> अपनी आँखों की हिफाज़त करें!
रज़मान के अहम मक़ासिद में से एक ये होना चाहिए कि हम हराम देखने से खुद को रोकने की तरबियत करें। ये ख़ास तौर पर हमारे दौर में ज़्यादा ज़रूरी है, जहाँ हराम नज़ारों तक पहुंच बहुत आसान हो चुकी है। आँख दिल के लिए एक दरवाज़ा है। जो कुछ हम देखते हैं, वो हमारे जज़्बात, ख़्वाहिशात और ख़यालात को मुतास्सिर करता है। हराम को देखना शैतान को हमारे दिलों तक खुली रसाई दे देता है।
रोज़े और नज़र की हिफाज़त के दरमियान गहरा ताल्लुक़ है।
* नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया: "और जो शख़्स निकाह की ताक़त न रखता हो, उसे चाहिए कि रोज़ा रखे, क्योंकि रोज़ा शहवत को ख़त्म करने वाला है।" (बुख़ारी)
सही तरीक़े से रोज़ा रखना (ज़्यादा न खाना, आँखों और ज़बान पर क़ाबू रखना वग़ैरह) इंसान में ज़्यादा ज़ब्त-ए-नफ्स पैदा करता है, और जब वो दोबारा हराम देखने की आज़माइश में पड़े, तो वो खुद को रोकने के क़ाबिल हो जाता है।
हराम को देखना एक ज़हर है जो हमें ईमान की मिठास और अल्लाह की इबादत से महरूम कर देता है। हमें अपनी नज़रों को हर उस चीज़ से बचाना चाहिए जो शहवत को उभारती है, और दुनिया की चमक-दमक से भी परहेज़ करना चाहिए, क्योंकि ये हमें ग़ाफ़िल और अल्लाह को भूल जाने वाला बना देती है।।
दुआ:
अल्लाहुम् म अहसिन आक़ि ब त ना फ़िल-उमूरि कुल्लिहा, व अजिरना मिन खिज़यिद-दुनिया व अज़ाबिल-आख़िरह।
तर्जमा :ऐ अल्लाह! हमें हमारे तमाम मुआमलात का बेहतरीन अंजाम अता फ़र्मा, और हमें दुनिया की रुस्वाई और आख़िरत के अज़ाब से बचा।
> (मुसनद ए अहमद) #❤️अस्सलामु अलैकुम #🤲इस्लाम की प्यारी बातें #🕋❀◕❀मेरा प्यारा इस्लाम❀◕❀🕋 #🤲क़ुरान शरीफ़📗 #🤗रमजान स्पेशल😍🤝

