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#GodMorningFriday #सतभक्ति_के_चमत्कारी_लाभ . पूर्ण परमात्मा के गुण कविर्देव वेदों के ज्ञान से भी पहले सतलोक में उपस्थित थे। यह बिल्कुल सच है कि वे खुद चारों युगों में ज्ञान देने के लिए स्वयं ही धरती पर प्रकट होते हैं। इन्हें चारों युगों में अलग अलग नामों से जाना जाता है। जैसे- सतयुग में सतसुकृत नाम से, त्रेता युग में मुनीन्द्र नाम से , द्वापर युग में करुणामय नाम से और कलयुग में- कविर्देव नाम से आते है। यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में प्रमाणित है कि पूर्ण परमात्मा अपने भक्तों के घोर से घोर पाप भी क्षमा कर देता है। वह पूर्ण परमेश्वर कबीर जी हैं। जो हर युग में स्वयं ही भिन्न-भिन्न नामों से प्रकट होते हैं और अपनी महिमा आप ही बताते हैं। राम-कृष्ण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव जी आदि धरती पर किसी उद्देश्य से मां के गर्भ से जन्म अपना कार्य करते हैं। लेकिन ये सभी तीन ताप के कष्ट, पापकर्म को नहीं काट सकते। जबकि पूर्ण परमात्मा कबीर जी चारों युगों में आते हैं, वह मां के गर्भ से जन्म नहीं लेते। वह संत, महात्मा या शिशु रुप में कहीं भी प्रकट होकर अपनी प्यारी आत्माओं को मिलते हैं। अपना तत्वज्ञान शब्दों, दोहों तथा चोपाईयों द्वारा बताते हैं। तथा अपने साधकों के तीन ताप का कष्ट, पाप कर्मों को काट कर साधक को सर्व सुख, शांति और पूर्ण मोक्ष प्रदान करते हैं। पांडवों के तीन ताप के कष्ट को भगवान कृष्ण भी दूर नहीं कर सके थे। युधिष्ठर को जब युद्ध के बाद डरावने सपने आने लगे तो उन्हें भगवान कृष्ण ने अश्वमेध यज्ञ करने की सलाह दी । यज्ञ में सभी ऋषि, महर्षि और सभी देवता पहुंच चुके थे लेकिन वे शंख नहीं बजा पाए जब सुदर्शन वाल्मीकि के रूप में कबीर परमेश्वर वहां पहुंचे और उन्होंने पांडवों के यज्ञ में शंख बजाकर यज्ञ संपन्न किया और उन्हें तीन ताप के कष्ट से बचाया । दुर्वासा ऋषि ने यादवो को कुल नष्ट होने का श्राप उन्हें दिया तो वे समाधान के लिए भगवान कृष्ण के पास पहुंचे। लेकिन भगवान कृष्ण के समाधान से कोई फायदा नहीं हुआ और अंत में भगवान कृष्ण सहित यादव कुल नष्ट हो गया । तीन ताप के अन्तर्गत भगवान विष्णु जी को भी कर्म का फल राम और कृष्ण अवतार रूप में भोगना पड़ा। इससे सिद्ध है कि ये देव तीन ताप को नष्ट नहीं कर सकते। जब कि कबीर परमेश्वर अपने भक्त के सर्व अपराध (पाप) नाश (क्षमा) कर देता है। (प्रमाण- यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13) तीन लोक के भगवान अपना ही कर्म फल नहीं काट सकते, अपना प्रारब्ध नहीं बदल सकते तो अपने भक्तों का प्रारब्ध कैसे परिवर्तित करेंगे ? सभी अवतारों जैसे राम, कृष्ण इत्यादि का तो जन्म मृत्यु होता है, ये अविनाशी नहीं है। केवल कबीर परमेश्वर ही अविनाशी है, जन्म मरण से मुक्त है। इसलिए कबीर साहेब की जयंती नहीं प्रकट दिवस मनाया जाता है। जब कबीर परमात्मा प्रकट हुए तो वे सभी ऋषि मुनियों और संतों को पीछे छोड़ते हुए और उनके पूजा करने के तौर तरीकों का निषेध करते हुए, अपने भक्त समुदाय को अपने तरीके से पूजा करने के लिए मार्गदर्शन देते हैं या स्वयं उनके मार्गदर्शक बने हुए हैं। उस समय उनके तत्वज्ञान के दूत बनकर कविर्देव या पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब खुद आते हैं। कबीर साहिब ही अविनाशी पूर्ण परमात्मा हैं। वही सबके जनक हैं और उनकी भक्ति से ही सुख और पूर्ण मोक्ष मिल सकता है। यह सम्पूर्ण संसार कर्म फल से संचालित है। हिन्दू धर्म के सभी 33 करोड़ देवी-देवता व् 24 अवतार जो हुए हैं वे कर्मों के अनुसार ही जीव को कर्म फल प्रदान करते हैं। इन कर्म फलों को भोगने से ये देवी देवता भी कभी नहीं बच पाए। जैसे की तीन ताप के अन्तर्गत भगवान विष्णु जी को भी कर्म का फल राम और कृष्ण अवतार रूप में भोगना पड़ा। श्रीकृष्ण जी ने अंत समय में श्री राम वाले जन्म में बाली को धोखे से मारने का कर्म भोगा, इस पाप कर्म स्वरुप उनकी श्री कृष्ण वाले जन्म में एक विशाख्त तीर लगने के कारण धोखे से मृत्यु हुई। श्री राम चंद्र जी का वनवास भी उनके प्रारब्ध कर्म फल स्वरुप था। इसके अलावा तैंतीस करोड़ देवताओं का रावण की क़ैद में रहना भी प्रारब्ध कर्म फल था। इससे सिद्ध है कि ये देव तथा अवतार तीन ताप का नाश कर अपने तथा अपने भक्तों के कर्मो में फेर बदल नहीं कर सकते। सिर्फ़ पुण्य कर्म फल ही प्रदान कर सकते हैं। जबकि यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में प्रमाणित है के पूर्ण परमात्मा अपने भक्तों के घोर से घोर पाप भी क्षमा कर देता है। वह पूर्ण परमेश्वर कबीर जी हैं। कबीर साहेब की वाणी है- कबीर, कर्म फांस छूटे नहीं, केतो करो उपाय। सद्गुरू मिले तो उबरै, नहीं तो प्रलय जाय॥ अर्थार्त-जब पूर्ण संत जो परमेश्वर कबीर जी स्वयं या उनका कृपा पात्र संत मिल जाता है तो पाप कर्म जो प्रारब्ध में हैं या संचित कर्मों में हैं, वह सत्य साधना से समाप्त हो जाता है। कबीर साहेब वास्तविक पूर्ण परमेश्वर हैं।जो हर युग में स्वयं ही भिन-भिन नामों से प्रकट होते हैं और अपनी महिमा आप ही बताते हैं। उनका जन्म कभी माता के गर्भ से नहीं होता। ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 17 से 20 में स्पष्ट है कि पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) शिशु रूप धारण करके अपना तत्वज्ञान संसार को देने के लिए प्रकट होता है। कलयुग में भी कबीर परमेश्वर ज्येष्ठ मास की शुक्ल पूर्णमासी विक्रमी संवत 1455 सन् 1398 ब्रह्म मुहूर्त मैं लहरतारा सरोवर मैं कमल के फूल पर एक नवजात शिशु का रूप धारण करके प्रकट हुए थे। वे 120 वर्ष तक रहे और कविताओं व् लोकोक्तियों द्वारा अपने तत्वज्ञान का प्रचार किया था। कबीर साहेब ने स्वयं कहा हैं की- मात-पिता मेरे घर नाहीं, ना मेरे घर दासी। तारण-तरण अभय पद दाता, हूँ कबीर अविनाशी॥ लेकिन हिन्दू धर्म के सभी देवी देवता व् अवतारों का जन्म माता के गर्भ से हुआ है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश को खास तौर पर अविनाशी माना जाता है। लेकिन श्रीमद् देवी भागवत पुराण तीसरा स्कंध अध्याय 5 पेज 123 पर स्पष्ट प्रमाण है कि तीनों गुण रजोगुण ब्रह्मा जी, सतोगुण विष्णु जी, तमगुण शिवजी हैं। ये सभी ब्रह्म (काल) तथा प्रकृति (दुर्गा) से उत्पन्न हुऐ है तथा यह तीनों प्रभु नाशवान हैं।इससे सिद्ध है कि वास्तविक परमेश्वर सिर्फ़ कबीर जी हैं। हिंदू तथा अन्य धर्मों द्वारा पूजे जाने वाले देवताओं में से कोई भी उनके शास्त्रों में वर्णित पूर्ण परमात्मा नहीं है। इन देवताओं की शक्ति तो सीमित है लेकिन पूर्ण परमात्मा कबीर जी की शक्ति की कोई सीमा नहीं है। कबीर चारभुजा के भजन में, भूलि परे सब संत। कबीरा सुमिरै तासु को, जाके भुजा अनंत॥ परमात्मा दो प्रकार से यह लीला करता है। प्रथम, प्रत्येक युग में शिशु रूप में, किसी सरोवर में कमल के फूल पर प्रकट होता है। वहां से निःसंतान दंपति उसे उठा ले जाते हैं। लीला करता हुआ बड़ा होता है तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्रचार करके अधर्म का नाश करता है। सरोवर के जल में कमल के फूल पर अवतरित होने के कारण परमेश्वर "नारायण" कहलाता है। यह लीला परमात्मा हर युग में करते हैं। सतयुग में सतसुकृत, त्रेता युग में मुनीन्द्र, द्वापरयुग में करुणामय तथा कलयुग में अपने वास्तविक नाम कबीर से प्रकट होते हैं। कलयुग में जेष्ठ शुदी पूर्णमासी संवत 1455 को, कबीर परमेश्वर सत्यलोक से चलकर आए, तथा काशी शहर में, लहरतारा नामक सरोवर में कमल के फूल पर शिशु रूप में विराजमान हुए। वहां से नीरू तथा नीमा जुलाहा दंपत्ति उन्हें उठा लाए। उसके बाद परमेश्वर कबीर जी लीला करते हुए बड़े हुए तथा अपनी पुण्य आत्माओं को तत्वज्ञान समझा कर अधर्म का नाश किया। कबीर परमेश्वर ने 120 साल तक यह लीला की और उसके बाद मगहर नामक स्थान से, सशरीर अपने सत्यलोक को वापस चले गए। परमात्मा कबीर जी किसी मां के गर्भ से जन्म नहीं लेते। अन्य अवतारों के बारे में परमात्मा कहते हैं कि यो हरहट का कुँआ लोई, या गल बंध्या है सब कोई। कीड़ी कुंजर और अवतारा,हरहट डोरी बंधे कई बारा। यानी जितने भी अन्य अवतार हुए हैं जैसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा श्रीराम, श्रीकृष्ण, ऐसे 10 अवतार हुए हैं। यह सभी अवतार माता के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं तथा अपना समय पूरा करके मृत्यु को प्राप्त हुए हैं यानी अपना शरीर यही त्याग कर गए हैं। ये सभी जन्म मरण में है, यानी इनका जन्म तथा मृत्यु होती है। केवल कबीर साहेब ही पूर्ण परमात्मा हैं उनका जन्म किसी माता के गर्भ से नहीं होता, क्योंकि परमात्मा के कोई माता-पिता नहीं होते। परमात्मा स्वयं ही हम सब के माता पिता हैं। तथा परमात्मा का ना कभी जन्म होता है और ना ही कभी मृत्यु होती है। परमात्मा सदा से है और सदा रहने वाले हैं। परमेश्वर जब भी शिशुरूप में पृथ्वी पर आते हैं तो उनका पालन पोषण कुंवारी गायों के दूध से होता है। ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 1 मंत्र 9 “अभी इमं अध्न्या उत श्रीणन्ति धेनवः शिशुम्। सोममिन्द्राय पातवे।। परमात्मा किसी भी स्त्री से संबंध नहीं बनाते। ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 4 मंत्र 4 “मूरा अमूर न वयं चिकित्वो महित्वमग्ने त्वमग् वित्से। वश्ये व्रिचरति जिह्नयादत्रोरिह्यते युवतिं विश्पतिः सन्।। लोगों को खुद के ज्ञान से अवगत कराने के लिए परमात्मा कविताओं और लोकोक्तियों का उपयोग करते हैं और एक प्रसिद्ध कवि की उपमा प्राप्त करते हैं। ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 16 मंत्र 18 “ऋषिमना य ऋषिकृत् स्वर्षाः सहत्राणीथः पदवीः कवीनाम्। तृतीयम् धाम महिषः सिषा सन्त् सोमः विराजमानु राजति स्टुप्।। परमात्मा शिशु रूप धारण कर लेता है। लीला करता हुआ बड़ा होता है। कविताओं द्वारा तत्वज्ञान वर्णन करने के कारण कवि की पदवी प्राप्त करता है अर्थात् उसे ऋषि, सन्त व कवि कहने लग जाते हैं, वास्तव में वह पूर्ण परमात्मा कविर् ही है। उसके द्वारा रची अमृतवाणी कबीर वाणी (कविर्वाणी) कही जाती है, जो भक्तों के लिए स्वर्ग तुल्य सुखदाई होती है। वही परमात्मा तीसरे मुक्ति धाम अर्थात् सत्यलोक की स्थापना करके तेजोमय सदृश शरीर में आकार में गुम्बज के नीचे ऊंचे सिंहासन पर विराजमान है। पूर्ण परमात्मा किसी मां के गर्भ से जन्म नहीं लेते। जबकि जो अवतार लेते हैं जैसे राम कृष्ण, शिव आदि भगवान मां के गर्भ से जन्म लेते हैं तथा इस काल में अपना कार्यकाल पूरा करके मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। जबकि पूर्ण परमात्मा स्वयं सशरीर प्रगट होते हैं, और सशरीर ही सतलोक चले जाते हैं। वहीं अविनाशी परमात्मा है जो जन्म मृत्यु से परे हैं। कबीर जी सन् 1398 (विक्रमी संवत् 1455) ज्येष्ठ मास सुदी पूर्णमासी को ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले) में काशी में आए थे। परंतु कबीर साहेब ने मां के गर्भ से जन्म नहीं लिया अपितु वे अपने निजधाम सतलोक से सशरीर आकर बालक रूप बनाकर लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर विराजमान हुए। इस दिन को कबीर साहेब के जन्मदिन के उपलक्ष्य में कबीर पंथी हर साल जून के महीने में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। गरीब, अनंत कोटि ब्रह्मांड में, बन्दी छोड़ कहाय। सो तो एक कबीर हैं, जननी जन्या न माय।। जितने भी अवतार जन्म लेते हैं उनकी मृत्यु भी होती है। पूर्ण परमात्मा नहीं है राम जी, कृष्णा जी, शिव जी आदि सभी देवी देवताओं के माता पिता हैं। ये पूर्ण परमात्मा नहीं हैं। पूर्ण परमात्मा मां के गर्भ से जन्म नहीं लेते वे स्वयं ही प्रकट होते हैं। वेदों में परमेश्वर के गुण है कि परमात्मा के मुखारविंद से निकले पवित्र वेद पूर्ण परमात्मा के निम्नलिखित गुणों को बताते हैं। परमपिता परमेश्वर कभी भी माँ से जन्म नहीं लेते। ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 4 मंत्र 3 “शिशुम् न त्वा जेन्यम् वर्धयन्ती माता विभर्ति सचनस्यमाना धनोः अधि प्रवता यासि हर्यन् जिगीषसे पशुरिव अवसृष्टः।। Sa true Story YouTube #sant ram pal ji maharaj #me follow
sant ram pal ji maharaj - संत गरीबदास जी ने अमर ग्रन्थ साहेब में कहा है कि सर्व सृष्टि रचनहार पूर्ण कबीर जी हैं। परमात्मा संत गरीबदास जी ने अमर ग्रन्थ साहेब में कहा है कि सर्व सृष्टि रचनहार पूर्ण कबीर जी हैं। परमात्मा - ShareChat