@ SHAYARANA
ISHQ
आसमां से फिर गिरेगी प्यार की सौग़ात क्या।
पूछती है फिर ये धड़कन , होगी तुमसे बात क्या।
तेरे रुखसारों पे ठहरी ओस की ये बूंद जो,
चूम लूँ महताब समझूँ, या कहूँ जज्बात क्या।
बंद कमरे में जो गूँजी थी कभी तेरी हँसी,
गु़फ्तगू अब भी वही है, रूह के भी साथ क्या।
काँपते हाथों ने जब थामी थी तेरी उँगलियाँ,
वक़्त वो ठहरा हुआ फिर दोगी अपना हाथ क्या।
रास्ते भी भीग कर अब आइना से हो गए,
देख लें इनमें ज़रा हम अपनी ही औकात क्या।
तुम ज़रा सी बेरुखी से फेर लेते हो नज़र,
इतनी छोटी बात पर छूटेगा अपना साथ क्या।
वो जो कागज़ की बनाई कश्तियाँ थीं धूप में,
ढूँढने निकलें उन्हें हम, होनी है बरसात क्या।
रेत पर जो नाम लिख कर हमने छोड़ा था कभी,
लहरें अब भी पूछती हैं, है वही हालात क्या।
एक मुद्दत से थकी है ख़्वाहिशों की ये डगर,
उम्र भर चलना पड़ेगा दर्द के ही साथ क्या।
मिन्नतें कब तक करेंगी ये अधूरी हसरतें,
मुंतज़िर आँखों को दोगी ख़्वाब की सौग़ात क्या।
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