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जब फसलों को आस थी बरसात की, शहर में बरसता रहा, गांव तरसता रहा! सुख गए पुल-पुलिया, फसल झुलसता रहा! बंजड़ हुई जमीनें, आंखें नम बरसता रहा! लाखों की क्षति देख,तड़पता रहा! फिर भी बचें फसलों पर, उम्मीद थोड़ा जगता रहा! खेतों में अब वह, धिरे-धिरे पलता-फलता रहा! अब फसलों को आस न थी बरसात की, बस कुछ दिनों में पक कर, कटने की जज़्बात रहा! फिर घनघोर बरसात ऐसी, सभी फसलें बर्बाद रहा! महकते-गमकते सुनहरे बाल, लूढकर जमीन पे सो रहा! टूटकर बिखर गए किसान भी, अब न कोई आस रहा! प्रकृती किं महिमा ऐसी, केवल किसान ही बर्बाद रहा! कहीं यह प्रकृति के साथ घेलवाड़ करने का वज़ह तो नहीं! पेड़-पौधों की रक्षा करना, नये पेड़-पौधे लगाना, मिट्टी-पानी का संरक्षण करना अति आवश्यक हो गया... #किसान #किसान #🌞 Good Morning🌞 #🏞 पर्यटन फोटोग्राफी #🇮🇳मेरा भारत, मेरी शान #💓 फ़ौजी के दिल की बातें
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