बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर भारत को बुद्ध-धम्म के मूल्यों पर आधारित राष्ट्र बनाकर गए।
उन्होंने बुद्ध-धम्म को किसी एक समुदाय या पंथ तक सीमित नहीं किया, बल्कि हर भारतीय के जीवन-मूल्य के रूप में संविधान में ढाल दिया।
बाबासाहेब जानते थे कि सत्ता बदलती है, सरकारें आती-जाती हैं,
लेकिन यदि समाज बुद्धि, विवेक और करुणा से खाली हो गया,
तो लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा।
इसीलिए उन्होंने संविधान ऐसा बनाया कि
यदि कोई भी ताक़त इसे नष्ट करने, मोड़ने या बिगाड़ने की कोशिश करे,
तो देश का बुद्धिजीवी, जागरूक और संवैधानिक नागरिक वर्ग
तर्क, कानून और मानवता के आधार पर उसका विरोध कर सके।
आज जो तथाकथित ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की कोशिशें हो रही हैं,
वे इसी बात का प्रमाण हैं कि बाबासाहेब की दूरदृष्टि कितनी गहरी और ऐतिहासिक थी।
उन्होंने पहले ही देख लिया था कि
धर्म के नाम पर राजनीति,
और आस्था के नाम पर असमानता
देश को फिर उसी अंधकार की ओर ले जा सकती है
जहाँ मनुष्य-मनुष्य का शत्रु बना दिया जाता है।
भारतीय संविधान किसी एक धर्म, ग्रंथ या विचारधारा का दस्तावेज़ नहीं है।
यह किसी पूजा-पद्धति का समर्थन नहीं करता,
बल्कि मानव गरिमा की रक्षा करता है।
यह संविधान बुद्धि, विवेक, करुणा, समानता और न्याय पर आधारित
एक बौद्धिक राष्ट्र की नींव है।
भारतीय संविधान स्वयं में बुद्ध-धम्म का आधुनिक रूप है—
जहाँ
अहिंसा है, ताक़त के बजाय तर्क का सम्मान है;
समता है, जन्म के आधार पर कोई ऊँच-नीच नहीं;
बंधुत्व है, जो समाज को जोड़े रखता है;
और जहाँ मनुष्य को मनुष्य के रूप में सम्मान मिलता है,
न कि उसकी जाति, धर्म या हैसियत के आधार पर।
बाबासाहेब आंबेडकर भारत को केवल एक भू-भाग या सत्ता-संरचना नहीं,
बल्कि सोचने-समझने वाला, प्रश्न करने वाला,
तर्कशील और मानवतावादी राष्ट्र बनाकर चले गए।
एक ऐसा राष्ट्र,
जहाँ डर नहीं—संविधान बोलता है,
जहाँ भीड़ नहीं—विवेक चलता है,
और जहाँ धर्म नहीं—मानवता सर्वोपरि होती है।
यही बाबासाहेब की सबसे बड़ी विरासत है।
यही भारतीय संविधान की आत्मा है।
और यही वह रास्ता है,
जिस पर चलकर भारत सच में महान बन सकता है।
जय संविधान।
जय बाबासाहेब।
जय बुद्ध-धम्म के मानवतावादी मूल्य। ✊
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