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sawami vivekanand jayanti - उठो , जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।  के प्रेरक आदर्श भारतीय gqT3it स्वामो विवेकानन्द जुलाई 1९०२) (12 অননযী 1863  जयंती पर शतनशत नमन स्वामी विवेकानन्द एक महान भारतीय सन्यासी योगाचार्य विचारक और समाज सुधारक थे, जिनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का अद्भुत स्रोत है। बचपन से ही वे अत्यंत मेधावी और जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे। नरेन्द्रनाथ (स्वामी विवेकानन्द का मूल नाम) का जीवन एक युवावस्था निर्णायक मोड पर आया॰ जिब रामकृष्ण परमहंस से मार्गदर्शन प्राप्त उन्होने किया। रामकृष्ण ने उन्हें भक्ति॰ सेवा और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। गुरु के देहावसान के बाद नरेन्द्रनाथ ने संन्यास ग्रहण किया और स्वामी विवेकानन्द नाम ग्रहण किया। उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य केवल आत्मसाक्षात्कार तक सीमित नहीं लिए रखा, बल्कि इसे समाज सेवा, शिक्षा और राष्ट्र चेतना के समर्पित कर दिया। सन २८९३ में।स्वामी विवेकानन्द अमेरिका गए और शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में भाग लिया। वहाँ उनका भाषण "Sisters and प्रसिद्ध Brothers of America ] पूरी दुनिया में हुआ। इस भाषण में उन्होंने भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म का संदेश प्रस्तुत किया - कि धर्म केवल अनुष्ठान और कर्मकांड का नाम नहीं, बल्कि सर्वधर्म समभाव , मानवता और सार्वभौमिक भाईचारे का मार्ग है। उनके विचारों ने न केवल विदेशी समाज को बल्कि भारतीय को भी युवाओं गहरे प्रभावित किया। भारत लौटने के बाद स्वामी विवेकानन्द रामकृष्ण मिशन (२८९७) को स्थापना की। इसका उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्यः गरीबों की सहायता और समाज सेवा को बढ़ावा देना था। उनकी प्रमुख স থানিল पुस्तकों "Raja Yoga" Jnana Yoga [Karma Yoga  k"Bhakti Yogal जो भक्ति और प्रेम के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति का दिखाती है। मार्ग उठो , जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।  के प्रेरक आदर्श भारतीय gqT3it स्वामो विवेकानन्द जुलाई 1९०२) (12 অননযী 1863  जयंती पर शतनशत नमन स्वामी विवेकानन्द एक महान भारतीय सन्यासी योगाचार्य विचारक और समाज सुधारक थे, जिनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का अद्भुत स्रोत है। बचपन से ही वे अत्यंत मेधावी और जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे। नरेन्द्रनाथ (स्वामी विवेकानन्द का मूल नाम) का जीवन एक युवावस्था निर्णायक मोड पर आया॰ जिब रामकृष्ण परमहंस से मार्गदर्शन प्राप्त उन्होने किया। रामकृष्ण ने उन्हें भक्ति॰ सेवा और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। गुरु के देहावसान के बाद नरेन्द्रनाथ ने संन्यास ग्रहण किया और स्वामी विवेकानन्द नाम ग्रहण किया। उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य केवल आत्मसाक्षात्कार तक सीमित नहीं लिए रखा, बल्कि इसे समाज सेवा, शिक्षा और राष्ट्र चेतना के समर्पित कर दिया। सन २८९३ में।स्वामी विवेकानन्द अमेरिका गए और शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में भाग लिया। वहाँ उनका भाषण "Sisters and प्रसिद्ध Brothers of America ] पूरी दुनिया में हुआ। इस भाषण में उन्होंने भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म का संदेश प्रस्तुत किया - कि धर्म केवल अनुष्ठान और कर्मकांड का नाम नहीं, बल्कि सर्वधर्म समभाव , मानवता और सार्वभौमिक भाईचारे का मार्ग है। उनके विचारों ने न केवल विदेशी समाज को बल्कि भारतीय को भी युवाओं गहरे प्रभावित किया। भारत लौटने के बाद स्वामी विवेकानन्द रामकृष्ण मिशन (२८९७) को स्थापना की। इसका उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्यः गरीबों की सहायता और समाज सेवा को बढ़ावा देना था। उनकी प्रमुख স থানিল पुस्तकों "Raja Yoga" Jnana Yoga [Karma Yoga  k"Bhakti Yogal जो भक्ति और प्रेम के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति का दिखाती है। मार्ग - ShareChat