भाइयो और बहनो,
नरेंद्र दाभोलकर कोई नेता नहीं थे,
कोई सत्ता के भूखे इंसान नहीं थे—
वो सिर्फ़ इतना कहते थे कि
अंधविश्वास छोड़ो, विवेक अपनाओ।
उन्होंने किसी धर्म को गाली नहीं दी,
उन्होंने किसी भगवान का अपमान नहीं किया—
उन्होंने बस ये सवाल उठाया कि
कौन तुम्हें डराकर मूर्ख बना रहा है?
और उसी सवाल की कीमत
उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
आज सोचिए—
अगर अंधविश्वास उजागर करना गुनाह है,
तो अपराधी कौन है?
सवाल पूछने वाला
या सवाल से डरने वाला?
आज भारत में सबसे बड़ा संकट
भूख या गरीबी नहीं—
सोच की गुलामी है।
95 प्रतिशत लोग
सत्ता के चक्कर में
देश को बर्बाद करने पर तुले हैं—
किसी को कुर्सी चाहिए,
किसी को भीड़,
किसी को धर्म का ठेका।
और जनता?
जनता को बस
नारा पकड़ाया जाता है,
डर पकड़ा दिया जाता है,
और विवेक छीन लिया जाता है।
आज हर कोई कह रहा है—
“मेरे पीछे चलो”
लेकिन कोई ये नहीं कह रहा—
“सोचो, समझो, सवाल करो।”
याद रखो—
जो तुम्हें सवाल पूछने से रोके,
वो तुम्हें आज़ाद नहीं,
गुलाम बनाना चाहता है।
दाभोलकर की हत्या
सिर्फ़ एक इंसान की हत्या नहीं थी—
वो विवेक पर हमला था।
लेकिन सच ये है—
इंसान को मारा जा सकता है,
विचार को नहीं।
अब फैसला जनता को करना है—
कौन तुम्हें मूर्ख बना रहा है?
कौन तुम्हें लड़वा रहा है?
और कौन सच में
तुम्हें मज़बूत बनाना चाहता है?
देश धर्म से नहीं टूटता,
देश टूटता है
जब जनता सोचने की ताक़त
किसी और के हाथ दे देती है।
इसलिए आज संकल्प लो—
बाबा नहीं, नेता नहीं,
अपना विवेक सबसे बड़ा गुरु होगा।
क्योंकि
जिस दिन जनता ने सोचना शुरू कर दिया,
उस दिन
हर ढोंग, हर झूठ, हर सत्ता
अपने आप बेनकाब हो जाएगी।
✊ जय विवेक।
जय संविधान।
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