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#✍🏽 माझ्या लेखणीतून #✍मराठी साहित्य #✒शिक्षा व नौकरी विषयक💼 #📝कविता / शायरी/ चारोळी #📝हृदयस्पर्शी मराठी कविता✍🏻
✍🏽 माझ्या लेखणीतून - (  विदर्भ प्राध्यापक साहित्य संघ २०,मार्च प्रा. अँड. डॉ. सौं. शितल अशोक कंबानी असि. प्रिंसिपल - आशीर्वाद बी॰ एड. काँलेज. M, A, (Mar), B. Ed M. Ed. Ph.D.(R) असि सल्हागार अँडव्होकेट अशोक कंबानीज असिस्टटः M. A. (Soe) M.A. (Mar)m,LL. B.IT सौंदर्य तज्ञ- शितलज ब्यूटी केयर क्लिनिक सेंटर नागपुरः B.A. (Mar Literature), M. A. (His), Diploma in Beauty culture काव्यलेखन नानाजी -नानीजी का घर नाना के घर जाना याने खुशी का कोई ठीकाना ना होता था..! की गाडी चली की लगे नानाजी के घर चली यही दिल बोले..!! बाबूजी ` जैसे नानाजी के घर रैना हैंदों चार दिन के लिए..! वैसे ही बातों की और संस्कारों की लडी लग जाती थी..!! उस संस्कारों की मैं मुरीद थी मेरे नानाजी नानीजी के..! rभी मैं पालन करती हु..!! मेरे नानाजी - नानीजी के संस्कारों का आज वो नानाजी का समय शिखाना और याद कैसे रहेंवो बात बताना.. ! संस्कारों की बाते करना , आदर्शो की बाते करना ..!! नानाजी के घर में अंग्रेजों के जमाने की घडी थी..! उस घडी को हाथ सें चाबी भरनी पडती थी तब चलती रहती थी..!! नानाजी गुजर जाने के बाद नानीजी के साथ...! मेरा आगे का बचपन गया , बचपन के वो पल भी क्या पल थे..!! नानीजी की वो परीयों की कहानीयाँ बताना. . ! कहानी सुनते - सुनते वो शाम का समय यूँ निकल जाया करता था..! मेरा बचपन का समय ज्यादातर नानाजी नानीजी के साथ गया.., उन्हके साथ उन्हकों समझते -समझते बचपन गया..!! ऐसा मेरा बचपन और मेरे नानाजी नानीजी का घर..! यहीं मेरे बचपन की दुनियाँ थी, उन्हकें घर का आँगन मेरा खेल का मैदान था...!! आनंद मैं कैसे भुल सकती हु...! वो बचपन का अतुलनीय वो तो यादे दिल के गहराई में ताजेतवाने बने हुवे सदा चलते हैं. !! ऐसा मेरा नानाजी और नानीजी के साथ का बचपन .. ! खिल के खिलनेवाला था, वो नानाजी की उँगली पकड के चलना बाते सुनते. !!  दुनियाँ थी नानाजी नानीजी की पलकों तलेवाली . ! वोभी क्याँ प्यार सें भरी आँखें मुझ पे लुटाने के लिए बेताब रहती थी..!! ऐसा मेरे नानाजी नानीजी का यादों का झरोखा हैं..! /भी बोलू उन्ह यादों के बारे में तो कम हैं -कम हैं..!! কিননা (  विदर्भ प्राध्यापक साहित्य संघ २०,मार्च प्रा. अँड. डॉ. सौं. शितल अशोक कंबानी असि. प्रिंसिपल - आशीर्वाद बी॰ एड. काँलेज. M, A, (Mar), B. Ed M. Ed. Ph.D.(R) असि सल्हागार अँडव्होकेट अशोक कंबानीज असिस्टटः M. A. (Soe) M.A. (Mar)m,LL. B.IT सौंदर्य तज्ञ- शितलज ब्यूटी केयर क्लिनिक सेंटर नागपुरः B.A. (Mar Literature), M. A. (His), Diploma in Beauty culture काव्यलेखन नानाजी -नानीजी का घर नाना के घर जाना याने खुशी का कोई ठीकाना ना होता था..! की गाडी चली की लगे नानाजी के घर चली यही दिल बोले..!! बाबूजी ` जैसे नानाजी के घर रैना हैंदों चार दिन के लिए..! वैसे ही बातों की और संस्कारों की लडी लग जाती थी..!! उस संस्कारों की मैं मुरीद थी मेरे नानाजी नानीजी के..! rभी मैं पालन करती हु..!! मेरे नानाजी - नानीजी के संस्कारों का आज वो नानाजी का समय शिखाना और याद कैसे रहेंवो बात बताना.. ! संस्कारों की बाते करना , आदर्शो की बाते करना ..!! नानाजी के घर में अंग्रेजों के जमाने की घडी थी..! उस घडी को हाथ सें चाबी भरनी पडती थी तब चलती रहती थी..!! नानाजी गुजर जाने के बाद नानीजी के साथ...! मेरा आगे का बचपन गया , बचपन के वो पल भी क्या पल थे..!! नानीजी की वो परीयों की कहानीयाँ बताना. . ! कहानी सुनते - सुनते वो शाम का समय यूँ निकल जाया करता था..! मेरा बचपन का समय ज्यादातर नानाजी नानीजी के साथ गया.., उन्हके साथ उन्हकों समझते -समझते बचपन गया..!! ऐसा मेरा बचपन और मेरे नानाजी नानीजी का घर..! यहीं मेरे बचपन की दुनियाँ थी, उन्हकें घर का आँगन मेरा खेल का मैदान था...!! आनंद मैं कैसे भुल सकती हु...! वो बचपन का अतुलनीय वो तो यादे दिल के गहराई में ताजेतवाने बने हुवे सदा चलते हैं. !! ऐसा मेरा नानाजी और नानीजी के साथ का बचपन .. ! खिल के खिलनेवाला था, वो नानाजी की उँगली पकड के चलना बाते सुनते. !!  दुनियाँ थी नानाजी नानीजी की पलकों तलेवाली . ! वोभी क्याँ प्यार सें भरी आँखें मुझ पे लुटाने के लिए बेताब रहती थी..!! ऐसा मेरे नानाजी नानीजी का यादों का झरोखा हैं..! /भी बोलू उन्ह यादों के बारे में तो कम हैं -कम हैं..!! কিননা - ShareChat