तृष्णा - दुख का मुल
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जातिपि दुक्खा , जरापि दुक्खा , व्याधिपि दुक्खो , मरणम्पि दुक्खं , अप्पियेहि सम्पयोगो दुक्खो , पियेहि विप्पयोगो दुक्खो , यम्पिच्छं न लभति तम्पि दुक्खं-सङ्खित्तेन पञ्चुपादानक्खन्धा दुक्खा ।
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जन्म भी दु:ख हे , बुढ़ापा भी दु:ख है , रोग भी दु:ख है , मरण भी दु:ख है । अप्रिय (व्यक्तियों , वस्तुओं , स्थितियों) का संयोग दु:ख है , प्रिय ((व्यक्तियों , वस्तुओं , स्थितियों) का वियोग दु:ख है , मनचाहे खान पान भी दु:ख है ; संक्षेप में कहे तो उपादान (याने , आसक्ति) पर आधारित पंच-स्कंधों की यह जीवनधारा ही दु:ख है ।
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