ShareChat
click to see wallet page
search
#❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #🚗🧗🏻भारत भ्रमण व सफर प्रेमी🚂⛰ #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️Love You ज़िंदगी ❤️ - यह अरावली को अपना समझने का वक्त है से ज्ञात हैकि समस्त जीवन प्रकृति पर अपने यहा यह बात युगांतरों  ही निर्भर है। देश की जोभी श्रेष्ठ परंपराएं हैवे नदियों सरोवरों  पहाड़ों और वरनों के सान्निध्य से ही उपजी हॅ। जीवनदायी हर तत्व रहा है॰पूजा को थाली में रखी दूर्वाःसे लेकर नवग्रहों यहा পূতনীয तक| यही भारत की आत्मा का सार है। इसो कारण हमारे ऋषि और समाजचिंतक निजी तथा सार्वजनिक जीवन र्में प्रकृति से सामंजस्य का चिंतन करते आए है। हमारी परंपराएं रीति रिवाज संस्कार  दर्शन और सामाजिक ढांचा प्रकृति की से जुड़ा रहा है। पंचतत्व इसी दर्शन FaF लय की परिणति हे। दिनचर्या ऋतुचर्या  भवन निर्माण और कृषि पद्धतियां सभी  प्रकृति को समझ पर आधारित रहीं। गांव  आर नगर डस तरह बसाए गए किःजल वायु और भूमि का संतुलन बना रहे। का स्वामी नहों সক্কূনি  हमन स्वयक उसका अभिन्न अंग माना है। खुलाआकाश लंबे समय तक भारत की अर्थव्यवस्था कुटीर उद्योगों और स्थानीय संसाधनों पर आज अरावली टिकी रही। उद्योग ऐसे विकसित हुएकि अवध खनन ओर रोजगार शी मिले और प्रकृति पर बोझभी क्रशर मशीनों से न पडे। लेकिन तथाकथित विकास को छलनी हो रही है। होते हायह संतुलन எள अवधारणा जिन पत्थरों से চসা মান বথলা ম্া लगा 27 आज हमने अपने शहर गई हे। उपभोगवादी दृष्टि प्रकृति को सजाए  वही अब केवल उपयोग की वस्तु मानने लगी है। চমাহী মাসা ম नदी॰ पहाड़ जंगल पशुन्पक्षी सव काम धूल बनकर भर रहे के हैया नही की कसोटी परकसे जा है। अरावली पूछ रहे है। रही है-मेरा अपराध इसी अंधे विकास की मार अरावलो क्या ह? पर्वतमाला पर पड़ी है।काका साहव कालेलकर ने इसे ' पहाड़ों का पितामह  कहा था। यह प्राचीन पारियात्र पर्वत ही आज का अरावली है॰जो लाखों वर्षो के क्षरण से अब अवशेष मात्र रह गया है। आबू पर्वत से तक फैलो यह शृंखला ऊंचाई में भले छोटी  লব্ধ িলৌ ক্রী 'তি अरावली वनस्पति और वन्यजीवों को  हो, पर महत्व मॅ विशाल ह आश्रय देती है तथा अनेक नदियों चर्मण्वती, बनास केन बेतवा लूनी, साबरमती, मही-की जन्मस्थली है। यही पर्वत पश्चिम से आने वाली धूल को रोकने की ढाल है और दिल्ली एनसीआर को सांसों का वेंटिलेटर भी। आज अरावली अवैध खनन और क्रशर मशीनों से छलनी हो रही है। जिन पत्थरों से हमने अपने शहर सजाए, बही भर रहे हैं। अरावली पूछ रही है॰ अब हमारी सांसों में धूल बनकर मेरा अपराध क्या है? विकास के नाम पर मेरे अस्तित्व को क्यो जा रहा है? काका कालेलकर और अनुपम मिश्र जैसे  TCTTT था कि देश केवल जमीन और आकाश नहीं  चेताया  चिंतकों ने हमें है।सच्ची भी हमारे स्वजन बल्कि पहाड़ , नदियां, जंगल पशु-्पक्षो प्रकृति- प्रेम भी शामिल है। यदि हम  হমনিল স সানন-সপ কর মাথ यह भूल गए॰ तो प्रकृति अपना कर्ज वसूल लेगी  ओतव हमार प्ास पछतावे के सिवाय " कुछ नर्ही बचेगा। यह अरावली को अपना समझने का वक्त है से ज्ञात हैकि समस्त जीवन प्रकृति पर अपने यहा यह बात युगांतरों  ही निर्भर है। देश की जोभी श्रेष्ठ परंपराएं हैवे नदियों सरोवरों  पहाड़ों और वरनों के सान्निध्य से ही उपजी हॅ। जीवनदायी हर तत्व रहा है॰पूजा को थाली में रखी दूर्वाःसे लेकर नवग्रहों यहा পূতনীয तक| यही भारत की आत्मा का सार है। इसो कारण हमारे ऋषि और समाजचिंतक निजी तथा सार्वजनिक जीवन र्में प्रकृति से सामंजस्य का चिंतन करते आए है। हमारी परंपराएं रीति रिवाज संस्कार  दर्शन और सामाजिक ढांचा प्रकृति की से जुड़ा रहा है। पंचतत्व इसी दर्शन FaF लय की परिणति हे। दिनचर्या ऋतुचर्या  भवन निर्माण और कृषि पद्धतियां सभी  प्रकृति को समझ पर आधारित रहीं। गांव  आर नगर डस तरह बसाए गए किःजल वायु और भूमि का संतुलन बना रहे। का स्वामी नहों সক্কূনি  हमन स्वयक उसका अभिन्न अंग माना है। खुलाआकाश लंबे समय तक भारत की अर्थव्यवस्था कुटीर उद्योगों और स्थानीय संसाधनों पर आज अरावली टिकी रही। उद्योग ऐसे विकसित हुएकि अवध खनन ओर रोजगार शी मिले और प्रकृति पर बोझभी क्रशर मशीनों से न पडे। लेकिन तथाकथित विकास को छलनी हो रही है। होते हायह संतुलन எள अवधारणा जिन पत्थरों से চসা মান বথলা ম্া लगा 27 आज हमने अपने शहर गई हे। उपभोगवादी दृष्टि प्रकृति को सजाए  वही अब केवल उपयोग की वस्तु मानने लगी है। চমাহী মাসা ম नदी॰ पहाड़ जंगल पशुन्पक्षी सव काम धूल बनकर भर रहे के हैया नही की कसोटी परकसे जा है। अरावली पूछ रहे है। रही है-मेरा अपराध इसी अंधे विकास की मार अरावलो क्या ह? पर्वतमाला पर पड़ी है।काका साहव कालेलकर ने इसे ' पहाड़ों का पितामह  कहा था। यह प्राचीन पारियात्र पर्वत ही आज का अरावली है॰जो लाखों वर्षो के क्षरण से अब अवशेष मात्र रह गया है। आबू पर्वत से तक फैलो यह शृंखला ऊंचाई में भले छोटी  লব্ধ িলৌ ক্রী 'তি अरावली वनस्पति और वन्यजीवों को  हो, पर महत्व मॅ विशाल ह आश्रय देती है तथा अनेक नदियों चर्मण्वती, बनास केन बेतवा लूनी, साबरमती, मही-की जन्मस्थली है। यही पर्वत पश्चिम से आने वाली धूल को रोकने की ढाल है और दिल्ली एनसीआर को सांसों का वेंटिलेटर भी। आज अरावली अवैध खनन और क्रशर मशीनों से छलनी हो रही है। जिन पत्थरों से हमने अपने शहर सजाए, बही भर रहे हैं। अरावली पूछ रही है॰ अब हमारी सांसों में धूल बनकर मेरा अपराध क्या है? विकास के नाम पर मेरे अस्तित्व को क्यो जा रहा है? काका कालेलकर और अनुपम मिश्र जैसे  TCTTT था कि देश केवल जमीन और आकाश नहीं  चेताया  चिंतकों ने हमें है।सच्ची भी हमारे स्वजन बल्कि पहाड़ , नदियां, जंगल पशु-्पक्षो प्रकृति- प्रेम भी शामिल है। यदि हम  হমনিল স সানন-সপ কর মাথ यह भूल गए॰ तो प्रकृति अपना कर्ज वसूल लेगी  ओतव हमार प्ास पछतावे के सिवाय " कुछ नर्ही बचेगा। - ShareChat