#GodMorningTuesday
#2026_की_सबसे_बड़ी_भविष्यवाणी
. ज्ञान चर्चा कबीर साहिब व धर्म दास
परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि हे धर्मदास! मैं आसमान के ऊपर सतलोक में रहता हूँ। पृथ्वी पर भी बैठा हूँ। आपके दिल में अज्ञान छाया है। आप मुझे पहचानने में धोखा खा रहे हो। मेरा तेरे जैसा शरीर नहीं है। मैं गृहस्थी हूँ क्योंकि अनंत ब्रह्माण्ड मेरा परिवार है। मेरे कारण ही सृष्टि में अमन-चैन यानि शांति है। मेरे पास मोक्ष का गुप्त मंत्रा है। हे धर्मदास! यह मेरी निशानी जान ले कि मैं भक्ति का गुप्त नाम प्रकट करता हूँ। परमात्मा के बिना यह गुप्त नाम कोई नहीं जानता। ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सूक्त नं. 95 मंत्र नं. 2 में कहा है कि परमात्मा अपने मुख से वाणी बोलकर भक्ति की प्रेरणा करता है।
परमात्मा भक्ति के गुप्त नाम का आविष्कार करता है। कबीर परमात्मा ने कहा है कि सोहं शब्द हम जग में लाए। सारशब्द हम गुप्त छुपाए।।} न तो मेरा जन्म होता है, न मेरी मृत्यु होती है। सतलोक में गर्मी व सर्दी नहीं है।
सदा बसंत रहती है। शब्द की शक्ति से विहंगम मार्ग से सतलोक जाया जाता है। बाबा जिंदा वेशधारी परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि हे धर्मदास! मेरा शरीर श्वांस उश्वांस वाला नहीं है। मेरा पाँच तत्त्व का शरीर नहीं है। मैं कभी माता के गर्भ में नहीं आता। माता-पिता के संयोग से मेरा जन्म कभी नहीं हुआ।
हे धर्मदास! आप विष्णु जी की भक्ति करते हो, यह तो नाशवान है। इसकी मृत्यु होती है। आप जो गीता पढ़ रहे थे। इसमें देखो! आपका कृष्ण उर्फ विष्णु स्वयं कह रहा है कि हे अर्जुन! तेरे और मेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। तू नहीं जानता, मैं जानता हूँ। अविनाशी तो उसे जान जिसे कोई मार नहीं सकता जिससे सर्व संसार व्याप्त है। (गीता अध्याय 2 श्लोक 12 तथा 17, गीता अध्याय 4 श्लोक 5, गीता अध्याय 10 श्लोक 2 में।
गीता-ज्ञान दाता ने कहा है कि हे अर्जुन! तू सर्वभाव से उस परमेश्वर की शरण में जा जिसकी कृपया से तू परम शांति को तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा। गीता अध्याय 18 श्लोक 62
गीता-ज्ञान दाता ने कहा है कि तत्त्वज्ञानी संत मिल जाए तो उससे तत्त्वज्ञान समझने के पश्चात् परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक कभी लौटकर संसार में नहीं आता। जिस परमेश्वर से संसार वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है यानि जिस परमात्मा ने सृष्टि की उत्पत्ति की है, उसकी भक्ति कर।गीता अध्याय 15 श्लोक 4
गीता-ज्ञान दाता ने कहा है कि हे अर्जुन! इस संसार में दो पुरूष हैं। एक क्षर पुरूष, दूसरा अक्षर पुरूष। इन दोनों प्रभुओं के अंतर्गत जितने प्राणी हैं, सब नाशवान हैं। ये दोनों (पुरूष) प्रभु भी नाशवान हैं। आत्मा किसी की नहीं मरती। गीता अध्याय 15 श्लोक 16।
गीता-ज्ञान दाता ने कहा है कि उत्तम पुरूष अथार्त श्रेष्ठ पुरूष यानि पुरूषोत्तम तो इन दोनों से अन्य ही है जो परमात्मा कहा जाता है जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता रहता है। वह वास्तव में अविनाशी परमेश्वर है। गीता अध्याय 15 श्लोक 17
कबीर साहेब ने कहा कि धर्मदास! कृष्ण उर्फ विष्णु तो अन्य परमेश्वर को अविनाशी कह रहा है। उसी की शरण में जाने का निर्देश दे रहा है। क्या आप जानते हैं, वह परमेश्वर कौन है? मैं जानता हूँ। परमेश्वर के मुख कमल से गीता का गूढ़ रहस्य सुनकर धर्मदास स्तब्ध रह गया। उसको सब श्लोक याद थे, परंतु अभिमानवश हार मानने को तैयार नहीं था। कहा कि तुम मुसलमान हो। जीव हिंसा करते हो। हम कोई जीव हिंसा नहीं करते। सदा धर्म करते हैं। तुम पाप करते हो। कभी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। मैं आपकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हूँ।
धर्मदास जी ने कहा कि हे जिन्दा! तू अपनी जुबान बन्द कर ले, मुझसे और नहीं सुना जाता। जिन्दा रुप में प्रकट परमेश्वर ने कहा, हे वैष्णव महात्मा धर्मदास जी! सत्य इतनी कड़वी होती है जितना नीम, परन्तु रोगी को कड़वी औषधि न चाहते हुए भी सेवन करनी चाहिए। उसी में उसका हित है। यदि आप नाराज होते हो तो मैं चला। इतना कहकर परमात्मा जिन्दा रुप धारी अन्तर्ध्यान हो गए। धर्मदास को बहुत आश्चर्य हुआ तथा सोचने लगा कि यह कोई सामान्य सन्त नहीं था। यह पूर्ण विद्वान लगता है। मुसलमान होकर हिन्दू शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान है। यह कोई देव हो सकता है।
धर्मदास जी अन्दर से मान रहे थे कि मैं गीता शास्त्र के विरुद्ध साधना कर रहा हूँ। परन्तु अभिमानवश स्वीकार नहीं कर रहे थे। जब परमात्मा अन्तर्ध्यान हो गए तो पूर्ण रुप से टूट गए कि मेरी भक्ति गीता के विरुद्ध है। मैं भगवान की आज्ञा की अवहेलना कर रहा हूँ। मेरे गुरु श्री रुपदास जी को भी वास्तविक भक्ति विधि का ज्ञान नहीं है। अब तो इस भक्ति को करना, न करना बराबर है, व्यर्थ है। बहुत दुखी मन से इधर-उधर देखने लगा तथा अन्दर से हृदय से पुकार करने लगा कि मैं कैसा नासमझ हूँ।
सर्व सत्य देखकर भी एक परमात्मा तुल्य महात्मा को अपनी नासमझी तथा हठ के कारण खो दिया। हे परमात्मा! एक बार वही सन्त फिर से मिले तो मैं अपना हठ छोड़कर नम्र भाव से सर्वज्ञान समझूंगा। दिन में कई बार हृदय से पुकार करके रात्रि में सो गया। सारी रात्रि करवट लेता रहा। सोचता रहा हे परमात्मा! यह क्या हुआ। सर्व साधना शास्त्रविरुद्ध कर रहा हूँ। मेरी आँखें खोल दी उस फरिस्ते ने। मेरी आयु 60 वर्ष हो चुकी है।धर्मदास जी की संतान द्वारा लिखी पुस्तक में 89 वर्ष आयु लिखी है। जो भी है, हमने तत्त्वज्ञान समझना है। अब पता नहीं वह देव पुनः मिलेगा कि नहीं।
Factful Debates YouTube Channel #sant ram pal ji maharaj #me follow


