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#गीता ज्ञान #गीता का ज्ञान #श्री कृष्ण के गीता ज्ञान #🙏गीता ज्ञान🛕 #🌺 कृष्ण ज्ञान 🙏 गीता वचन 🌺 भक्ति 💕 राधा कृष्ण 🙏🙏 हरि बोल 🙏🙏
गीता ज्ञान - १. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोडस्त्वकर्मणि II (गीता I 2.47) अर्थः तेरा कर्म करने में अधिकार है, फल की इच्छा में नहीं। तू कर्म के फल के लिए न कर, और न ही अकर्म में तेरा आसंग हो। योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। 2. सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते II (गीता 2.48) अर्थः हे धनंजय! आसक्ति को छोड़कर सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर, यह समत्व ही योग है। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 3. अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् II (गीता 4.7) अर्थः हे भरत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-्तब मैं अपने रूप को प्रकट करता हूँ। १. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोडस्त्वकर्मणि II (गीता I 2.47) अर्थः तेरा कर्म करने में अधिकार है, फल की इच्छा में नहीं। तू कर्म के फल के लिए न कर, और न ही अकर्म में तेरा आसंग हो। योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। 2. सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते II (गीता 2.48) अर्थः हे धनंजय! आसक्ति को छोड़कर सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर, यह समत्व ही योग है। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 3. अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् II (गीता 4.7) अर्थः हे भरत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-्तब मैं अपने रूप को प्रकट करता हूँ। - ShareChat