*🌻🎋🟨 अमरत्व का रहस्य 🟨🎋🌻*
हिमालय की धवल कंदराओं में एक दिन माता पार्वती के मन में एक जिज्ञासा जागी। उन्होंने देवाधिदेव महादेव से सप्रेम आग्रह किया, "हे प्राणनाथ! मुझे वह परम ज्ञान प्रदान कीजिए जो मृत्यु के भय को मिटा दे। मैं उस अमरत्व के रहस्य को जानना चाहती हूँ जिसे आज तक किसी जीव ने नहीं सुना।"
महादेव जानते थे कि यह ज्ञान अत्यंत गोपनीय है। यदि यह किसी अयोग्य के हाथ लग गया, तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ सकता है। ईसलिए, शिव जी माता पार्वती को लेकर एक अत्यंत निर्जन स्थान पर गए। उन्होंने एक ऐसी गुफा चुनी जहाँ वायु के अतिरिक्त किसी का प्रवेश न हो सके। गुफा के द्वार को शिलाओं से बंद कर दिया गया ताकि कोई बाहरी जीव इसे सुन न पाए।
भगवान शिव ने अपनी आँखें मूंद लीं और 'अमरकथा' सुनाना प्रारंभ किया। माता पार्वती बड़े चाव से कथा सुनने लगीं। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ी, शिव जी के शब्दों से दिव्यता झरने लगी। कथा के बीच-बीच में पार्वती जी 'हुंकारी' (जी, हाँ, उम्म्म...) भरती रहीं, जिससे महादेव को आभास होता रहे कि वे सुन रही हैं। किंतु, महादेव की वाणी की मधुरता और शांति ऐसी थी कि देवी पार्वती को धीरे-धीरे तंद्रा (नींद) आने लगी और वे गहरी निद्रा में सो गईं।
उसी गुफा के एक कोने में एक तोते (शुक) का घोंसला था, जिसमें एक अंडा रखा था। कथा के तपोबल और शिव की ओजस्वी वाणी के प्रभाव से उस अंडे से एक नन्हा सा बच्चा फूट निकला। वह नन्हा शुक बड़े ध्यान से शिव के मुख से निकल रहे एक-एक शब्द को आत्मसात करने लगा। जब उसने देखा कि माता पार्वती सो गई हैं और यदि हुंकारी बंद हुई तो महादेव कथा रोक देंगे, तब उस नन्हें जीव ने बड़ी चतुराई दिखाई। वह माता पार्वती की आवाज़ की नकल करते हुए हुंकारी भरने लगा। महादेव अपनी धुन में कथा सुनाते रहे और इधर वह शुक पूर्ण ज्ञानी बन गया।
कथा समाप्त हुई तो महादेव ने देखा कि पार्वती जी तो सो रही हैं। वे चौंक गए—"यदि पार्वती सो रही थीं, तो हुंकारी कौन भर रहा था?" जैसे ही उनकी दृष्टि कोने में बैठे उस तोते पर पड़ी, वे समझ गए कि इस जीव ने चोरी-छिपे अमरत्व का रहस्य जान लिया है। क्रोधित होकर शिव जी ने अपना त्रिशूल उठाया। प्राण बचाने के लिए वह शुक गुफा से बाहर की ओर भागा। वह उड़ते-उड़ते महर्षि वेदव्यास जी के आश्रम पहुँचा। उस समय व्यास जी की पत्नी जम्हाई ले रही थीं। शुक ने सूक्ष्म रूप धारण किया और उनके मुख के मार्ग से उनके गर्भ में प्रवेश कर गया।
जब महादेव वहाँ पहुँचे और देखा कि जीव व्यास जी की शरण में है और माता के गर्भ में प्रविष्ट हो चुका है, तो उन्होंने अहिंसा और मर्यादा का पालन करते हुए अपना क्रोध त्याग दिया और वहाँ से अंतर्ध्यान हो गए। बारह वर्षों का वास और कृष्ण का आश्वासन वह बालक सामान्य नहीं था; उसे गर्भ में ही वेद, पुराण और उपनिषदों का पूर्ण ज्ञान हो चुका था। वह जानता था कि बाहर निकलते ही संसार की 'माया' उसे घेर लेगी। इसी भय से वह बालक १२ वर्षों तक माता के गर्भ से बाहर नहीं आया।
व्यास जी चिंतित थे, माता पीड़ा से व्याकुल थीं। अंततः भगवान श्री कृष्ण स्वयं वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने बालक को आश्वासन दिया—"हे ऋषिकुमार! तुम बाहर आओ, मेरी माया तुम्हें स्पर्श भी नहीं कर पाएगी।" साक्षात नारायण का वचन पाकर बालक ने जन्म लिया। यही बालक आगे चलकर 'शुकदेव' कहलाए। जन्म लेते ही बालक ने माता-पिता को प्रणाम किया और बिना किसी मोह माया के वन की ओर चल दिए। व्यास जी पीछे-पीछे 'पुत्र! पुत्र! पुकारते रहे पर शुकदेव जी के हृदय में केवल वैराग्य था।
पुत्र को वापस लाने के लिए व्यास जी ने एक युक्ति निकाली। उन्होंने श्री कृष्ण की लीला का एक अत्यंत सुंदर श्लोक बनाया और अपने शिष्यों को सिखा दिया। जब शुकदेव जी ने वन में वह आधा श्लोक सुना, तो वे कृष्ण की बाल-लीलाओं के प्रति इतने आकर्षित हुए कि खिंचे चले आए। तब व्यास जी ने उन्हें श्रीमद्भागवत पुराण के १८,००० श्लोकों का दिव्य ज्ञान दिया। इसी ज्ञान को आगे चलकर शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सुनाया, जिससे परीक्षित ने मृत्यु के भय को जीत लिया और मोक्ष प्राप्त किया।
*🌼🏵️🔲 ॐ शांति 🔲🏵️🌼* #❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #🌺राधा कृष्ण💞 #🌸 जय श्री कृष्ण😇

