जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏
☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा १७☀️ पृष्ठ १८☀️
सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा॥
फूलें कमल सोह सर कैसा ।
निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा ॥१॥
जो मछलियाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्रीहरि के शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलों के फूलने से तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है ॥१॥
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा ॥
चक्रबाक मन दुख निसि पेखी ।
जिमि दुर्जन पर संपति देखी ॥२॥
भौरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं, तथा पक्षियों के नाना प्रकार के सुन्दर शब्द हो रहे हैं। रात्रि देख कर चकवे के मन में वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरे की सम्पत्ति देख कर दुष्ट को होता है ॥२॥
चातक रटत तृषाअति ओही।जिमिसुख लहइ न संकरद्रोही॥
सरदातप निसि ससि अपहरई ।
संत दरस जिमि पातक टरई ॥३॥
पपीहा रट लगाये है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्रीशंकरजी का द्रोही सुख नहीं पाता (सुख के लिये झीखता रहता है )। शरद् ऋतु के ताप को रात के समय चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं ॥३॥
देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई॥
मसक दंस बीते हिम त्रासा ।
जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा ॥४॥
चकोरों के समुदाय चन्द्रमा को देख कर इस प्रकार टकटकी लगाये हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान् को पा कर उनके [निर्निमेष नेत्रों से] दर्शन करते हैं। मच्छर और डाँस जाड़े के डर से इस प्रकार नष्ट हो गये जैसे ब्राह्मण के साथ वैर करने से कुल का नाश हो जाता है ॥४॥
दो०- भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।
सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥१७॥
[वर्षा-ऋतु के कारण] पृथ्वी पर जो जीव भर गये थे, वे शरद् ऋतु को पाकर वैसे ही नष्ट हो गये जैसे सद्गुरु के मिल जाने पर सन्देह और भ्रम के समूह नष्ट हो जाते हैं ॥१७॥ #सीताराम भजन


