🙏राम राम जी : CJC🙏
*छोटी दुकान, ऊंचा...*
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आज रक्षाबंधन था, तो मेरे एक मित्र की बहन सुबह-सुबह 130 किलोमीटर दूर से दोस्त के यहां राखी बांधने आई। उनके साथ उनका 2 साल का बच्चा और जीजा जी भी थे।
*पर वापस जाते समय बस में जबरदस्त भीड़ थी, और बच्चे को इतनी भीड़ में ले जाने की हिम्मत उनमें नहीं थी क्योंकि सफर लंबा था।*
तभी दोस्त का फोन आता है, और *हम गाड़ी लेके उसके घर निकल लेते हैं क्योंकि ज़ाकिर खान ने एक वीडियो में बोला था— "भाई ने बोला है करना है तो करना है।"*
बस निकल लिए गाड़ी को लेके।
*तकरीबन एक घंटे बाद बाबू नींद से जागा और उसे ज़रूरत थी दूध की। दीदी ने जब दूध की बोतल निकाली तो देखा दूध खराब हो गया था।*
अब क्या किया जाए, बड़ी दुविधा थी। जल्दी-जल्दी में पाउडर वाला दूध भी नहीं रखा था।
*थोड़ी दूर जाने पर एक बड़ा होटल मिला,* वहां गाड़ी साइड में लगाकर हम बोले कि—
*"पाउडर वाला दूध या बच्चे को पिलाने के लिए दूध है?"*
उनका सीधा जवाब था— *"पैकेट वाला दूध है 2 लीटर का, थोड़ा सा नहीं मिलेगा, पूरा पैकेट लेना होगा।"*
अब बच्चा रोया जा रहा था, तो यही सोचा कि ले लेते हैं।
*लेकिन बच्चे को सिर्फ 200 ml की ज़रूरत थी। हम बोले— "ठीक है, दे दो, बाकी दूध हम लोग दूसरी बोतल में रख लेंगे।"*
क्योंकि पैकेट बंद दूध बहुत ज़्यादा ठंडा रहता है, तो हम लोगों ने बोला कि— "भाई, इसे गर्म कर दो इतना कि बच्चा पी सके।"
*होटल के कारीगर ने तुरंत मना कर दिया और कहा—"गर्म नहीं हो पाएगा, ऐसे ही ले जाओ।"*
पर ठंडा दूध किसी काम का नहीं था।
*इस बड़े रेस्टोरेंट को छोड़ आगे बढ़े।*
*लगभग 700 मीटर आने पर ये छोटी सी दुकान लगी।*
मैंने गाड़ी किनारे लगाई, तो *जीजा जी बोले—"अरे क्या रुक रहे हो, दुकान की हालत तो देखो।"* आखिर कौन घुसना चाहेगा ऐसी दुकान में, सामान के नाम पर छोटी-मोटी चीज़ें हैं, जो सामान होगा वो भी पुराना होगा।
*पर हम लोग दुकान में घुसे।*
वहां एक दादा थे।
हमने बोला— *"थोड़ा दूध मिल जाएगा क्या बच्चे के लिए?"*
पहले उन्होंने बोला— *"हां मिल जाएगा, लेकिन भैंस का दूध है, पैकेट वाला नहीं।"*
तभी दीदी बोली— *"अरे हां, यही चाहिए।"*
फिर उन्हें बोतल दी।
बोतल में से खराब दूध की महक आ रही थी। *उन्होंने पानी गर्म कर उसमें बोतल को डाल दिया और दूसरी तरफ दूध गुनगुना कर दिया और बोतल में दूध भर के दे दिया।*
सफर लंबा था, तो दीदी ने एक बोतल में और दूध ले लिया। लगभग 700 ml दूध था।
मैंने बोला— *"दादा, पैसे कितने हुए?"*
उन्होंने बोला— *"अरे बच्चे के दूध का क्या पैसा लेना।"*
हमने बोला— *"अरे आप भी तो किसी से खरीदे होंगे।"*
तो उनका जवाब था—
*"मुनाफा कमाने के लिए खरीदा जाता है, चाय पीते तो पैसे लेते, 1 साल के बच्चे के लिए क्या पैसे लिया जाए?"*
फिर हम सब ने पानी की 2 बोतल लीं, 4 चाय पी और धन्यवाद बोलते हुए अपने रास्ते पर निकल गए।
दोस्तों, अक्सर हम लोग छोटी दुकान पर सिर्फ उनका हुलिया देख के नहीं रुकते हैं,
पर ये भूल जाते हैं कि यदि उनके पास इतने पैसे होते तो क्या वो ऐसी दुकान चलाते?
और पैसा कमाने के लिए दुकान खोली है और हमारे जैसे उपभोक्ता ही उनकी दुकान पर नहीं गए तो पैसे कैसे कमाएंगे वो? इसलिए याद रखें
*हमें किसी दुकान या व्यक्ति को उसके बाहरी रूप से नहीं आंकना चाहिए। बड़े प्रतिष्ठानों/मॉल में सुविधाएं होते हुए भी संवेदनशीलता नहीं दिखती, जबकि छोटी दुकानों में इंसानियत और सेवा की भावना होती है। असली मूल्य इंसानियत और मदद की भावना में है, न कि दिखावे में।*
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