🙏राम राम जी : CJC🙏
*परलोकी रोटी*
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पुराने समय की बात है। एक नगर में एक अत्यंत धनवान सेठ रहता था। उसके पास अपार संपत्ति थी, अन्न के बड़े-बड़े कोठार थे और व्यापार दूर-दूर तक फैला हुआ था। *नगर में उसकी पहचान एक “दानवीर” के रूप में थी,* क्योंकि उसने एक विशाल अन्नसत्र (जहाँ धर्मार्थ (charity) के रूप में लोगों को मुफ़्त भोजन दिया जाता है) खुलवा रखा था। प्रतिदिन वहाँ अनेक भूखे, निर्धन और साधु भोजन पाने आते थे। समाज में उसकी बड़ी प्रशंसा होती थी और लोग उसका नाम बड़े सम्मान से लेते थे।
*परंतु सच्चाई यह थी कि सेठ की दान-भावना उतनी शुद्ध नहीं थी*। उसके मन में करुणा से अधिक यह इच्छा रहती थी कि लोग उसकी प्रशंसा करें, उसका नाम फैलाएँ और उसे महान दानी मानें। *वर्ष के अंत में जब उसके कोठारों में सड़ा-गला अन्न बच जाता, जो व्यापार के योग्य नहीं रहता, वही अन्न अन्नसत्र में भेज दिया जाता। अक्सर वहाँ गरीबों को सड़ी ज्वार की मोटी और बेस्वाद रोटियाँ ही मिलती थीं।* भूखे लोग विवश होकर वह भोजन खा लेते, पर मन ही मन दुखी रहते।
कुछ समय बाद सेठ के पुत्र का विवाह हुआ। *नई बहू घर आई। वह अत्यंत सुशील, संस्कारी, धर्मज्ञ और गहरी समझ रखने वाली थी*। घर की व्यवस्था देखते-देखते उसे अन्नसत्र के बारे में भी जानकारी मिली। *जब उसे यह ज्ञात हुआ कि वहाँ गरीबों को सड़ी ज्वार की रोटियाँ दी जाती हैं, तो उसका हृदय व्यथित हो उठा।* वह सोचने लगी कि दान का अर्थ केवल देना नहीं, बल्कि श्रद्धा, पवित्रता और करुणा के साथ देना है।
उसने निश्चय किया कि इस बात को अपने ससुर को किसी उपदेश या कटु वचन से नहीं, बल्कि अनुभव के माध्यम से समझाया जाए। उसने विनम्रता से भोजन बनाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। *अगले ही दिन उसने अन्नसत्र से वही सड़ी ज्वार का आटा मँगवाया, जिससे गरीबों के लिए रोटियाँ बनती थीं। उसी आटे से उसने एक रोटी बनाई और सेठ के भोजन की थाली में अन्य स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ उसे भी परोस दिया*।
भोजन करते समय सेठ की दृष्टि उस काली, मोटी और रूखी रोटी पर पड़ी। कौतूहलवश उन्होंने पहला कौर उसी रोटी का मुँह में डाल लिया। *जैसे ही रोटी का टुकड़ा मुँह में गया, उसका बेस्वाद और दुर्गंधयुक्त स्वाद उन्हें सहन नहीं हुआ।* वे तुरंत थू-थू करने लगे और रोटी थूकते हुए बोले, *“बेटी! घर में तो उत्तम आटा भरा है, फिर यह सड़ी ज्वार की रोटी तुम कहाँ से ले आई?”*
पुत्रवधू ने अत्यंत शांत स्वर में उत्तर दिया, *“पिताजी, यह आटा परलोक से मँगवाया है।”*
सेठ चकित होकर बोले,
*“बेटी, यह कैसी बात कर रही हो? मैं कुछ समझा नहीं।”*
तब पुत्रवधू ने नम्रता से कहा,
*“पिताजी, हमारे शास्त्र कहते हैं कि इस जीवन में जो कर्म हम करते हैं, वही अगले लोक में हमारे भोग बनते हैं। पिछले जन्म में हमने जो दान-पुण्य किया, उसी का फल आज हमें सुख-सुविधा के रूप में मिल रहा है। और इस जन्म में हम जैसा दान करेंगे, परलोक में हमें वही प्राप्त होगा। हमारे अन्नसत्र में गरीबों को इसी सड़े आटे की रोटी दी जाती है। इसलिए परलोक में भी हमें यही भोजन मिलेगा। मैंने सोचा, यदि अभी से इसका अभ्यास कर लें, तो वहाँ कष्ट कम होगा।”*
पुत्रवधू की बात सुनकर सेठ स्तब्ध रह गए। उनके हृदय में जैसे किसी ने आईना रख दिया हो। *उन्हें पहली बार अपने दिखावे वाले दान का वास्तविक अर्थ समझ में आया।* उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उन्होंने अपनी पुत्रवधू से क्षमा माँगी *और उसी क्षण निश्चय किया कि अब अन्नसत्र में केवल शुद्ध, ताजा और प्रेमपूर्वक बनाया हुआ भोजन ही दिया जाएगा।*
उस दिन के बाद सेठ का दान केवल नाम का नहीं, बल्कि सच्चे अर्थों में पुण्य बन गया। और अन्नसत्र वास्तव में भूखों के लिए अन्न का मंदिर बन गया।
दोस्तों, *दिखावटी दान केवल यश और प्रशंसा पाने का माध्यम होता है, जिसमें करुणा और सच्ची सेवा की भावना नहीं होती। ऐसा दान न तो पुण्य देता है, न ही आत्मिक संतोष। सच्चा दान वही है जो निःस्वार्थ, श्रद्धा और प्रेम से किया जाए। हमें चाहिए कि हम दान को आत्मा की पुकार समझें, न कि समाज में नाम कमाने का साधन।*
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