वो समझती है कि शायद मैं बदलता जा रहा हूँ,
उसे क्या इल्म, किस भट्टी में जलता जा रहा हूँ।
उसे पाने की खातिर ही तो उससे दूर हूँ मैं,
कमाने की मशक्कत में कुचलता जा रहा हूँ।
कभी दफ़्तर की फाइलें, कभी रातों की ड्यूटी,
मैं अपने ख्वाब की चाहत में ढलता जा रहा हूँ।
वो कहती है—"ज़रा सा वक्त दे दो साथ मेरे",
मैं "कल" को सींचने कल की ही जानिब चल रहा हूँ।
हथेली गर्म है उसकी, मगर मेरे हाथ ठंडे,
मैं पैसों की मशीनों में पिघलता जा रहा हूँ।
मोहब्बत और नौकरी की इस कठिन सी कश्मकश में,
मैं खुद को दो किनारों में बदलता जा रहा हूँ।
#😠कभी गुस्सा कभी प्यार🥰 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख

