर सत्तर युग तक तप किया।
कबीर साहेब से ये भी प्रमाण मिलता है क़ि अपने कार्य में गफलत करने के कारण और क्षर पुरुष को क्रोध से देखने का अपराध करने के कारण अक्षर पुरुष अथार्त परब्रह्म को भी सतलोक से निकल दिया गया। दूसरा कारण अक्षर पुरुष अथार्त परब्रह्म अपने साथी ब्रह्म अथार्त क्षर पुरुष की विदाई में व्याकुल होकर परमपिता कविर्देव अथार्त कबीर परमेश्वर की याद भूलकर उसी को याद करने लगा। क्षर पुरुष क़ि याद और अलग राज्य क़ि चाह के कारण उसे भी सतलोक से निष्कासित करना पड़ा।
इस प्रकार, सृष्टि रचना पूर्ण हुई और परब्रह्म के सात संख ब्रह्माण्ड तथा क्षर ब्रह्म अथार्त ज्योति-निरंजन, अथार्त काल के २१ ब्रह्मांडो की स्थापना हुई और जीवन का प्रारम्भ हुआ। ब्रह्माण्ड और सृष्टि की संरचना की सम्पूर्ण और विस्तृत जानकारी पूर्ण परमात्मा कबीर साहिब जी ने अपनी पवित्र अमृतवाणी में स्वयं भी बताई है और सर्व धर्म ग्रंथों में इसके प्रमाण हैं जिन्हे जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने खोल कर दिखाया है जिससे सोये हुए मानव समाज को नई दिशा प्राप्त हुई है। आप स्वयं भी इन प्रमाणों को अपने धार्मिक ग्रंथों जैसे पवित्र वेद, पुराण, पवित्र गीता जी, पवित्र बाइबल, पवित्र श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, पवित्र क़ुरान शरीफ, पवित्र कबीर सागर, सूक्षमवेद, भविष्यपुराण आदि से मिला कर जांच सकते हैं।
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