📚📕📖 #@@@ श्रीमद्भगवद्गीता के 18वें अध्याय का 62वां श्लोक (BG 18.62) कहता है कि "हे भारत! तू सब प्रकार से (पूर्ण रूप से) उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति (मोक्ष) को तथा सनातन परम धाम (शाश्वत स्थान) को प्राप्त होगा।" यह श्लोक पूर्ण शरणागति और ईश्वर की कृपा से ही परम मोक्ष और शांति मिलने का मार्ग बताता है।
श्लोक (संस्कृत)
"सर्वभावेन भारत तं शरणं व्रज। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।"
अर्थ (भावार्थ)
हे भारत (अर्जुन):
तू सर्वभावेन: सभी प्रकार से, पूरे मन, वचन और कर्म से, पूर्ण रूप से।
तं शरणं व्रज: उस परमेश्वर की शरण में जाओ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं: उस परमात्मा की कृपा से ही परम शांति (मोक्ष)।
स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्: तथा सनातन (सदा रहने वाले) परम धाम (शाश्वत स्थान) को प्राप्त होगे।
तात्पर्य (महत्व)
यह श्लोक गीता के उपदेशों का सार है, जो बताता है कि सभी लौकिक कर्तव्यों और इच्छाओं को त्याग कर, पूरी तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित होने से ही व्यक्ति को परम शांति और शाश्वत मुक्ति (मोक्ष) मिलती है, जहाँ से वह वापस संसार में नहीं लौटता।
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